Wednesday, March 14, 2012

विकसित राज्यों में और कम हुई लड़कियां


राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा यहां जारी नई रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि दिल्ली, पंजाब और हरियाणा भले ही आर्थिक रूप से प्रगति की राह पर हों, लेकिन इन राज्यों में अन्य राज्यों की तुलना में लिंगानुपात की स्थिति ज्यादा खराब है। इस रिपोर्ट में कहा गया कि दिल्ली, चंडीगढ़ और हरियाणा आर्थिक रूप से काफी संपन्न हैं, लेकिन यहां लिंग अनुपात सबसे ज्यादा असंतुलित है। ग्रामीण क्षेत्रों में हर एक हजार पुरुषों पर 919 महिलाएं हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में हर एक हजार पुरुषों पर सिर्फ 902 महिलाएं हैं। लिंग अनुपात के मामले में हरियाणा के झज्जर और फिर महेंद्रगढ़ की स्थिति सबसे खराब है, जहां एक हजार पुरुषों पर क्र मश: 774 और 778 महिलाएं हैं। देश में केरल और पुडुचेरी में लिंगानुपात सबसे ज्यादा संतुलित है। इस रिपोर्ट में कहा गया कि लैंगिक भेदभाव के खिलाफ दशकों के संघर्ष के बावजूद आंकड़े बताते हैं कि देश में बड़े स्तर पर लिंगभेद लगातार जारी है। खासकर आर्थिक रूप से संपन्न राज्यों में। राष्ट्रीय महिला आयोग और संयुक्त राष्ट्र की संयुक्त पहल पर तैयार रिपोर्ट अंडरस्टैंडिंग जेंडर इक्वेलिटी इन इंडिया-2012’ स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, चुनाव आयोग और गृह मंत्रालय सहित विभिन्न मंत्रालयों और आयोगों से जुटाए गए आंकड़ों पर आधारित है। देश में लिंगानुपात 2001 में 1000 पुरुषों पर 933 महिलाएं की तुलना में 2011 में 1000 पुरुषों पर 940 महिलाएं हो गया है। आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा ने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि यह राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति है। उन्होंने कहा कि हर कोई कहता है कि भारत विकासशील देश है, लेकिन हम ऐसा कैसे कह सकते हैं। रिपोर्ट में आंकड़ों की मदद से कहा गया कि भारत की 30 प्रतिशत महिलाएं शारीरिक हिंसा सहती हैं। आठ फीसद महिलाएं यौन हिंसा झेलने को मजबूर हैं। महिलाओं पर शारीरिक हिंसा के मामले में बिहार जबकि यौन हिंसा के मामले में पश्चिम बंगाल शीर्ष पर है। 2001 : 1000 पुरुषों पर 933 महिलाएं 2011 में 1000 पुरुषों पर 940 महिलाएं शारीरिक हिंसा : 30 फीसद यौन हिंसा : 08 फीसद शारीरिक हिंसा के मामले में बिहार शीर्ष पर यौन हिंसा के मामले में पश्चिम बंगाल आगे दिल्ली, चंडीगढ़ और हरियाणा में लिंग अनुपात सबसे ज्यादा असंतुलित केरल और पुडुचेरी में लिंगानुपात सबसे ज्यादा संतुलित 

Wednesday, February 29, 2012

यहां लड़कियों को बनाया जाता है मुर्गा


यह कैसा प्रिंसिपल (प्रधानाध्यापक) जिसका अपना कोई प्रिंसिपल (सिद्धांत) ही नहीं। जरा सी गलती पर बड़ी उम्र की लड़कियों को स्कूल के खुले मंच पर न केवल मुर्गा बनाया जाता है बल्कि उन पर डंडे बरसाए जाते हैं। शिकायत करने पर लड़कियों के चरित्र पर आरोप लगाता है। प्रिंसिपल के जुल्मों की इंतहा हो गई तो छात्राओं ने बुधवार को मीडिया में आवाज उठा दी। पंजाब के पहले मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों के पिता निहाल सिंह के नाम पर चल रहे स्कूल में इस तरह का कृत्य शर्मसार करने वाला है। तरनतारन के गांव कैरों में स्थित गर्ल हास्टल वाले स्कूल में शुरू से ही महिला प्रिंसिपल लगाई जाती रही है परंतु 16 फरवरी 2010 से यहां पर दलबीर सिंह दयोल को प्रिंसिपल लगाया गया था। तभी से प्रिंसिपल का व्यवहार हिटलर जैसा है। मामूली गलती पर छात्राओं को क्लास से स्टेज पर बुलाकर मुर्गा बनाया जाता है और पीठ पर लाठियां बरसाई जाती हैं। सोमवार को दो दर्जन छात्राओं के साथ यही व्यवहार हुआ। पीडि़त छात्राओं ने बताया कि प्रिंसिपल को कई बार दुहाई दे चुकी हैं कि वह बेटियों को ऐसे जलील न करें। मां-बाप को शिकायत करते हैं तो छात्राओं के चरित्र पर ही अंगुली उठा दी जाती है। ऐसे आरोप के बाद मां-बाप भी जुबान बंद रखने के लिए मजबूर हैं। छात्राओं ने मांग की है कि प्रिंसिपल के खिलाफ केस दर्ज किया जाए। इस बारे प्रिंसिपल दलबीर सिंह दयोल से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा कि यह उन्हें बदनाम करने की साजिश है। वहीं, जिला शिक्षा अधिकारी (सेकेंडरी) दर्शना कुमारी माहिया कहती हैं कि स्कूल में जाकर छात्राओं की शिकायत सुन रहे हैं। इस बारे में उच्च अधिकारियों को भी बताया जा रहा है। जिले के डिप्टी कमिश्नर सतवंत सिंह जौहल का कहना है कि यह मामला बहुत गंभीर है। स्कूल में छात्राओं को इस प्रकार दंडित करना गैरकानूनी भी है। मामले की जांच करवाकर कार्रवाई की जाएगी। संषर्ष की चेतावनी : इस मामले पर शिरोमणि अकाली दल (अ) ने संघर्ष छेड़ने की चेतावनी दी है। दल ने पुलिस प्रशासन को अल्टीमेटम दिया है कि अगर दो दिनों में प्रिंसिपल के खिलाफ पर्चा दर्ज न किया गया तो वह संघर्ष छेड़ देगा। अकाली दल (अ) के नेताओं ने आज इस संबंध में जिले के एसएसपी प्रदीप कुमार यादव को एक

Monday, February 27, 2012

चार राज्यों में महिलाओं संग दुष्कर्म


कहीं महफूज नहीं अस्मत। चाहे वह महिला मुख्यमंत्रियों वाले सूबे उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल हो या फिर जम्मू-कश्मीर अथवा झारखंड। गवाह हैं ये शर्मनाक घटनाएं। जम्मू में दो छात्राओं के साथ दुष्कर्म किया गया। व‌र्द्धमान में डकैतों ने ट्रेन तो लूटी ही, एक महिला को हवस का शिकार भी बनाया। गढ़वा में एक महिला को सरेआम निर्वस्त्र कर दिया गया। यूपी के अमेठी में किशोरी के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। स्कूल के रास्ते से उठाया जम्मू के सैनिक कॉलोनी इलाके में बनी प्रवासी श्रमिकों की झुग्गी के पास रविवार को लोगों ने एक युवती को अचेत हालत में पड़ा हुआ देखा। होश में आने पर छात्रा ने पुलिस को बताया कि वह बड़ी-ब्राह्मणा के तरोर इलाके की रहने वाली है। उसका अपहरण किया गया था। वह स्कूल जा रही थी तो तीन युवकों ने जबरन अपनी गाड़ी में बैठा लिया। उसके बाद गाड़ी में ही उससे सामूहिक दुष्कर्म किया। विदित हो कि कक्षा नौवीं की इस छात्रा की गुमशुदगी की रिपोर्ट शनिवार को बड़ी ब्राह्मणा थाने में दर्ज करवाई थी। पुलिस ने स्कॉर्पियो को जब्त कर दो आरोपियों को हिरासत में ले लिया, तीसरा फरार है। झुमके न देने पर बलात्कार पश्चिम बंगाल के व‌र्द्धमान जिले में पाचुंडी एवं अमलग्राम रेलवे स्टेशन के बीच आदमपुर-कटवा पैसेंजर को रोक कर डकैतों ने करीब सौ यात्रियों से दो-ढाई लाख की संपत्ति लूट ली। एक महिला ने अपने झुमके देने से इंकार किया तो डकैत उसे ट्रेन से खींच कर जंगल में ले गए और मनमानी की। महिला ने पुलिस को बताया, डकैतों ने पहले 1000 रुपये ले लिए, फिर कान का झुमका मांगा। देने से इंकार करने पर ट्रेन से नीचे ले गए एवं जंगल में एक डकैत ने मेरे साथ दुष्कर्म किया। फिर मुझे छोड़कर फरार हो गए। खता बेटे की, सजा मां को झारखंड में गढ़वा जिले के शारदा गांव में रविवार को एक महिला को ग्रामीणों ने सरेआम निर्वस्त्र कर दिया। उसके पति से मारपीट की। इसके पीछे वजह बताई गई है कि महिला के पुत्र को 31 जनवरी को गांव के ही मुन्ना बैठा के पुत्र एस कुमार उर्फ सुखाड़ी की हुई हत्या में शामिल बताया गया है। उसी समय से ग्रामीणों के भय से हत्यारोपी के माता-पिता सहित पूरा परिवार पलायन कर गया था। गुरुवार को धुरकी पुलिस बीच बचाव कर पलायित परिवार को घर लाई। रविवार को अचानक दोपहर 12 बजे ग्रामीणों ने धावा बोल कर शर्मनाक घटना को अंजाम दिया। किशोरी से सामूहिक दुष्कर्म उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में किशोरी ने दो लोगों पर सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाया है। पीडि़ता के अनुसार गांव के बाहर शौच के लिए जाने के दौरान चार लोगों ने उसे पकड़ लिया। पहले आंखों पर पट्टी बांधी, मुंह में कपड़ा ठूंसा तथा पास के एक खेत में उठा ले गए। वहां गांव के ही मुन्ना सरोज व अरुण सिंह ने दुष्कर्म किया। दो अन्य लोगों को वह पहचान नहीं पाई। पुलिस ने मुन्ना सरोज को हिरासत में ले लिया है।

Tuesday, February 14, 2012

समाज पर गंभीर सवाल


नई दिल्ली में महज दो वर्ष की एक बच्ची के साथ हुए अमानवीय बर्ताव और दरिंदगी की घटना को सुनकर पूरा देश चकित है। इसे लेकर मीडिया और बुद्धिजीवियों में एक तरह की बहस छिड़ी हुई है, लेकिन महिलाओं और लड़कियों के साथ ऐसी न जाने कितनी भेदभाव की घटनाएं आए दिन होती रहती हैं जिनका संज्ञान शायद ही किसी को होता है। फिर बात चाहे कन्या भ्रूण हत्या की हो, दहेज अपराधों की अथवा घरेलू हिंसा की। इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक कल्याण विभाग की यह रिपोर्ट कोई बहुत चौंकाने वाली नहीं है कि लड़कियों की असुरक्षा के मामले में भारत सबसे ऊपर है। जनगणना आंकड़ों से भी पता चलता है कि भारत में महिला और पुरुष का अनुपात काफी असंतुलित है, जो प्रति 1000 पुरुषों पर महज 914 महिलाओं का है। आज यह एक आम धारणा बन गई है कि भ्रूण हत्या दहेज मांगों की वजह से होती है, क्योंकि परिवार दहेज की वजह से बेटियों को बोझ समझकर उन्हें पैदा ही नहीं होने देना चाहते। मैं इस विचार और तर्क से सहमत नहीं। दहेज बेटियों की अवमानना का कारण नहीं, बल्कि महज लक्षण है। दहेज केवल उन्हीं संप्रदायों में दिया जाता है, जिनमें बेटियों को संपत्ति अधिकार से वंचित किया गया है। यह कुचक्र अंग्रेजी शासन काल के दौरान चला, जिसके तहत भूमि बंदोबस्त अभियान व संपत्ति संबंधी कानूनों में बहुत से स्त्री विरोधी फेरबदल किए गए। इनमें सबसे अहम बदलाव मातृवंशी परिवारों को पितृवंशी संपत्ति वितरण प्रणाली की ओर धकेलना और परंपरागत सामूहिक पारिवारिक संपत्ति को निजी संपत्ति में बदल दिया जाना था। पारिवारिक सामूहिक संपत्ति की व्यवस्था आदिवासियों और जनजातियों में होती है, जिसमें हर एक को समान रूप से चाहे वह अजन्मा बच्चा ही क्यों न हो, को उत्तराधिकार का अधिकार था और इसे किसी भी तरह से चुनौती नहीं दी जा सकती थी, लेकिन बाद में जब पुरुष के हाथ में संपत्ति का अधिकार आ गया तो बेटियों का अधिकार लुप्त हो गया और इसके बदले में स्त्री धन अथवा दहेज की परंपरा शुरू हुई, जो क्षतिपूर्ति का एक रूप था। बेटियों को मिलने वाला दहेज कभी भी बेटों को मिलने वाली संपत्ति के बराबर नहीं रहा। इसके अतिरिक्त बेटों को अचल संपत्ति दी जाती है, जिसमें मकान, दुकान, व्यापार, जमीन आदि शामिल होता है, जबकि बेटियों को चल संपत्ति दी जाती है, जिनमें जीवन निर्वाह की चीजें, बर्तन, फर्नीचर, गहने आदि होते हैं। अब जब आर्थिक अधिकार से वंचित बहू ससुराल जाती है तो वह इसे पाना चाहती है, जिससे सास-ससुर और ससुराल वालों के साथ उसका टकराव लड़ाई-झगड़े में बदल जाता है। आज कानून तो बदल गया है, लेकिन मानसिकता नहीं बदली। बेटियों को अब भी पराया धन समझा जाता है और उसे माता-पिता के परिवार का अटूट अंग नहीं माना जाता, जिससे उसकी स्थिति कमजोर ही रहती है। इसके अलावा किसी भी समाज में जब सामाजिक हिंसा और अपराध बढ़ जाता है तो इसका सबसे ज्यादा प्रभाव स्ति्रयों पर होता है। भारत में भी पर्दा प्रथा, घूंघट, बुर्का आदि उन्हीं क्षेत्रों में पाया जाता है जो करीब एक हजार साल तक बाहरी हमलों से ग्रस्त रहे हैं। जो संप्रदाय महिलाओं की अस्मिता बचाने में अक्षम हुए उन्हीं संप्रदायों के पुरुषों ने स्ति्रयों को घूंघट में या चहारदीवारी में कैद किया। इस तरह बाहरी समाज से कटी इन महिलाओं में बाहरी दुनिया को समझ पाने और उन्हें झेलने की क्षमता खत्म होती गई और वे परनिर्भरता के लिए मजबूर हो गई। आज भी सरकार कानून एवं व्यवस्था के माध्यम से महिलाओं को सुरक्षा देने की बजाय अपराधियों को ही संरक्षण देती नजर आती है। ऐसे में माता-पिता के लिए बेटियों का समुचित पालन-पोषण कर पाना मुश्किल होता है। इसलिए असुरक्षा बोझ से मुक्त होने के लिए बेटियों की कम उम्र में शादी कर दी जाती है। इस तरह बेटियों के साथ एक अनवरत शोषण का सिलसिला शुरू हो जाता है। उत्तर भारत के गांवों में यह कथन आज भी कहा जाता है-जितने बेटे उतना लठ, जितना लठ उतना कब्जा। यानी संपत्ति की रक्षा के मामले में भी लड़कियों को कमतर आका जाता है, क्योंकि वे वह काम नहीं कर सकतीं जो पुरुष कर सकते हैं। निश्चित ही लड़ाई-झगड़े के काम में लड़कियां कमजोर होती हैं इसलिए वह परिवार के लिए उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह जातीं। इस कारण भी उनके साथ भेदभाव होता है। यह बात शहर और गांव, शिक्षित और अशिक्षित सभी पर लागू होता है। इस तरह की धारणा बेटी को अपंग और एक तरह से कमजोर बना देती है। बेटी को जहां पराया धन समझा जाता है वहीं बेटों को आज भी बुढ़ापे का सहारा माना जाता है। मां-बाप समझते हैं परिवार बेटों के बिना फल-फूल नहीं सकता, लेकिन यह धारणा इस देश में बूढ़े मां-बाप के लिए घातक सिद्ध हो रही है। भारत को परिवार की तुलना उन समाजों से करनी चाहिए जहां बेटियां उत्तराधिकारी होती हैं, जैसा कि थाईलैंड और मणिपुर आदि में हैं। यहां बेटे और बहुओं की तुलना में बेटियां उत्तराधिकारी होती हैं, जो मां-बाप की ज्यादा अच्छी देखभाल करती हैं। जाहिर है बेटियों के प्रति भेदभाव के नजरिए से न केवल परिवार कलह का शिकार हो रहे हैं, बल्कि कन्या भ्रूण हत्या के कारण लिंगानुपात बिगड़ रहा है और प्रत्येक पुरुष को जीवनसाथी नहीं मिल पा रहा। इससे जहां दुष्कर्म आदि की घटनाएं बढ़ रही हैं वहीं स्ति्रयों की खरीद-फरोख्त का बाजार फल-फूल रहा है। एम्स में जीवन-मौत से जूझ रही बच्ची के साथ हुआ दु‌र्व्यवहार इसी व्यवस्था और मानसिकता का परिणाम है, जिन्हें समूल नष्ट करने के लिए हमें समग्रता में विचार करने की आवश्यकता है। (लेखिका दिल्ली स्थित सामाजिक विज्ञान शोध केंद्र-सीएसडीएस में सीनियर फेलो हैं) 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

Tuesday, February 7, 2012

छोटी ‘फलक’ पर बड़े सवाल

मासूम-सी जान फलकएम्स में जिंदगी और मौत से जूझ रही है। ठीक हो भी गई तो उसका भविष्य क्या होगा, बताना बहुत मुश्किल है। इस बच्ची की कहानी ने देश को झकझोर कर रख दिया है। क्या वाकई इतने निर्मम हो सकते हैं माता-पिता, या पैसे की हवस ने उन्हें इतना अंधा कर दिया है कि वे अपने कलेजे के टुकड़े को देह की मंडी में बेच सकते हैं। हालांकि यह कोई एक फलक की कहानी नहीं है। ऐसी अगणित लड़कियां हैं जिनके साथ हर रोज अमानवीय अत्याचार होता है। कुछ को बमुश्किल न्याय मिल भी जाता है पर अधिकांश सिसिकयों में जिंदगी गुजार देती हैं। आधी आबादी की बदहाली के बारे में जनसंख्या संबंधी सरकारी आंकड़े जितने चौंकानेवाले हैं, कहीं उतनी ही भयावह है लोगों की मानसिकता। देश में नारी सशक्तीकरण की चाहे जितनी बातें होती हों, लेकिन हकीकत इसके बिलकुल विपरीत है। बेशक आज दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में महिलाओं ने हर बड़े मोर्चे संभाल रखे हों लेकिन आजादी के बाद से देश में महिला-पुरु ष अनुपात में तेजी से गिरावट आई है। शिशु लिंगानुपात में अब तक की सबसे बड़ी गिरावट पर स्वयं जनगणना आयुक्त भी गंभीर चिंता जता चुके हैं। यह गिरावट कन्या भ्रूण हत्या में वृद्धि की पुष्टि भी करती है। आंकड़ों के मुताबिक देश में 1000 बालकों के मुकाबले केवल 914 बालिकाएं हैं। यद्यपि देश का राष्ट्रीय औसत के अनुसार प्रति 1000 पुरु षों के मुकाबले 940 महिलाएं है। लेकिन दिल्ली में यह महिला अनुपात 866, चंडीगढ़ में 818, हरियाण में 877 और पंजाब में 893 के चिंताजनक स्तर तक लुढ़क गया है। केवल दक्षिण भारत की स्थिति ही कुछ बेहतर है। केरल देश का पहला राज्य है जहां प्रति हजार पुरु षों के मुकाबले 1084 महिलाएं हैं। समाज के कुलीन खानदानों की बात हो या गरीब तबके की; घर में लड़की के पैदा होने पर लक्ष्मी के आगमन का भाव अब नहीं उमड़ता है। एक पल के लिए चाहे खुशी होती भी हो लेकिन उसके लड़की होने का विचार तुरंत मन में घर बना लेता है। एक तरफ जहां हमारे वेद और शास्त्रों में नारी को पूजे जाने का उपदेश दिया गया है, वहीं हमारे मौजूदा पितृसत्तात्मक समाज में कहीं बेटियों को कोख में ही मार दिया जाता है, तो कहीं सरेआम उसकी अस्मत को बेरहमी से कुचला जाता है। कहीं पुरु ष मनोग्रंथि के चलते, तो कहीं समाज में अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करने के लिए स्त्री के शरीर को जागीर समझकर उस पर जुल्म ढाए जाते हैं। समाज पर पुरुष की प्रधानता का इससे बेहतर प्रमाण और क्या हो सकता है कि जितनी भी गालियां प्रचलित हैं वह मां और बहन के अपमान से ही संबंधित हैं। देश के कुछ हिस्सों में महिला-पुरुष अनुपात में गैरबराबरी बेहद चिंता का विषय है। हालात ऐसे बन गए हैं कि कुछ जगहों पर तो लड़कों को शादी के लिए लड़कियां तक नहीं मिल रही हैं। यह हालत दरअसल उस चिंताजनक सोच का परिणाम है, जिसमें राह चलती लड़कियों में लोगों को सिर्फ अपनी काम वासना शांत करने का सामान ही दिखाई देता है। देश में कन्या भ्रूणहत्या के पीछे महज बेटे की चाहत ही एकमात्र कारण नहीं है। समाज में आज एक लड़की के माता-पिता उसको लेकर हमेशा चिंतित और किसी अनहोनी की आशंका से ग्रस्त रहते हैं। वह हर पल इस चिंता में जीते हैं कि कहीं उनकी बेटी केसाथ कुछ ऐसी- वैसी.. बात न हो जाए। महानगरों में लड़कियों और महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध ने अभिभावकों को भीतर तक भयभीत कर दिया है। दिल्ली तो घोषित रूप से महिलाओं के लिए असुरक्षित शहर बन गया है, जहां सुरक्षा के इतने भारी बंदोबस्त के बावजूद हर दूसरे दिन किसी लड़की के साथ यौन अत्याचार होता है। मुंबई में भी महिलाओं के प्रति लोगों का रवैया खास अलग नहीं है। दरअसल, यह रवैया समाज की नारी विरोधी मानसिकता को दर्शाता है। आज बदलते दौर के साथ नारी कहीं भी पुरु षों से पीछे नहीं रहना चाहती और प्रतिस्पर्धा की भावना से छोटे-छोटे गांवों और कस्बों से लड़कियां महानगरों का रु ख कर रही हैं, लेकिन शहर उनके लिए बुरे सपने जैसे साबित हो रहे हैं। महिलाओं के साथ होने वाले ऐसे जघन्य अपराधों के पीछे समाज की दूषित सोच ही जिम्मेदार है। नतीजा यह कि स्कूल, कॉलेज और नौकरी के लिए लड़कियां घर से बाहर जरूर निकलती हैं, लेकिन वापस उनके वापस आने तक मां-बाप बेचैन रहते हैं। स्वयं घर से बाहर कदम रखते समय लड़कियां बहादुर और आत्मविास से भरे होने का आवरण जरूर ओढ़े रहती हैं, लेकिन वे हमेशा अनहोनी की आशंका के साए में जीती हैं। महिलाओं में इस प्रकार का डर निराधार नहीं है। पुरुष प्रधान समाज में लड़कों पर कोई आंच आ जाए तो उन्हें बहुत फर्क नहीं पड़ता, लेकिन यदि अथक सतर्कता के बावजूद लड़की के दामन पर कोई दाग लग जाए तो वह और उसके माता-पिता जीवन भर उस कलंक के साथ जीने को अभिशप्त हो जाते हैं, बावजूद कि इसके लिए लड़की कतई जिम्मेदार नहीं होती। यह विकृत सामाजिक सोच का ही नतीजा है कि कोई भी व्यक्ति ऐसी लड़की को अपनाने के लिए तैयार नहीं होता। मां-बाप जीवन भर अपने भाग्य को कोसते रहते हैं। तब वे यही सोचते हैं कि काश हमारी औलाद लड़की नहीं होती। महिलाओं और लड़कियों के प्रति समाज की ऐसी ही सोच के कारण कन्या भ्रूण हत्या का चलन बढ़ गया है और हालात ऐसे बन गए हैं कि बेटियां कम होती जा रही हैं। हालांकि कई राज्यों में सरकारों ने कन्या जन्म प्रोत्साहन के लिए कई योजनाएं प्रारंभ की हैं, लेकिन उनके बहुत अच्छे और सकारात्मक परिणाम अब तक सामने नहीं आ पाए हैं। यह विचारणीय है कि आखिर क्यों सरकारी योजनाएं भी लड़कियों के प्रति समाज की मानसिकता बदलने में कामयाब नहीं हो पा रही हैं? इसका जवाब लोगों को अपने अंदर खोजना पड़ेगा। विचारों और नजरिए का शुद्धिकरण करना होगा अन्यथा ऐसे ही बेटियां कोख में मारी जाती रहेंगी।

Tuesday, January 24, 2012

पड़ोसी राज्यों के कारण दिल्ली में लड़कियां कम


2011 के जनगणना के आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में छह साल तक की उम्र की लड़कियों की तादाद में भारी कमी आई है। यहां तक कि यह प्रति एक हजार लड़कों पर दिल्ली में लड़कियों की संख्या देश के अनुपात से भी कम हैं। दिल्ली में लड़के व लड़कियों के जन्म दर के अनुपात में भारी अंतर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के चिंता जताने के बाद से दिल्ली सरकार हरकत में है। हालांकि दिल्ली सरकार ने लड़कियों की जनसंख्या में कमी के लिए पड़ोसी राज्यों की खराब स्वास्थ्य स्थिति को ही जिम्मेदार ठहराया है। देश की ताजा जनगणना के अनुसार दिल्ली में छह साल तक बच्चों में हर हजार लड़कों के बीच 866 लड़कियां ही बची हैं। 2001 में दिल्ली में यह अनुपात 868 थी। दिल्ली में लड़कियों का अनुपात इस बार राष्ट्रीय अनुपात 914 से भी कम है। 2001 में राष्ट्रीय अनुपात 927 था। सरकार के महिला व बाल कल्याण विभाग ने लड़कियों की जन्म दर में वृद्धि सुनिश्चित करने को लेकर व्यापक अभियान छेड़ने की घोषणा की है। दिल्ली की समाज कल्याण तथा महिला व बाल विकास मंत्री किरण वालिया ने कहा कि गर्भवती महिलाओं के लिए पड़ोसी राज्यों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं न होने के कारण लड़कियों के अनुपात में यह कमी आई है। चूंकि पड़ोसी राज्यों की गर्भवती महिलाएं दिल्ली आकर बच्चे को जन्म देती हैं और जब प्रसव के दौरान शिशु की मृत्यु हो जाती है तो वह आंकड़े दिल्ली की छवि को ख्रराब करते हैं। एक प्रेसवार्ता में वालिया ने इस मसले पर कहा कि दिल्ली के अस्पतालों में आप देखेंगे कि 30 से 35 फीसदी मरीज दिल्ली के बाहर के होते हैं। वालिया ने कहा कि 24 जनवरी को कन्या शिशु दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने पिछले साल सितंबर में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पत्र लिखकर राजधानी में लड़कों के अनुपात में लड़कियों की जन्म दर में अंतर पर चिंता जताई थी। प्रो. किरण वालिया ने कहा कि सरकार बेटियों को लेकर समाज में व्याप्त सोच में बुनियादी परिवर्तन लाने को हरसंभव उपाय करेगी। उन्होंने बताया कि कन्या भ्रूण हत्या की प्रवृत्ति सबसे ज्यादा शहर के पढ़े-लिखे तबके में है। उन्होंने स्वीकार किया कि लड़कियों की संख्या बढ़ाने के लिए कन्या भ्रूण की जांच करने वालों और गर्भपात कराने वालों के खिलाफ भी व्यापक अभियान चलाने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि उनके विभाग ने गैर सरकारी संगठन सन फाउंडेशन के साथ मिलकर काम करना तय किया है। फाउंडेशन की ओर से कुछ गाडि़यां भी विभाग को दी गई हैं। ये गाडि़यां हर जिले में गली-गली जाकर जागरूकता फैलाने का काम करेंगी। इस काम में आंगनवाड़ी से जुड़ी महिलाओं का भी सहयोग लिया जाएगा।

Wednesday, December 14, 2011

इस जीत के मायने


उड़ान के दौरान महिला क्रू मेंबर्स के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ दशकों से जारी संघर्ष में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। महिलाओं के एक छोटे-से समूह ने हासिल की यह छोटी-सी जीत जो सुपरवाइजर पद से संबधित है, महिलाओं के विभिन्न स्तरों पर जारी भेदभाव के खिलाफ एक अहम जीत है। बता दें कि एयर इंडिया के विमान के अंदर काम करने वाली महिलाओं ने अपने लिए बराबर के ओहदे की मांग की थी। यहां उड़ान के दौरान काम करने वाली महिलाओं को सुपरवाइजर का पद नहीं मिलता था। सुपरवाइजर सिर्फ पुरुष ही हो सकता था, जबकि सारी जिम्मेदारियां वे बराबर की निभाती थीं। वरिष्ठ महिला कर्मचारी जिन पुरुष कर्मचारियों को प्रशिक्षण देती थीं, वे भी उनके सुपरवाइजर बन सकते थे, लेकिन महिला होने के नाते उन्हें यह कार्यभार नहीं सौंपा जा सकता था। सुप्रीम कोर्ट ने गत 17 नवंबर को अपने एक फैसले में कहा कि इस भेदभाव का कोई आधार नहीं है और महिलाएं इस ओहदे की हकदार हंै। इस प्रतिरोध में विशेष बात यह देखने वाली है कि आमतौर पर लड़ाई मैनेजमेंट से लड़नी पड़ती है, लेकिन यहां मैनेजमेंट यानी एयर इंडिया ने 2005 में अपनी नीति में बदलाव करते हुए सुपरवाइजर का दर्जा सिर्फ पुरुषों तक सीमित रखने के अपने मध्ययुगीन किस्म के नियम को समाप्त कर इस पद पर महिलाओं की नियुक्ति को भी सुगम बनाया था। प्रबंधन के इस निर्णय को पुरुष सुपरवाइजरों ने चुनौती दी थी। कोर्ट में अपील दायर की गई थी कि वे महिला सुपरवाइजरों के मातहत काम नहीं कर सकते हंै। वर्ष 2007 में दिल्ली हाईकोर्ट ने एयर इंडिया के इस फैसले को सही ठहराया था, तब अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट गए थे। एयर इंडिया में न सिर्फ इस स्तर पर, बल्कि विभिन्न स्तरों पर महिला कर्मचारियों को जेंडर भेदभाव का सामना करना पड़ता है तथा इसके खिलाफ संघर्ष भी चलते रहे हैं। जैसे कि रिटायरमेंट की उम्र महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग होती है। यदि महिला कर्मचारी अपनी नियुक्ति के शुरुआती चार साल के भीतर गर्भवती हो गई तो उसे नौकरी छोड़नी पड़ती थी या उसका वजन मानक से अधिक नहीं होना चाहिए जैसी शर्त थी। इन सारे भेदभावों का आधार कहीं भी यह नहीं था कि वे अपनी जिम्मेदारी निभाने में कमतर या अक्षम थीं, बल्कि वजह उनका औरत होना था। अगर हम दूसरे क्षेत्र की कामकाजी महिलाओं के संघर्षो की तरफ ध्यान दें तो वहां भी यहीं साधारण-सी मांग है कि कार्यस्थलों पर उन्हें बराबर का अवसर और जिम्मेदारियां सौंपी जाएं। सिर्फ औरत होने के नाते योग्यता और क्षमता पर प्रश्न खड़ा करने का तुक क्या है? आखिर सेना में स्थायी कमीशन की मांग की वजह यही तो रही है कि उनकी नौकरी के दस साल पूरे होने पर उन्हें अनिवार्यत: रिटायर कर दिया जाता था, जबकि पुरुषों को नौकरी में बने रहने का विकल्प था। कानूनन कोर्ट ने महिलाओं को यह अवसर देने के पक्ष में फैसला सुनाया है, लेकिन अभी यह फैसला फौज के सिर्फ उसी विभाग पर लागू है, जिस विभाग की महिला कर्मचारियों ने कोर्ट में चुनौती दी थी। फौज में अभी विभिन्न स्तरों पर गैरबराबरी कायम है। समझने वाली बात है कि महिलाएं आखिर कौन-सी बड़ी सत्ता की या सुपर कर्मचारी बन जाने की मांग कर रही हैं। वे यही तो मांग रही हंै कि उन्हें सिर्फ औरत होने के नाते बराबरी से वंचित न किया जाए। कभी कहा जाता है कि औरत हो, इसलिए रात में काम न करो तो कभी अघोषित रूप से नियुक्ति या पदोन्नति के रास्ते बंद किए जाते हैं। इतने बंधनों या अवरोधों वाले समाज में जब तुलनात्मक रूप से छोटे हिस्से की लड़ाई में कानूनी जीत हो या मैनेजमेंट या सरकार मांगें मान ले या एयर इंडिया जैसे खुद ही नीति बनाकर कम से कम कुछ गैरबराबरियों को ही समाप्त किया जाए तो वह शेष कामकाजी महिलाओं को अपने कार्यस्थल पर भी बराबरी की मांग करने का हौसला भी देता है। अभी तो पता नहीं कितने स्तरों, मोर्चो और क्षेत्रों में गैरबराबरी कितने रूपों में कायम रखी गई है, इसका पूरे समाज को पता भी नहीं है। जब कोई विरोध करता है या मुकदमा कोर्ट-कचहरी में जाता है, तब कई बातों का पता भी लगता है। जैसे कानून पढ़ने या कानूनी पेशा में रहने वालों को छोड़ दें तो किसे पता था कि कानून की भाषा में महिलाओं के लिए रखैल ंशब्द अब भी इस्तेमाल होता है। बराबर काम का बराबर वेतन औरत का हक है और इसे लागू नहीं करना किसी भी सरकार या निजी कंपनी या कोई भी नौकरी पेशा हो तो नियोक्ता की तरफ से इसे अपराध माना जाना चाहिए। हालांकि श्रम कानून के अंतर्गत बराबरी का नियम होता है, लेकिन हर जगह जेंडर भेद के लिए रास्ते निकाल लिए जाते हैं। दरअसल, ऐसे हालात तैयार करना भी सरकार और नियोक्ता की जिम्मेवारी बनती है, जिसमें महिलाएं बराबर का काम कर सकें और उन्हें बराबर की सारी सुविधाएं भी मिले। हमारे संविधान का अनुच्छेद 15 व्यवस्था देता है कि भारत का हरेक नागरिक लैंगिक तथा जातीय भेदभाव से मुक्त जीवन का अधिकारी है यानी ऐसे भेदभाव करना कानूनी अपराध माना जाएगा, लेकिन यहां की महिलाएं नागरिक होते हुए भी आसानी से और धड़ल्ले से आर्थिक शोषण की शिकार होती आई हैं। असंगठित क्षेत्र में यह भेदभाव अधिक देखने को मिलता है। आज भी कुशल श्रमिक के रूप में महिलाएं कुल श्रमशक्ति में बराबर का हिस्सेदार नहीं बन पाई हैं। श्रम मंत्रालय की एक रिपोर्ट इस बात का खुलासा करती है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार, महिला श्रमिकों की संख्या 12 करोड़ 72 लाख है, जो उनकी कुल संख्या 49 करोड़ 60 लाख का चौथा ( 25.60 प्रतिशत) हिस्सा ही हुआ। इनमें भी अधिकांशत: ग्रामीण क्षेत्र में हैं और उनका प्रतिशत ऊपर दी हुई कुल महिला श्रमिकों की संख्या का तीन हिस्से से भी ज्यादा (87 प्रतिशत) कृषि संबंधी रोजगार में है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह विचार भी व्यक्त किया कि उसे समझ नहीं आता कि आखिर 1997 में एयर इंडिया ने किस आधार पर जहाज के अंदर उड़ान के दौरान महिला सुपरवाइजर की पोस्ट से इनकार किया है। ऐसे कितने ही अवसरों और कार्यो के लिए जब-जब महिला विरोधी नीतियां बनती होंगी तो आखिर क्या-क्या कारण गिनाए जाते होंगे? यही न कि फलां काम उनके लिए नहीं है या वे यह नहीं कर पाएंगी, लेकिन मौका मिले तभी तो पता चल पाएगा कि क्यों नहीं कर पाएंगी। दरअसल, आज भी यह एक बड़ा मुद्दा है कि सार्वजनिक दायरा तथा हर प्रकार के कार्यस्थलों पर महिलाओं के लिए पूर्ण बराबरी कैसे कायम हो। इस दिशा में गैरबराबरी के खिलाफ महिलाओं द्वारा किया गया छोटा-मोटा संघर्ष भी बदलाव की बयार लाता है। इसलिए जरूरत है सबसे पहले नाइंसाफी को पहचानने तथा इस धारणा को पुराना करने की कि बराबर का काम हमारा हक है और औरत होने के नाते इससे वंचित नहीं किया जा सकता है। (लेखिका स्त्री अधिकार संगठन से जुड़ी हैं)