मुख्तारन माई बलात्कार मामले में पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने छह आरोपियों में पांच को बरी करने के लाहौर हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इस फैसले से पाकिस्तान में मानव अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले लोगों को काफी निराशा हुई है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुनने के बाद मुख्तारन माई टूट सी गईं, उनकी आंखों से गम के आंसू टपकने लगे। इस फैसले से आहत मुख्तारन माई इसके खिलाफ कोई अपील नहीं करने का निर्णय लिया है। मुख्तारन के मुताबिक अनपढ़ होने की वजह से पुलिस बलात्कार के आरोपियों के खिलाफ दायर की गई एफआइआर को जानबूझ कर कमजोर बनाया ताकि मुजरिमों को मुकदमे के फैसले में राहत मिल सके। हालांकि अदालत के सामने मेडिकल रिपोर्ट भी पेश की गई थी, जिसमें उसके साथ बलात्कार होने की पुष्टि हुई। फिर भी इस हकीकत पर अदालत ने गौर नहीं फरमाया? दरअसल पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मुल्क में उन लोगों को नहीं पच रहा जो मुख्तारन माई के प्रति हमदर्दी रखते हैं। लोगों के अनुसार अगर सुप्रीम कोर्ट को लाहौर हाइकोर्ट का फैसला ही बरकरार रखना था तो मुख्तारन का वक्त जाया क्यों किया गया? मुख्तारन का कहना है कि वह पिछले दस सालों से अदालतों के चक्कर लगा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद उसे किसी और अदालत पर विश्वास नहीं रह गया। अब सिर्फ अल्लाह की अदालत है जहां से मुझे उम्मीद है। यह बेबसी जुल्म की शिकार उस पाकिस्तानी औरत की है जिसने खुद की जिंदगी को उस खौफनाक वाकये के बाद भी खत्म न करके पाकिस्तान समेत समूचे दक्षिण एशिया की लाचार औरतों के लिए प्रेरणादायक बनाया। पाकिस्तान में महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाओं ने भी इस फैसले का कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि स्वतंत्र संज्ञान के बाद भी यह फैसला आता है तो मुल्क के कानून पर से लोगों का यकीन खत्म हो जाएगा। देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पाकिस्तान की औरतों के लिए इम्तिहान का दिन है। इस फैसले के बाद यह कहने में तनिक भी गुरेज नहीं कि यह मुल्क औरतों के हक औऱ उनकी आबरू के लिए महफूज नहीं है। मुख्तारन समेत पाकिस्तान की हर वो औरत जो किसी न किसी तरह की जुल्म की शिकार हुईं हैं वो इस फैसले से बेहद नाखुश हैं। गौरतलब है कि मीरवाला गांव में पंचायत के एक फैसले के नतीजे में मुख्तारन माई के साथ 22 जून, 2002 को सामूहिक बलात्कार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने लाहौर हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए मुख्तारन माई के मुकदमे में छह में से पांच अभियुक्तों को रिहा करने का आदेश दिया है। इससे पहले स्थानीय अदालत ने मुख्तारन माई के साथ सामूहिक बलात्कार करने के आरोप में छह अभियुक्तों को मौत की सजा सुनाई थी। पंचायत का आरोप था कि मुख्तारन माई के भाई शकूर का मस्तोई कबीले की एक औरत से नाजायज ताल्लुकात हैं और उस वजह से मुख्तारन माई को यह सजा दी गई। क्या एक बारह साल का लड़का किसी औरत के साथ नाजायज रिश्ता कायम कर सकता है यह बहुत बड़ा सवाल है? पाकिस्तान में एक टेलीविजन चैनल को दिए इंटरव्यू में मुख्तारन ने कहा कि पंचायत का फैसला पूर्व नियोजित था। जिसने पहले से यह तय कर रखा था कि उसे क्या करना है? मेरे भाई शकूर को मोहरा बनाकर मेरी आबरू को तार-तार किया गया। इस बर्बर घटना के करीब छह दिनों बाद मीरवाला की एक मस्जिद के इमाम ने जुमे की नमाज से पहले लोगों से कहा था कि वह इस सामूहिक बलात्कार का कड़ा विरोध करें और पुलिस को इस बारे में इत्तला करें। उसके बाद पहली दफा यह यह मामला पाकिस्तानी मीडिया में आया। उसके बाद अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने पूरे मामले को प्रकाशित किया। लिहाजा मुख्तारन माई के साथ हुए अन्याय की कहानी पूरी दुनिया में फैल गई। 30 जून, 2002 को पाकिस्तान की स्थानीय पुलिस ने 14 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया और मामले की सुनवाई शुरू हो गई। जिला अदालत ने 31 अगस्त, 2002 को छह लोगों को मौत की सजा सुनाई थी और आठ लोगों को बरी करने के आदेश दिए थे। तीन मार्च 2005 को यह मामला लाहौर हाइकोर्ट के मुल्तान खंडपीठ पहुंचा और अदालत ने ठोस सबूतों की कमी की बुनियाद पर इस मुकदमे में पांच लोगों को बरी कर दिया, जबकि मुख्य अभियुक्त अब्दुल खालिक की सजा-ए-मौत को उम्रकैद की सजा में तब्दील कर दिया। हालांकि पाकिस्तान की सर्वोच्च इस्लामी अदालत शरिया कोर्ट ने लाहौर हाइकोर्ट के फैसले का विरोध किया और कहा कि इस्लामी नियमों के अधीन हाइकोर्ट इस मामले में किसी भी अपील को सुनने का अधिकार नहीं रखती। 14 मार्च, 2005 में पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और कहा कि वह ख़ुद इस मामले को सुनेगा। वर्ष 1972 में पैदा हुई मुख्तारन माई को बलूच पंचायत की ओर से इज्जत के नाम पर सजा सुनाई कि उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया जाए। मस्तोई बलूच कबीले के कुछ लोगों ने ऐसा ही किया। अमूमन औरतें इस तरह की घटना के बाद खुदकुशी कर लेती हैं, लेकिन मुख्तारन उसके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। दरअसल, मुख्तारन का यह किरदार सिर्फ मुकदमा जीतने और गुनहगारों को सजा दिलाने तक सीमित नहीं है। उन्होंने मीरवाला में वीमेन वेलफेयर आर्गेनाइजेशन की बुनियाद रखी। लड़कियों के लिए स्कूल खोला, क्योंकि उनका मानना है कि पढ़ी-लिखी होने पर उनके साथ इस तरह का अन्याय नहीं होगा। मुख्तारन माई को कई बार जान से मारने की धमकियां भी मिली। बावजूद इसके उसने अपना निर्णय नहीं बदला। पूरे पाकिस्तान में मुख्तारन माई का नाम इतना बड़ा हो गया है कि कोई आसानी से उन्हें छूने की हिम्मत नहीं करेगा। यह बात पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति मुशर्रफ के उस बयान के बाद और साफ हो गई जिसमें उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था कि यह कोई बड़ा मसला नहीं है। कुछ औरतें विदेश जाने और पैसे ऐंठने के लिए ऐसी कहानियां गढ़ती हैं। मुशर्रफ उस समय अपनी किताब के सिलसिले में अमेरिका में थे। उनके इस बयान पर दुनियाभर में आलोचना हुई और आखिरकार राष्ट्रपति सचिवालय को कहना पड़ा कि उनके बयान को गलत ढंग से छापा गया है। मुख्तारन माई को अमेरिकी सीनेट को संबोधित करने के लिए बुलाया गया। मगर उसे पाकिस्तानी सरकार ने वीजा नहीं दिया। इसके बाद भी मुख्तारन माई झुकी नहीं और अपने साथ हुए इस अत्याचार को पाकिस्तान की हर महिला के अधिकारों की लड़ाई बना दिया। इसी से वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आई। कई देशों में मुख्तारन माई के लिए सहानुभूति बढ़ गई और न्याय के लिए संघर्ष करने पर उन्हें कई पुस्कार भी मिले, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले से मुख्तारन माई जैसी जीवट महिला के हौसले में कमी आई है। क्या न्याय का तकाजा यही है कि दरिंदे को उसकी सजा न देकर उसे रिहाई का तोहफा दिया जाए, ताकि समाज में ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पीणकार हैं).
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Saturday, April 23, 2011
Wednesday, February 23, 2011
सुटेबल दब्बूपन
औरतों को घर से निकलना इतना डरावना क्यों लगता है? यह डर कैसे खत्म हो सकता है? डराने वालों का क्या किया जाए? इस पर कभी कोई बहस नहीं सुनी हो गी आपने। डर तो पुरुषों से है। पुरुषों की रची गई व्यवस्था है। ये वही पुरुष हैं, जिनको डरी हुई औरत अच्छी लगती है। वे भूल जाते हैं कि जो घर में डरी/सहमी रहती है, वह बाहर दबंगई कैसे दिखा सकती है
औरतों का दब्बूपन पुरुषों को बड़ा भाता है। वे डरी, सहमी औरत को ‘आइडियल’ मानते हैं। उनकी तारीफ में कशीदे काढ़ते हैं और तेजतर्रार लड़कियों को बुरा बताकर खुश हो लेते हैं। इस बीच कई तरह के सव्रे आये, जिनमें से लगभग सब का कहना है कि औरतें समाज में खुद को असुरक्षित पाती हैं। उनको घर से बाहर अकेले निकलने में डर लगता है। सार्वजनिक वाहनों में उनके साथ पुरुष छेड़छाड़ करते हैं। रास्ते में चलते हुए पुरुषों की जुबान से निकली घिनौनी भाषा उनके कानों में पड़ना आम बात है। सव्रे करने वालों का काम यहीं खत्म हो जाता है। लेकिन इसके बाद किसको क्या करना है, यह किसी को नहीं मालूम। औरतों को घर से निकलना इतना डरावना क्यों लगता है? यह डर कैसे खत्म हो सकता है? डराने वालों का क्या किया जाए? इस पर कभी कोई बहस नहीं सुनी होगी आपने। डर तो पुरुषों से है। पुरुषों की रची गई व्यवस्था है। ये वही पुरुष हैं, जिनको डरी हुई औरत अच्छी लगती है। वे भूल जाते हैं कि जो घर में डरी/सहमी रहती है, वह बाहर दबंगई कैसे दिखा सकती है। पहले घर की औरत/लड़की के भीतर हिम्मत भरिए। पहले उसको साहस का पाठ पढ़ाइए, फिर उससे उम्मीद करिए कि अपने प्रति हो रहे अपराधों के खिलाफ मुंह खोले। किसी इंटरटेंमेंट चैनल पर यह देख कर मैं भौचक रह गयी, जिसमें एक सीन में चाची/बुआ टाइप की कोई कैरेक्टर एक लड़की से सच उगलवाने के लिए उसके बाल पकड़ कर पानी से भरे टब में उसका मुंह डुबो रही थी। उसके इर्द-गिर्द परिवार के ढेर सारे सदस्य अपने मेक-अप पुते चेहरों के साथ बिना किसी एक्सप्रेशन के खड़े थे। इस तरह के तमाम सीरियल मनोरंजन के नाम पर परोसे जा रहे हैं, जिनको लोग खूब मजे लेकर देखते हैं। मैं निश्चित रूप से यह कह सकती हूं कि ये सब वही लोग हैं, जिनको औरतों को सताना, उनको रोते-बिसुरते देखने की आदत इतने गहरे है। जो औरतें घर में ही सताई जा रही हैं, जिनको सांस लेने तक के लिए मुंह तकना पड़ता है, उनसे यह उम्मीद करना भी हास्यास्पद है कि वे रास्ते में होने वाली उद्दंडताओं का करारा जवाब देने का साहस कर सकती हैं। करारा जवाब देने के लिए हिम्मत होनी चाहिए, आत्मविश्वास होना चाहिए। भीतर से खुद को कमजोर मान कर अपराध सहते रहने की झिझक से बाहर निकलना चाहिए। जिस संकोच और शर्मीलेपन को अपने खांटी समाज में लड़की का गहना बता कर प्रचारित किया जाता रहा है, वही आज उसके गले की हड् डी बनता जा रहा है। ये जो हर घंटे एक नवविवाहिता दहेज लोभियों की कृपा से जिन्दा जला कर मार दी जाती है, ये सब कौन हैं? जी हां, ये लड़कियां भी वही हैं, जिनको लज्जा के गहनों से लादा है आप सबने। उद्दंडता और उपद्रवी होने की सलाह नहीं दे रही मैं, पर इतना तो समझिए कि लड़कियों का दब्बूपन उनके लिए जानलेवा साबित होता है। जो लड़कियां पति के र्दुव्यवहार के खिलाफ जुबान हिलाने से र्थराती हैं, उनसे यह उम्मीद करना कि वे दफ्तरों में अपने बॉस की ओछी हरकतों के खिलाफ एक लफ्ज भी बोलेंगी, संभव ही नहीं। ‘साहस’ कोई वेंटिलेटर नहीं होता, जिसे जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल किया जाता रहे। साहस जन्मजात होता है, जिसको सामाजिक/पारिवारिक परिवेश में डेवलप किया जाता है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, जब दिल्ली की मेट्रो में औरतों के लिए अलग कोच आरक्षित किये गये थे। ढेरों पुरुषों का ईगो हर्ट हो गया। कुछ उपद्रवी तो तैश में आकर आरक्षित कोच को कब्जाने की चाह में भीतर भी घुस आये पर लड़कियों/औरतों ने उनकी जमकर इतनी पिटाई की कि वे कुछ सोचने लायक ही नहीं रहे। लड़के सिर्फ तभी तक इस तरह की हरकतें कर सकते हैं, जब तक लड़कियां पलट कर वार नहीं कर रहीं। जिस दिन वे मान लेंगी कि अब इनका एक भी ताना नहीं सुनना, उस दिन स्थिति खुद-ब-खुद बदल जाएगी। बता रहे हैं कि इस वैलेंटाइन डे पर शादी का आवेदन करने वाले जोड़ों में से कई गुना ज्यादा वे जोड़े थे, जो इच्छा से एक-दूसरे से अलग हो जाना चाहते थे। प्यार के खिलाफ झंडा फहराने वालों को तो यह मन ही मन बहुत भला सा लगेगा। पर सच तो यही है कि रोज-रोज की किच-किच से तो अच्छा ही है, प्रेम के साथ अलग हो जाना। साथ ना रहने का मतलब यह भी नहीं कि एक-दूसरे के दुश्मन बन जाएं। ये बदलाव सोसाइटी को अखरना लाजमी है, क्योंकि ऐ से सकारात्मक कदम औरतों की ही हिम्मत से उठते हैं। वे संबंधों में दुश्मनी नहीं निकाला करतीं, जैसा पुरुष करते आये हैं। वे बुरे से बुरे रिश्ते को झेलती रही हैं, पर अब उनका बढ़ता आत्मविश्वास, हर स्थिति के लिए उन्हें मजबूत कर रहा है। वे अपनी सारी ऊर्जा ब्याह के गठबंधन को ही बचाने के लिए नहीं जाया करती रहना चाहती। ऊर्जा के सकारात्मक उपयोग के लिए जरूरी है , निगेटिविटी से छुटकारा पाना और यह छुटकारा कोई और तो देगा नहीं, इसलिए कदम खुद ही बढ़ाने होंगे। सबक के तौर पर याद रखने लिए अभी-अभी आई एक खबर औरतों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। 53 साल के बेटे के खिलाफ एक मां ने गवाही दे कर उसके अपराधी होने का सबूत दिया। 15 जुलाई 2008 को उसके दो बेटों सुभाष और राजेन्दर के बीच झगड़ा हो गया। सुभाष ने राजेन्दर को ऐसा धक्का दिया कि उसका सिर सीढ़ियों से टकरा गया। मां के बीच-बचाव की कोशिशों के बावजूद सुभाष ने ईट से उसका सिर फोड़ा और भाग गया। यह उस बूढ़ी मां के साहस की मिसाल है, जिसने एक बेटा तो पहले ही खो दिया था और दूसरे के खिलाफ की गवाही न देकर उसको उम्र कैद होते देख रही है। यदि वह भी ममतालू होकर, टेसू बहाती बैठी रह जाती तो अपराध को साबित करना इतना आसान ना होता। यह सब कैसे संभव हुआ, इसके लिए उस मां को जरूर समझना चाहिए। क्योंकि वह आज के जमाने की जीती-जागती ‘मदर इंडिया’
है, जिस पर भले ही कोई उपन्यास ना लिखे, फिल्म ना बनाये पर उसने जो लाइन खींची है, उसके आगे ममता की तमाम लकीरें बौनी हो चुकी हैं। हम उसी समाज में उस मां को देख रहे हैं, जहां इज्जत के नाम पर बेटियों को मार डालने वाले पतियों और बेटों के पक्ष में बोलने वाली मांओं की मजबूरी अकसर उनके चेहरे से टपकते देखते हैं। यह उन औरतों का संकोच है, भय है। जो उनको निष्पक्ष होकर सोचने भी नहीं देता। जो उनकी ममता पर सिर्फ बेटे की मां होने का लेमिनेशन कर देता है। यह डर इतना निष्ठुर और नीरस होता है कि इनकी ममता अपनी कोख जायी बेटी को जीने भी नहीं दे सकता। ऐसे भय से मुक्ति की तो कोई र्चचा ही नहीं होती। जो औरत के पूरे चरित्र को संदेहास्पद बना देता है, जिसकी मसखरी करने वाला हर मर्द कमजोरी कहता फिरता है। औरतों की तथाकथित कमजोरियों को ही यदि प्रयास करके हथियार बना दिया जाए तो तय रूप में यह सामाजिक व्यवस्था चरमरा जाएगी। उसको कमजोर बताकर, उसकी निर्ण य क्षमता पर उं गली उठाकर, उसको सुबह-शाम दयनीयता की याद दिला कर ही मर्दवादी सत्ता ने उस पर शासन किया है। जिस दिन औरतों को अपने दब्बूपन का अहसास हो जाएगा, उस दिन ऑटोमेटिक तमाम अपराधों के खिलाफ वे एकजुट हो जाएंगी। सहना, बर्दाश्त करना, चुप रह जाना तब मुहावरे रह जाएंगे। सच तो यह है कि जीवन तभी सुखकर और मधुर हो सकता है, जब औरतों पर होने वाले भावनात्मक अतिक्रमण को तिलांजलि दे दी जाए। इसके लिए प्रयास पुरुषों को ही करने हैं, यदि वे नहीं करेंगे तो वह दिन दूर नहीं, जब औरतें गद्दाफी/हो स्नी मुबारक की तर्ज पर उनको दर-ब-दर करने को मजबूर हो जाएंगी!
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