पुरुष व्यवस्था की मारी हुई हमारी तथाकथित विवेकशील स्त्रियों में उन विचारों की बहुत कमी है, जो किसी औरत के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने या कि उसके लिए प्राणरक्षक की भूमिका में बेहतर सिद्ध हो सकते हैं। पंजाब महिला आयोग की टिप्पणी को प्रख्यात साहित्यकार कृष्णा सोबती पढ़कर हंस पड़ी होंगी या कि महिला आयोग पर अफसोस किया होगा? तस्लीमा जी भारतीय प्रबुद्ध महिलाओं के इस कदम को कैसे देखेंगी? कितनी चिंता है हमें विवाह संस्था के कुपोषण के लिए, परिवारों को क्षतिग्रस्त होने के लिए और कितना डर है? हमारे पुरुष वर्ग को अपने वर्चस्व को क्षीण होते जाने की आशंका का। हम मान रहे हैं कि अभी स्त्रियां पूरी तरह मजबूत नहीं हुई हैं, जबकि इन दिनों पुरुष-सत्ता में ले-दे मची हुई है। एक छोटी सी बातूनी डिबिया (मोबाइल फोन) औरत के हाथ में क्या आयी कि समाज में हाहाकार मच उठा, जैसे औरत ने एके-47 थाम ली हो। इसमें शक नहीं कि बहू हो या बेटी, जब मोबाइल के जरिये किसी से बात कर रही होती है, अभिभावकों का दिल र्थरा उठता है। पत्नी को फोन कान से लगाये और चटर-पटर बात करते हुए देखकर पति को अपने आसपास ही किसी खलनायक की बू आती है। सव्रे करके देख लिया जाए कि कितने परिवार अपनी कुंआरी बेटियों और जवान बहुओं के पास मोबाइल होने के पक्ष में है? हमारा दावा यह भी है कि प््राा इ व्ाे ट बतकही के लिए ज्यादातर परिवार या ससुराल पक्ष तैयार नहीं होंगे। हमने मान लिया है कि शासकों के सिंहासन डगमगाने लगे। बस, इसलिए ही मैं सभा-गोष्ठियों में और अखबार के पन्नों पर, टीवी चैनल के जरिये बरसों से मोबाइल फोन का धन्यवाद करती आ रही हूं, जिसने औरत की इच्छा- वरणी मूक पड़ी आवाज खोल दी। स्त्री अपनी ही आवाज पर आज चकित है जिसने स्वामी, मालिक और तथाकथित राजाओं के दिल दहला दिये। कितना अच्छा था, तब जब बेटियों के प्रेम-पत्र पकड़े जाते थे। सजा के रूप में शादी का फरमान तुरत-फुरत सुनाकर मेल- बेमेल, अधेड़-बूढ़ा, दे स- परदेस का वर ढूंढ़ दिया जाता था और कन्यादान करके मां-बाप गंगाजी नहा आते थे। कितना सुनहरा युग गुजरा है, जब बहुएं चुपचाप घर के आंगन में मजूरी करती रहती थीं। अपनी किसी व्यथा या पीड़ा को पी जाना ही हितकर समझती थीं- ‘दुखवा का से कहूं मो री माई’ का मजबूती से बंधा मजबूर सूत्र दुल्हन के मंगल-सूत्र की तरह गले में अदृश्य रूप में दिन-रात रहता था और नव-युवा बहू रो- रोकर अपना दर्द कभी पीपल के पेड़ को सुनाती थी, कभी नीम पर बैठे तोता और कागाओं को। मगर आज उस बेटी या उस बहू के हाथ में मोबाइल फोन है, दिल जरा सा भी दुखा, दर्द माता-पिता तक पहुंचा दिया। हमारे घर की मीरा बहू ने अपने दद्दा से धोती-साड़ी, पायल-बिछिया को दरकिनार करके मोबाइल फोन मांगा था और फोन आते ही ससुराल में भूचाल आ गया, जैसे मीरा का वार्तालाप हर हालत में बहुत होशियारी या दांवपेंच वाला हो सकता है। वह फोन के जरिये शतरंज जैसी चाल चल सकती है, जो आमने-सामने संभव नहीं है। बहुत सी उफनाती ध्वनियां उसके दिमाग में चलती रही हैं, जो चेहरा देखकर ही पहचानी जा सकती थीं मगर कुछ न कहने की मजबूरी, सिर झुकाकर सह जाने की बेबसी के चलते आखिर भीतर का प्रतिरोधी ज्वार थमने लगता। यह अलग बात है कि इस बदलाव के दौरान इंसाफ के लिए अराजकता ऐसी कि स्थिति दर्दनाक और विचलित कर देने वाली हो जाती। सीने में जो सुलगता, आंखों में धुआं-सा चुभता। लड़की का दुख छिपा रहे, वह कष्टों को झेलती चली जाए और ‘उफ’ तक न करें, यह ‘मूल्यवान नियम’ शील-स्त्री का निर्माण करता है। इसी नियम को पोसने की हिमायत में पंजाब का महिला आयोग उठा, तो समझिए कि हमारी महान परंपराओं को सुरक्षित कर रहा है। इसी से मर्दपरस्त संस्कृति उठान पर रहती है। अब ऐसे समाज को सामंती खूंखार या कुटिल न कहें तो क्या कहें जो स्त्री के मनुष्यगत हकों का हत्यारा है। इसी हत्यारी संस्कृति के आधार पर चलती है विवाह संस्था, तभी तो पुरुष वर्चस्व के भोंपू से बोलती हुई पंजाब महिला आयोग की अधिकारियों ने मोबाइल फोन के स्त्री-सहयोग को तलाक का कारण बताया है। तलाक यानी कि उस संबंध से छुटकारा, जिसके कारागार में तरह-तरह की सजाओं का प्रावधान है। घरेलू हिंसा से अग्नि-दहन तक और मर्दानगी की बलिष्ठता के बूते औरत के बहत्तर टुकड़े करके फ्रिज में रख देने तक, तंदूर में झोंक देने तक और सरेआम गोली मार देने तक, सभी के इस संहार को रोकने का उपाय क्या है? कितनों को फांसी हुई है उनके बर्बर कृत्यों पर? इस पर ध्यान देने की जरूरत भी क्या है? हमारे महान ग्रंथों में लिखा है कि सती होना स्त्री का परम धर्म है या उसे खत्म कर देने से कोई पाप नहीं लगता। तभी तो जब औरत सब तरफ से निराश-हताश होकर फैसला अपने हाथ में ले लेती है, तो कचेहरियों तक चिल्लाने लगती हैं कि औरत अगर पति पर वार करेगी तो विवाह संस्था का क्या होगा? शादी पर किसको िव्ा श् व्ाा स्ा रहे गा? पूछने का मन करता है कि स्त्री-हत्या की रोजाना की खबरें, भ्रूण-हत्या के नजारे और घरेलू-हिंसा की दर्दनाक कहानियां औरत की आस्था को कितनी बचा पाती हैं कि वह विवाह को बचाये। तलाक से डर लगने लगा है मदरे को, मदरे के पैरोकार परिवारों को। तभी तो हमारा समाज तकनीकी योग्यता और तमाम हलकों में देश की मजबू ती पर ताल ठोकते हुए चोर निगाहों से औरत की तरक्की देखकर बौखला जाता है। जैसे औरत का सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्तर उसके अपने इरादों के मुताबिक ऊंचा हो, तो मर्दाने समाज की तौहीन होती है। मोबाइल फोन ही क्यों, स्त्री की वेशभूषा उसकी शिक्षा-दीक्षा के साथ योग्यता और क्षमता दहशत पैदा कर रही है, नहीं तो दिनदहाड़े बलात्कार और कत्ल के रास्ते औरत को ठिकाने क्यों लगाया जाता? वही कि अब वह आंखें नीची करके, कंधे झुकाकर चलने वाली लड़की से ऊपर उठकर आपकी आशनाई, कामुकता और मालिकाना अंदाज का जवाब अपनी इच्छा और अपने फैसले के हिसाब से दे रही है, जो आपको कड़ी चुनौती लगती है तो फिर छीनो मोबाइल, बैन कर दो इंटरनेट और प्रतिबंध लगा दो जींस और टॉप पर। घाघरा लूगड़ी या बुर्के घूंघट में बन्द कर दो उसका मनुष्यगत व्यवहार कि उसकी ज्ञानेन्द्रियां सुन्न हो जाएं और वह फिर से मूक के रूप में, कोल्हू के बैल के अभ्यास में उतर जाए। मगर अब ऐसा कुछ किसी के बस का नहीं क्योंकि आदि-ग्रंथों की अत्याचार-संहिता को स्त्री ने सिरे से नकार दिया है, ऋषियों और गुरुओं का कहा-सुना सब धोखे का सौदा है, क्योंकि आदि- ग्रंथों का सच हैं जाबालाएं और एकलव्य, सूर्पनखा और सीता। जाहिर है, जिन विधानों ने इन स्त्रियों और शिष्यों को अपने युग में जगह दी तो वह जगह दोजख ही कहलाएगी। वे भी बड़े ईमानदार थे, पहले ही घोषणा कर दी- स्त्री और दलित को स्वर्ग भोगने का अधिकार नहीं। मगर आज औरत जान गयी है कि न स्वर्ग किसी देवता के चमत्कार से बनता, न कोई वहां रहने का पट्टा दे सकता। स्वर्गन रक अपने हाथों ही बनते हैं, अपने साहस और बुजदिली से, अपने ज्ञान और अज्ञान से। सच में, हमारे यहां की पुरुष-व्यवस्था अज्ञानी है। नहीं जानती कि औरत अपनी यात्रा में कहां से कहां पहुंच गयी और पुरुष-सत्ता अभी पांसे फेंक रही है, दांव खेल रही है। महिला आयोग के विचारों पर अफसोस किया जा सकता है। गौर करने की बेवकूफी कौन सी औरत करेगी? जरा बुद्धि-विचार तो देख लीजिए कि उनका तर्क है- बहू अपने मायके वालों से एक-एक बात कहती है जिससे मायके के लोग पति-पत्नी के संबंध में हस्तक्षेप करते हैं। इस कारण परिवार टूटते हैं। हस्तक्षेप न करें तो क्या करें? कहें कि हमारी बेटी को जमकर यातना मिले। या आंखें मूंद लें? पहले माता-पिताओं की तरह कहें- डोली यहां से उठी है, अर्थी पति के घर से उठे। यानी कि अब मरने-जीने के लिए तुम वहां अकेली हो, जहां तुमको बैल की तरह दिन-रात जोता जाना ही आदर्श नियम है। अभी तक जो हत्याएं हो रही हैं, वे ज्यादातर इसलिए ही हो रही हैं कि लड़की के माता-पिता उदासीन रहते हैं। पति-पत्नी या बेटी की ससुराल के बीच में आना ‘अशोभनीय’ बताया गया है तो अब यह नयी बात भी जान लेनी चाहिए कि जो कुछ पुराने वक्तों में बताया गया है, वह सारा कुछ सही नहीं है। वह बहुत कुछ बहू-बेटियों के खिलाफ बनाया गया है इसलिए गलत नियमावली में तब्दीली की सख्त जरूरत है। क्या यहां मदरे से भी मोबाइल छीनने का फरमान जारी हो सकता है? क्या वे मोबाइल या ऐसे ही तेज गति के साधनों से सारे काम विवाह संस्था के हित में करते हैं? आपकी कसौटी बड़ी कच्ची है और आप घिसने लगते हैं उस पर स्त्री को, जो अपने इरादों में काफी मजबूत हो चली है।
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Wednesday, May 11, 2011
Thursday, April 28, 2011
बंदिशों की चुभन
लड़कियों के मामले में अपना समाज कितनी लिजलिजी सोच रखता है, यह बार-बार याद दिलाने की जरूरत क्यों पड़ती है? एक करोड़ दस लाख परित्यक्त बच्चों में 90 फीसद लड़कियां होती हैं। सिंगल मदर या कुंवारी मांओं को लेकर उपेक्षाभाव रखने वालों से यह सवाल पूछा जाना जरूरी है कि वैवाहिक संबंधों की मजबूत बेड़ियां भी अपनी नन्हीं बच्चियों को सुरक्षा क्यों नहीं दे पा रही हैं? केवल मादा भ्रूणहत्या को लेकर बयानबाजी करते रहने, पोस्टर छापने, अखबारों में सरकारी विज्ञापन देने से बच्चियों को बचाने का 'ढोंग' करने वाली सरकार को यह क्यों नजर नहीं आता? उसी समय सुप्रीम कोर्ट मान रहा है कि हमारी इतनी ज्यादा लड़कियां परिवारवालों द्वारा छोड़ दी जाती हैं। खोये हुए बच्चे भी अपने यहां तभी मुस्तैदी से ढ़ूंढे जाते हैं, जब वे संपन्न घरों से आते हों। गरीब के बच्चे को ढ़ूंढ निकालने में किसी की कोई दिलचस्पी नहीं होती। उनके गुम हो जाने पर ना तो बड़ी प्रेस कांफ्रेस होती है, ना ही मीडिया कैमरों के साथ उमड़ता है। आज भी अपने यहां बेटी का पैदा होना अनचाहा ही होता है। बिहार और राजस्थान के तमाम इलाकों में नवजात लड़कियों को मारने वाली दाइयों का दबदबा रहा है। कुछ पैसों के लोभ में ये पैदा होते ही बच्ची को मारने की विशेषज्ञ होती हैं। दोष इन दाइयों का नहीं है, ये तो मात्र घरेलू प्रसव विशेषज्ञ होती हैं, अपनी गरीबी और लोभ के चलते ये चांडाल का काम करने लगती हैं। मेरा मानना है, इनको कोसने से समाज नहीं बदल सकता। जैसे 'बेटी बचाओ' का स्लोगन बच्चियों को मरने से नहीं रोक पाया, उल्टे उसने बच्चियों के त्याग का एक और संवेदनहीन तरीका अख्तियार कर लिया है जिसमें परिवार खुद को जान लेने के पाप से मुक्त मान लेता है। बस में , रेल-यात्रा के दौरान, मे ले-ठे ले में छोटी लड़कियों को छोड़ कर भाग निकलने वाले मां-बाप को आप क्या कहेंगे? दकियानूस विचारधारा और सामाजिक ढोंगों ने मानसिकता ही इतनी घटिया कर दी है कि संवेदन-शून्यता हावी होती जा रही है। बेटे की चाह में लड़कियों की लाइन लगाने वाले दंपति सिर्फ नासमझ ही नहीं होते, उनके भीतर की भावनाएं भी मर चुकी होती हैं। मादाओं के प्रति होने वाली उपेक्षा जब वैश्विक पटल पर घृणित-दृष्टि से देखी जाती है तो घबरा कर सरकारें उपाय ढूंढने का ढोंग करने लगती हैं। मादा भ्रूणहत्याओं को रोकने के नाम पर सरकार पैसा ही नहीं लुटा रही, विदेशों से भी मोटी सहायता खींची जाती है, जबकि असलियत तो यही है कि लड़कियों को गर्भ से निकाल कर ना मारा जाए तो भी जन्मते ही गला घोंट दिया जाता है या फिर ऐसे ही मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। दो-चार औरतों की तरक्की को नमूने के तौर पर पेश कर अपना फेस सेव करने वालों की अक्ल मारी गई है, उनको यह सब हकीकत नहीं नजर आती। जो परिवार लड़कियों को कहीं छोड़ने का साहस नहीं कर पाते, वे बहुत छोटी ही उम्र में उनको ब्याहते हैं ताकि उनका बोझ कुछ कम हो सके। इनको स्कूलों में नहीं डाला जाता, अक्षर ज्ञान तक नहीं कराया जाता। छोटी ही उम्र में चूल्हा फूंकने, जलावन ढ़ूंढ कर लाने, दूर किसी सार्वजनिक कुएं/जलाशय से पानी ढोकर लाने या ढोर चराने की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है। घर के छोटे बच्चों को पालना इनका नैतिक दायित्व बन जाता है, रोटी पकाने, बासन धो ने, घास छीलने को ही ये अपना मनोरंजन समझ लेती हैं। खबर है, मेरठ में एक गरीब बाप अपनी दो लड़कियों को घर में कैद किये है, यह सुनकर अजीब लग सकता है पर उसकी बेचारगी इस घिनौनी-व्यवस्था का नमूना है। वह कहता है कि बच्चियां विक्षिप्त हैं और इलाज कराने के लिए उसके पास पैसा नहीं है इसलिए वहशी दरिंदों से इनको बचाने का उसको यह सस्ता-टिकाऊ तरीका लगा। परिवारों की प्रशस्ति करने वालों और पश्चिमी समाज का मखौल उड़ाने वालों से पूछा जाना चाहिए कि सभ्य समाज की हकीकत यही है क्या? यह सरकार की लाचारी है कि वह दुनियाभर में अपनी सस्ती चिकित्सा सुविधाओं के लिए प्रसिद्धि पा रही है, पर गांव/कस्बे में लोग पैसों के अभाव में लाइलाज ही मरते जा रहे हैं। बेटी को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी के लिए इसी बाप ने अपनी बेटी को कैद नहीं कर रखा है। संभ्रांत दिखने वाले पढ़े-लिखे, शहरी भी अपनी नन्हीं बच्चियों को दरिंदगी से बचाने के लिए कुछ ऐसा कर रहे हैं। इनमें से कोई भी अन्ना हजारे की तरह आंदोलन नहीं करना चाहता। कोई जुबान नहीं हिलाता पर सबको अपनी बेटी की फिक्र है। कहीं सुरक्षाकर्मी बने दादाजी बस स्टॉप तक जा रहे हैं, कहीं मां धूप में झुलस रही है। खेल का मैदान हो या परिवहन, मां की चौकसी बढ़ती जा रही है। वह बच्ची से उसकी स्वतंत्रता किसी जालिम की तरह छीन रही है। समाज में छुट्टा घूमते बलात्कारी भेड़ियों से अपनी बच्ची को बचाये रखने का यह भय किस समाज को रच रहा है? बच्चों के एक बहुत अच्छे स्कूल के गेट पर हर रोज मैं एक मां को सुबह और दोपहर सीखचों के पार से अपनी बिटिया को ताकते देखती हूं। स्कूल की बिल्डिंग में जब तक वह घुस ना जाए, तब तक वह ऐसे ही एकटक उसको ताकती नजर आती है, दोपहर को छुट्टी से कुछ पहले ही आकर वह गेट पर मुस्तैद हो जाती है। सालों से यह नजारा मैंने देखा है और इस व्यवस्था के घिनौनेपन से घृणा से भरा पाया है खुद को, जहां अपने बच्चे को सुरक्षित माहौल नहीं दे पा रहे हम। बेटी की 'बॉडी गार्ड' बन चुकी इस मां की भावनाओं पर कोई संदे ह नहीं कर रही मैं, पर कोई यह भी सोचेगा कि उस बच्ची की गुलामी, सुरक्षा के नाम पर बंधनों की यह जकड़न उसको भीतर से कितना कमजोर कर रही है? सिर्फ गरीब और साधनहीन मांओं की ये दिक्कतें नहीं हैं, यही झेलना पड़ता है, विशाल बंगले में सुरक्षा गाडरे और नौकरों से चाक-चौबन्द मां को भी। आरुषी और हेमराज की मौत के पीछे मां तलवार की घोर लापरवाही को मैंने कभी नकारा नहीं है। युवा होती बेटी को पुरुष नौकर के भरोसे छोड़ना किसी भी एंगल से सामान्य नहीं कहा जा सकता, तब भी जब वह सालों से आपका विश्वसनीय रहा हो। स्त्री-पुरुष के दरम्यान कब- क्या घटित हो जाए, कहा नहीं जा सकता पर पुरुष के भीतर का हैवान कन्या पर कभी भी सवार हो सकता है, इस पर डाउट नहीं किया जा सकता! छोटी बच्चियों पर होने वाले यौनाक्रमणों के अपराधी 80 फीसद जान-पहचान वाले या रिश्तेदार ही होते हैं। लेकिन पुरुषों की इन घिनौनी मानसिकता से बच्चियों को बचाने के लिए ना तो बेड़ियां कारगर हो सकती हैं, ना ही ताले। पाबंदियों से उसका आत्मविश्वास और साहस कुचला ही नहीं जा रहा, उसको इन्हीं बच्चियों की तरह बेबस भी बनाया जा रहा है, जिनको त्याग दिया जाता है। ये बेसहारा छोड़ दी गई उपेक्षित हैं, अकेली हैं, इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। और सुरक्षित रखने के नाम पर जिनकी मानसिक प्रताड़ना चल रही है, दम घुट रहा है। निजता को चूर-चूर किया जा रहा है। दोनों के मन एक बराबर कमजोर बनाये जा रहे हैं। दोनों ही घुटन में हैं। दोनों ही असहाय और बेचारगी जी रही हैं। इन सबकी मुक्ति के उपाय कौन करेगा? किसको फिक्र है इनकी? इस भयानक समाज में इन्हीं दरिंदों के बीच उसको सारा जीवन काटना है। जैसा पालन किया जा रहा है, वह तो इनको हमेशा किसी मजबूत सहारे को तलाशने को छोड़ने वाला है। आश्रित बना रहा है इनको। मानसिक रूप से भी और दैहिक रूप से भी। यह है इस मक्कार समाज का सच, जहां कुछ लोग बेटी को त्यागने को बेबस किये जा रहे हैं तो कुछ मानसिक/भावनात्मक रूप से उसका दम घोटने को मजबूर हैं। बच्चियां परित्यक्त हों या पाबंदियों तले जीने को मजबूर, इसका दोषी है यह समाज, जिसे कुछ लोग सभ्य कहते शर्माते नहीं। कुछ मां-बाप घबरा कर उन्हें फुटपाथ पर या कचरे ढेर में फेंकने को मजबूर हैं तो कुछ हर वक्त उन पर छतरी के तरह छाये रहने को मजबूर। ऐसे में कैसे होगा उनका विकास। कैसे आयेगा उनको पंख फैला कर उड़ना। कैसे सीखेंगी वे अपनी शख्सियत को तराशना। फिर बहाने करेंगे, बेटे की दीवानगी के। लैंगिक विभेद के जितने बारीक और खतरनाक कांटें अपने यहां बिछे हैं, उतने शायद ही किसी समाज में होंगे। जिनको ढांपने का ढोंग करने वाले कभी उस पीड़ा को समझ भी नहीं सकते, जिनकी चुभन नन्हीं बच्चियां और उनके परिवार हर रोज झेलते हैं।
शादी का झूठा आश्वासन यौन शोषण
अधिकतर रेप के मामले अनियंत्रित यौन-वासना को संतुष्ट करने के लिए सावधानी से रचे होते हैं और कामुक फिल्मी छवियों का एहसास और फैंटेसी का एकमात्र उद्देश्य महिलाओं पर हावी होना है। दरअसल, वास्तविक बलात्कार या 'डेट रेप' करने से पहले बलात्कारी के दिमाग में नशे की तरह कई बार रिहर्सल होता है। सदा ही पीड़िता को ही दोषी ठहराया और अपमानित किया जाता है और खुद के परिजनों द्वारा 'कथित फेमिली ऑनर एंड रिप्यूटेशन' के लिए भी अपमानित किया जाता है। शादी का झांसा देकर किसी लड़की के साथ शारीरिक रिश्ते बनाना और बाद में शादी के बंधन में बंधने से मना करना बलात्कार के दायरे में जाता है, वह भी तब जब लड़के का लड़की से शादी करने का कोई इरादा न हो। हम इसे 'शादी की आड़ में यौन शोषण' कह सकते हैं। अधिकतर लड़के शादी का झांसा देकर शारीरिक रिश्ते बनाते हैं और तब तक बनाते रहते हैं जब तक लड़की गर्भवती नहीं हो जाती। कुछ समय बाद गर्भपात कराना भी मुश्किल हो जाता है और फिर ये बातें परिवार और पड़ोसियों की नजर में आ ही जाती हैं। बाद के अधिकतर मामलों में दोषियों के खिलाफ मामले दर्ज होते हैं। भारतीय अदालतों ने कई बार सवाल उठाए हैं- 'किसी लड़की से शादी का झूठा वायदा करके शारीरिक रिश्ते बनाना गलत सहमति है या नहीं? यदि वह बलात्कार नहीं है तो यह धोखेबाजी है या नहीं?'
शादी के झूठे वादे देकर बालिग लड़की की सहमति से तब तक शारीरिक रिश्ते कायम करना, जब तक कि वह गर्भवती न हो जाए, तो इसे स्वच्छंद संभोग कहा जाएगा जयंती रानी पांडा बनाम पश्चिम बंगाल सरकार और अन्य के मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने स्थानीय गांव के उस स्कूल शिक्षक को दोषी ठहराया, जो पीड़िता के घर जाता था। पीड़िता के मां-बाप की अनुपस्थिति में उसने उसके करीब जाकर अपने प्यार का इजहार किया और शादी करने की इच्छा जताई। पीड़िता भी तैयार हो गयी और उसने आरोपी से वायदा किया कि अपने माता-पिता की समर्थन मिल जाने के साथ ही वह उससे शादी कर लेगा। इस आश्वासन के बाद आरोपी पीड़िता के साथ शारीरिक रिश्ते बनाने लगा। यह सिलसिला कई महीनों तक चला। इस अवधि में आरोपी ने कई रातें उसके साथ गुजारीं। आखिरकार जब वह गर्भवती हो गई और जोर देने लगी- अब हमें जल्द से जल्द शादी कर लेनी चाहिए तो आरोपी ने उस पर गर्भपात कराने का दबाव डालकर बाद में शादी करने पर सहमति जताई। पीड़िता ने उसकी बात नहीं मानी और आरोपी अपने वादे से मुकर गया, यहां तक कि उसने पीड़िता के घर आना-जाना बंद कर दिया। इसका अर्थ यह है कि अगर बालिग लड़की शादी के वादे के आधार पर शारीरिक रिश्ते को राजी होती है और तब तक इस गतिविधि में लिप्त रहती है जब तक कि वह गर्भवती नहीं हो जाती, यह उसकी ओर से स्वच्छंद संभोग (प्रॉमिस्क्यूटी) के दायरे में आएगा। ऐसे में, तथ्यों की गलत इरादे से प्रेरित नहीं कही जा जाएंगी। आईपीसी की धारा-90 के तहत कुछ नहीं किया जा सकता, जब तक अदालत आश्वासन न दे दे कि रिश्ते बनाने के दौरान आरोपी का इरादा शादी करने का नहीं था। (1984 सीआरआई.एल.जे. 1535, हरि माझी बनाम राज्य : 1990 सीआरएल.एल.जे. 650 और अभ्ॉय प्रधान बनाम पश्चिम बंगाल राज्य : 1999 सीआरएल.एल.जे 3534)
शादी का झूठे वायदे को लेकर दिया गया सोचा-समझा पल्रोभन महज धोखाधड़ी बंबई हाईकोर्ट के न्यायाधीश बी. बी. भग्यानी ने कहा कि ऐसे मामले काफी कम ही ध्यानार्थ सामने आते हैं कि आईपीसी की धारा-415 के तहत धोखाधड़ी को अपराध के दायरे में परिभाषित किया गया है। याचिका को निरस्त करने के निर्णय के दौरान न्यायाधीश भग्यानी ने माराह चंद्र पॉल बनाम त्रिपुरा राज्य की सुनवाई (1997 सीआरआई 715) को ध्यान में रखा और इस पर कायम रहे कि पीड़िता को जानबूझ कर शादी के वादे के झांसे में रखकर शारीरिक रिश्ते बनाने के लिए उकसाया गया था। याचिकाकर्ता-अभियुक्त के कार्य निश्चित रूप से शरीर, मन और सम्मान को क्षति पहुंचाने की वजह हैं। शादी का झूठा वायदा कर जानबूझकर दिए गए पल्रोभन के बाद याचिकाकर्ता और आरोपी के शारीरिक रिश्ते 'धोखाधड़ी' की परिभाषा के तहत 'शरारत'
के दायरे में आते हैं, जैसा आईपीसी की धारा-415 के तहत परिभाषित किया गया है और जो आईपीसी की धारा-417 के तहत दंडनीय है। (आत्माराम महादू मोरे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1998 (5) बीओएम सीआर 201 आदेश- दिनांक 13/11/1997) (शेष पेज 2 पर)
धोखाधड़ी
जयंती रानी पांडा मामले में पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति राम नंदन प्रसाद ने कहा कि मामले से जुड़े तथ्यों को देखते हुए पाया गया कि बलात्कार अपराध से अलग नहीं है। शादी के झूठे वायदे की आड़ में लड़का आरोपी को धोखे में रखकर लगातार शारीरिक रिश्ते बनाता रहा, लेकिन झूठे वादे की आड़ में वह शारीरिक रिश्ते कायम करने के लिए राजी नहीं थी। याचिकाकर्ता का दायरा, इसलिए आईपीसी की धारा-415 के तहत धोखाधड़ी के रूप में परिभाषित है और आईपीसी की धारा-417 के तहत प्रथम-दृष्ट्या अपराध सिद्ध होता है। धोखाधड़ी के इस कृत्य के अलावा, याचिकाकर्ता और दूसरे आरोपियों पर डराने-धमकाने में लिप्त रहने का आरोप लगाने और शिकायतकर्ता और उसके माता-पिता को डराने के मामला भी आईपीसी की धारा-506 और 323 के तहत अपराध है। (मीर वाली मोहम्मद उर्फ कालू बनाम बिहार सरकार (1991 (1) बीएलजेआर 247 आदेश दिनांक 2/7/1990)
परिवार की ओर से सच्चा दबाव
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति पी. वेंकटरमन रेड्डी और पीपी नेवलेकर ने 03.11.2004 को फैसला सुनाया- 'हमें इसमें संदेह नहीं कि आरोपी ने लड़की से शादी का वायदा किया था और इसी प्रभाव से लड़की ने उसके साथ शारीरिक रिश्ते भी बना लिया। लड़की भी उससे शादी करने को उत्सुक थी, जैसाकि उसने खासतौर पर कहा भी। लेकिन हमारे पास बात के कोई सबूत नहीं हैं कि किसी ठोस संदेह के हम इस संदर्भ में यह कह दें कि आरोपी का शुरू से ही लड़की के साथ विवाह का कोई इरादा नहीं था और यह कि लड़के ने जो वायदा किया, वह उसकी जानकारी के मुताबिक झूठा था। इसके विपरीत, बाद में लड़की का यह बयान कि आरोपी उससे विवाह करने को तैयार हो गया था लेकिन उसके पिता और दूसरे लोगों ने उसे गांव से दूर ले गये। इससे संकेत मिलता है कि आरोपी असल में विवाह का इरादा तो रखता था लेकिन परिवार के बड़े-बुजुगरे के दबाव में ऐसा नहीं कर पाया। यह विवाह करने के वायदे को लेकर वायदा खिलाफी का मामला प्रतीत होता है, न कि विवाह के झूठे वायदे का मामला।' (दिलीप सिंह उर्फ दिलीप कुमार बनाम बिहार राज्य, 2005 (1) सुप्रीम कोर्ट 88)।
निंदनीय कृत्य के एवज में पचास हजार
न्यायमूर्तियों ने हालांकि, गौर किया कि याचिकाकर्ता ने अपने विरुद्ध लगे आरोप में संदेह का लाभ लेते हुए दंड कानून के दायरे से खुद को अलग कर लिया। लेकिन, हम उसके निंदनीय आचरण को अनदेखा नहीं कर सकते, क्योंकि उसने पीड़ित लड़की से विवाह का वायदा कर उसे शारीरिक रिश्ते बनाने के लिए फुसलाया, जिसके चलते वह गर्भवती हो गयी। आरोपी के इस कृत्य से लड़के को काफी दुख हुआ, यहां तक कि उसकी बदनामी हुई, जिससे वह सदमे में पहुंच गयी। आरोपी इस नुकसान का दोषी है और वह मुकदमा खत्म करने के लिए लड़की को पचास हजार रुपये खुशी-खुशी देने को राजी हो गया।
लड़की की कम उम्र ज्यादा संवेदनशील
विश्लेषण करने पर पता चला कि जिस समय यह सब हुआ, जयंती रानी पांडा की आयु 21- 22 साल थी, जबकि येदला श्रीनिवास राव के मामले में लड़की की आयु 15 से 16 साल के बीच थी। यह साक्ष्य का मामला है कि लड़की से झूठे वायदे करके उसकी सहमति या उसकी राय की गयी और आरोपित को पता था कि वह कभी अपने वायदे को पूरा करने का इरादा नहीं रखता। यदि आरोपी कम उम्र की लड़की को फुसलाकर उससे विवाह करने का वायदा कर ले, तो ऐसे में यह उसकी सहमति नहीं होती, बल्कि फुसलाकर किया गया कृत्य होता है और आरोपी शुरू से ही अपने वायदे को पूरा करने का इरादा नहीं रखता। ऐसी कपटपूर्ण सहमति को सहमति नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अपराध के लिए हामी भराना आरोपी का अपराध है।
पर्याप्त समझ, महत्व और नैतिक गुण
उदय बनाम कर्नाटक सरकार के मामले में 19.2.2003 को सुप्रीम कोर्ट ने दृढ़तापूर्वक कहा कि कोई कड़ा फामरूले नहीं रखा जा सकता कि पीड़िता ने स्वैच्छिक सहमति से ही रिश्ते बनाए हों या किसी गलत इरादे के अंतर्गत है लेकिन निम्नलिखित मामले सामने होते हैं : क) यदि लड़की की उम्र 19 साल है और उनमें इस करतूत के महत्व और नैतिक गुण की पर्याप्त समझ है, उसकी सहमति मानी जाएगी। ख) उसे मालूम है कि जाति के आधार पर उनकी शादी होने में परेशानी है। ग) याचिकाकर्ता के संज्ञान में यह आरोप लगाना काफी मुश्किल है कि उसके वायदे से पैदा हुई गलतफहमी के चलते पीड़िता राजी हुई थी और घ) इस मामले में साबित करने का कोई साक्ष्य नहीं है कि आरोपी का पीड़िता से शादी करने का कभी इरादा नहीं था।
भावनाओं और नाजुक पलों में जुनून से जुड़े मामले
न्यायाधीश एन. संतोष हेगड़े और बी. पी. सिंह ने गंभीर संदेह जताया था कि शादी के वादे के चलते आरोपी पीड़िता पर शारीरिक रिश्ते बनाने के लिए दबाव डाल सकता है, क्योंकि वह जानती है कि जाति के आधार पर आरोपी के साथ उसकी शादी नहीं हो सकती और दोनों परिवारों के सदस्यों का विरोध झेलने के लिए मजबूर होंगे। वह पूरी तरह जानती है कि अपीलकर्ता द्वारा किये के बावजूद शादी नहीं हो सकती। हालांकि अपीलकर्ता के पास ऐसा विश्वास करने के कारण हैं क्योंकि जब भी वे मिलते हैं, एक-दूसरे को बहुत प्यार करते हैं, वह उस लड़के को काफी छूट देती है, जिससे वह बेहद प्यार करता है, सिर्फ उसी के लिए ऐसी छूट भी है। याचिकाकर्ता लड़की ने रात 12 बजे सुनसान जगह पर चुपचाप गयी। जब दो लोग जवान हों, तो आमतौर पर ये होता ही है कि वे सभी अहम बातों को भुलाकर जुनून में आकर प्यार कर बैठें, खासकर तब जब वे कमजोर क्षणों में अपनी भावनाओं पर काबू न कर पायें। ऐसे में, दोनों के बीच शारीरिक रिश्ते कायम हो ही जाते हैं। लड़की स्वेच्छा से लड़के के साथ रिश्ते कायम करती है, वह उस लड़के से बेहद प्यार करती है, इसलिए नहीं कि उस लड़के ने उससे शादी के वायदा किया था, बल्कि इसलिए कि लड़की ऐसा चाहती भी थी। (सुप्रीम कोर्ट 46 2003 (4))
शुरू से ही शादी का इरादा नहीं
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एके माथु र और अल्तमस कबीर ने 29.09.2006 को फैसला सुनाया- 'हम संतुष्ट हैं कि आरोपी ने उसे राजी करते हुए सबकुछ किया, लेकिन वह ऐ च्छिक भी नहीं था क्योंकि याची ने शादी करने जैसा वायदा करके उसे फुसलाया। कानून इसकी इजाजत नहीं देता। पीड़ित लड़की और गवाहों की गवाही से पूरी तरह स्पष्ट होता है कि गवाह पंचायत की तरह काम कर रहे थे। आरोपी ने पंचायत के समक्ष स्वीकार किया कि उसने लड़की के साथ शादी करने का वायदा कर उसके साथ शारीरिक रिश्ते बनाये लेकिन पंचायत के समक्ष वायदे करने के बावजूद वह पलट गया। इससे पता चलता है कि आरोपी का शुरू से ही लड़की से विवाह करने का कोई इरादा नहीं था और वह पीड़िता से शादी करेगा, इसका झांसा देकर उसने शारीरिक रिश्ते बनाये। अतएव, हम संतुष्ट हैं कि प्रतिवादी को सजा देना न्यायसंगत है। हमारे निष्कर्ष के मुताबिक, कोई मामला नहीं बनता। अपील खारिज की जाती है।' (यादला श्रीनिवास राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, आपराधिक अपील 1369, 2004) माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में लड़की की उम्र, उसकी शिक्षा और उसके सामाजिक स्तर और लड़के के मामले में भी इन्हीं सब पर गौर किया जाना जरूरी है। याची लड़की स्वयं इस कृत्य में बराबर की भागीदार है। वह इस मामले में प्रतिवादी को माफ करना चाहती है लेकिन एक गरीब लड़की के मामले में ऐसे हालात में जबकि उसके पिता की मौत हो गयी हो, तो वह समझ नहीं पा रही कि किन हालात के चलते वह ऐसे कृत्य में फंस गयी और जब आरोपी ने उससे शादी का वायदा किया, लेकिन शुरू से ही वह शादी करने का इरादा नहीं रखता था। ऐसे में, लड़की के हामी भरने की कोई अहमियत नहीं है। उससे गलतफहमी में हामी भरवाना धोखा है। इसे लड़की की मंजूरी नहीं माना जा सकता।
मासूम लड़की का शोषण दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति वी के जैन ने 1 फरवरी, 2010 को आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए ऐसे आपराधिक कृत्य की निंदा करते हुए लिखा- 'इस पर गौर करने पर कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर लड़की से शारीरिक रिश्ते बनाये, इस आशय से कि उससे विवाह का उसका कोई इरादा नहीं था, कोई बलात्कार का मामला नहीं बनता। यह न सिर्फ घोर निंदनीय कृत्य है बल्कि प्रकृति से भी आपराधिक है। यदि ऐसा हो ने रहने की अनुमति दी जाए, तो इससे इनसान अनैतिक और बे ई मानी बनेगा। जो भी इस इरादे से इस देश में आएगा, शादी का ढोंग रचाएगा और कमजोर वर्ग की लड़की से शारीरिक रिश्ते बनाने का दबाव डालकर उनका शोषण करेगा। उधर, लड़की को यकीन रहेगा कि वह उसके साथ शादी करेगा। उसे भी यही लगेगा कि जिससे भविष्य में शादी होनी है, वह पति बनेगा ही, कम से कम उससे शादी से रिश्ते रखने में कुछ भी गलत नहीं है। इस वायदे का हवाला देकर उसके साथ दुष्कर्म करके आरोपी आराम से जब चाहे, चलता बनेगा। ऐसे मौकापरस्त लोगों को लड़की की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का लाइसेंस नहीं दे सकती। इस तरह तो शादी के पवित्र रिश्ते में भारतीय लड़की को डाल देना कोई दो दिलों का मेल नहीं है। बेसहारा लड़कियों का शोषण करने वाले ऐसे लोगों को बेखौफ बच निकलना हमारे ऐसे कानून का मकसद कभी नहीं हो सकता, जो इस घिनौने कृत्य के बाद ताउम्र जेल की सजा का हकदार है।' (निखिल पराशर बनाम राज्य)
बेसहारा या सेक्स-संबंधी असंतुष्टि बंबई हाईकोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति बी. यू. वाहाने ने शिवाजी पुत्र श्रवण खैरनार बनाम महाराष्ट्र राज्य (1991) मामले में वयस्क लड़की द्वारा सहमति के हालात या शारीरिक रिश्ते बनाने में इच्छा से एक पार्टी बन जाने संबंधी दलील दी। विद्वान न्यायमूर्ति ने सामाजिक अनुभव के आधार पर स्पष्ट किया कि वयस्क लड़की से चालबाजी से उसकी सहमति ले ली जाए, वह भी तब जब वह बेसहारा और सेक्स को लेकर असंतुष्ट हो, उसे पैसे की जरूरत हो, इसलिए बहाने से उसे प्रभावित किया जाए या हामी भरने का हालात बनाये जाएं आदि में भारतीय औरतों की सोच को लेकर न्यायिक संदर्भ का हवाला दिया।
विवाह करने संबंधी वायदे के साथ सेक्स करना और गर्भवती होने पर पुलिस रिपोर्ट वर्ग, धर्म, क्षेत्र, आयु या सामाजिक स्तर संबंधी ज्यादातर मामले एक जैसे होने पर आदमी लड़की पर सेक्स के लिए दबाव बनाता है, विवाह करने का भरोसा देकर गर्भवती करता है, परिवार और पुलिस का रिपोर्ट के संदर्भ में बरी होने, संदेह का लाभ पाने या उच्च अदालत में सजा..अपील और इस तरह अंतिम न्याय मिलने में पांच से बीस साल लगना। ये वे मामले हैं, जो समूचे मामलों की नजीर भर हैं। (लम्बोदर बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य, 103 (2007) 399 सीएलटी और ज्योत्स्ना कोरा बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 2008 के सीआरआर नं.2657)
कानूनी नजरिया उलझन भरा
इस खास संदर्भ में कानूनी राय और फैसले सीधे-सीधे बंटे हुए हैं और सहमति और तथ्यों के उलझाव में उलझे हुए हैं, क्योंकि कानून पूरी तरह पारदर्शी नहीं है और फैसले हर मामले के तथ्यों और हालातों के आधार पर होते हैं। न्यायिक राय को लेकर आमराय यही है कि विवाह का वायदा कर पीड़िता से शारीरिक रिश्ते की सहमति लेना कि भविष्य में वह विवाह करेगा, गलत तथ्यों के तहत ली गयी सहमति नहीं कही जा सकती। कुछ अदालतों का विचार है कि विवाह करने का झूठा वायदा करने को लेकर दी गयी कथित सहमति विवाह का राजीनामा नहीं है। इसके मुताबिक, विवाह के झूठे वायदे को लेकर पति-पत्नी जैसा शारीरिक रिश्ता बनाने संबंधी सहमति हासिल करना कानूनी नजरिये से सहमति ही नहीं है। ऐसे मामलों में सबसे कठिन काम यह साबित करना होता है कि आरोपी का शुरू से ही पीड़ित लड़की से विवाह करने का कोई इरादा नहीं था। वह कह सकता है कि मैं विवाह करना तो चाहता हूं लेकिन मेरा माता-पिता, धर्म, जाति, 'खाप' आदि इसके लिए अनुमति नहीं देते। औरत के खिलाफ अपराध संबंधी किंतु -परंतु को लेकर जब तक कानून में संशोधन नहीं होता, न्याय से जुड़े ऐसेकानूनी पेंच यूं ही कायम रहेंगे।
Friday, April 22, 2011
प्यार+पुरुष = प्रचार
औरतों को खुद को महान दिखाने के लिए जरूरी है, अपनी भावनाओं को कुचल डालें। वे जो वास्तव में हैं, उसको छिपा लें! बने-बनाये रिश्तों को मासूमियत के साथ जीने का ढोंग करती रहें। मन में भी किसी की छवि आ जाए तो स्यापा करने लगें। प्रेम हो भी जाए तो मौन रहें। प्रेम-प्रदर्शन से बचें! इस दिखावे के चक्कर में होता यही है कि वे चिड़चिड़ी, झगड़ालू और शकी होती जाती हैं
मशहूर उद्योगपति रतन टाटा अपनी तमाम व्यावसायिक बुलंदियों की बजाए इस दफा अपने प्रेम- संबंधों को लेकर र्चचा में हैं। उन्होंने बेहद खुले मन से किसी विदेशी चैनल को इंटरव्यू देते हुए स्वीकारा कि वे जीवन में चार बार 'सीरियस' प्रेम में पड़े। धुरंधर उद्योगपति की यह सीरियसली प्रेम करने वाली अदा सबको बड़ी भायी। यह धन-कुबेर यहां सलमान खान से पिछड़ भले ही गया, पर इस उम्र में यह कहकर कि वे लगभग शादी करने ही जा रहे थे कि दो देशों की जंग छिड़ गई और उनका दांपत्य बनते-बनते रह गया। अपने दर्द को छिपाने का प्रयास करते हुए उन्होंने माना कि जो हुआ, वह अच्छा ही रहा। मानो उनके घर में हमारे-आपके घर की तरह कोई कलह होने जा रही थी। अब तो फिल्म इंडस्ट्री के सबसे बड़े कुंवारे सलमान भी मानने लगे हैं कि इश्क तो ठीक है पर शादी की जिम्मेदारी उनको डराती है। इसको उनकी बेबाकी मान कर अनसुना सा किया जा सकता है पर यह अधिकार किसी औरत को देने में सबकी नानी मरती है? निश्चित रूप से पुरुषों की कुछ ज्यादा ही। इस तरह का कोई खुलासा करते हुए हमारी औरतें घबरा क्यों जाती हैं! टाटा को प्यार चार बार हो सकता है, सलमान को दस बार, राजेश खन्ना छह और महेश भट्ट पांच बार प्यार करते हैं। ये इसीलिए ऐसा कर पाते हैं क्योंकि इन्होंने यह अधिकार बेहद बेदर्दी से हमेशा से छेंक रखा है। अपने प्रेम पर इतराना और उसको छोड़ कर आगे बढ़ जाना पुरुष के लिए संतोषजनक होता है, पर स्त्री के लिए नहीं। शायद यही कारण है कि पुरुष एक साथ कई लड़कियों को 'टहला'
लेता है, जबकि औरत एक बार में एक पर ही 'कन्संट्रेट' करती है। यहां मैं उनकी बात कतई नहीं कर रही, जो पुरुषों का इस्तेमाल किसी परपज से कर रही होती हैं, क्योंकि इसमें संवेदना नहीं होती। प्रेम की आड़ में होने वाले खिलवाड़ों को भावनात्मक लगाव से न जोड़ा जाना ठीक है। लाभ के लोभ में बनाया गया कोई भी रिश्ता टेम्प्रेरी ही होता है। अपने यहां यूं भी औरतों को रिश्तों में बांध कर किसी अंधेरे कोने की तरफ फेंक देने की पुरानी परंपरा है। कई-कई औरतों से संबंध रखने को पुरुष अपनी सत्ता से जोड़ता है। जो ताकतवर है, पावरफुल है, धनवान और वीर्यवान है, उसकी तरफ आकर्षित होने वाली हर स्त्री उसकी गुलाम ना भी हो तो भी उसके लोभों को नहीं पहचाना जा सकता। ऐसा पहले भी होता था, आज भी हो रहा है और आगे भी होता रहेगा। प्रेम प्राकृतिक जरूरत है। सब चाहते हैं, उनको कोई ना कोई प्यार करे। प्रेमविहीन जीवन वही जी सकता है, जिसके भीतर किसी तरह की कोई संवेदनशीलता ही शेष ना हो। हम खुद कुछ करें ना करें, पर दूसरों से यही उम्मीद रखते हैं कि वे हमको जबर्दस्त रूप से चाहें। अब आते हैं इस प्रेम की चाहना के स्त्रीवादी पक्ष पर। पुरुषों ने क्योंकि औरत को कभी 'वस्तु' से ज्यादा कुछ माना ही नहीं, इसलिए उनकी सारी की सारी प्रतिक्रियाएं आज भी इसी दुविधा की शिकार हैं। जब वे ये लफ्फाजियां कर रहे होते हैं कि उन्होंने इतनी औरतों से प्रेम किया, तो वे अपनी भावनाओं के बल पर नहीं फेंक रहे होते, वे अपने पावर को एन्ज्वॉय करने और कराने की कोशिश में होते हैं। ऐसा नहीं है कि यह केवल धन वालों या पराक्रमियों का ही अंदाज है। सामाजिक जीवन में गरीब से गरीब पुरुष के कई औरतों से संबंध होते हैं। घर-घुस्सू औरतें भी पति के भाई, बहनोई, युवा होते भतीजों-भांजों की गिरफ्त में आ ही जाती हैं। कई बार ये उड़ानें बहुत सीमित होती हैं तो कभी-कभी जबरदस्त नजदीकियों के बावजूद परिवार पर आने वाली आंच के भय से दूरियां जानबूझ कर बढ़ा ली जाती हैं। यह सच है कि प्रेम पर किसी का जोर नहीं होता, पर उससे भी बड़ा सच है कि पुरुषों को प्रेम-प्रदर्शन के मौके बारम्बार मिलते हैं, जबकि औरतों के प्रेम पर पहरे होते हैं। औरतों पर शुचिता के इतने कड़े पहरे रहते हैं कि उनको भावनाओं को काबू रखने की कला अनजाने ही सीखनी पड़ती है। बल्कि यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि औरतों को बार-बार अपनी शुचिता के इम्तिहान से गुजरना पड़ता है। यह इम्तिहान भले ही सीता माता की तरह अग्नि परीक्षा जैसा ना हो, पर धधकती हुई मानसिक आग में कूदने जैसा तो होता ही है। मनोविज्ञान कहता है कि किसी को जीवन में कई बार भी प्यार हो सकता है, जैसा कि टाटा या सलमान को होता रहता है। सैफ अली का प्यार भी साल दर साल बदलता है पर उनकी फैन्स लिस्ट ज्यों की त्यों रहती है। करीना का शाहिद कपूर को डिच (धोखा) करना युवाओं को अखरता है। युवक तो युवक, लड़कियां भी करीना से नाराज हो जाती हैं। पांच शादियां करने वाले हरफनमौला किशोर कुमार ने प्यार ना जाने कितनी औरतों से किया होगा? ये बड़े लोग हैं। संपन्न हैं। समृद्धि इनके कदम चूमती है। ये चुटकियों में जो चाहें, उसे कदमों में गिराने का माद्दा रखते हैं। इनके प्यार पर किसी घर-परिवार-समाज का दबाव नहीं होता। इनकी इज्जत भी हमारी-आपकी इज्जत की तरह जरा सी पोटली में नहीं होती, विशाल खजाने सी इज्जत कितना भी गिरने पर गुमती नहीं। सीना चौड़ा करके ये एलानियां दंभ दिखाते हैं, इतने प्यार किये, लगभग बीवी की तरह रखा, शादी करते-करते छोड़ दिया। पर यही बात जब मीना कुमारी, रेखा या दूसरी हीरोइनों के लिए आती है तो भौंएं तन जाती हैं। लता दीदी को प्यार करते देखने की हिम्मत ना जुटा पाने वालों की भी यही दिक्कत है। उनकी शुचिता का ठेका जो ले रखा है हमने। औरतों को खुद को महान दिखाने के लिए जरूरी है अपनी भावनाओं को कुचल डालें। वे जो वास्तव में हैं, उसको छिपा लें। बने-बनाये रिश्तों को मासूमियत के साथ जीने का ढोंग करती रहें। मन में भी किसी की छवि आ जाए तो स्यापा करने लगें। प्रेम हो भी जाए तो मौन रहें। प्रेम-प्रदर्शन से बचें। इस दिखावे के चक्कर में होता यही है कि वे चिड़चिड़ी, झगड़ालू और शकी होती जाती हैं। अपने इसी प्रेम को दबाने की खीज के चलते वे पति पर पाबंदियां थोपती फिरती हैं। उसको चाय-नाश्ते के साथ विशेषज्ञ की नाइर्ं सीख देती रहती हैं कि 'लड़कियों से खबरदार, उनसे दूरी बनाये रखो।' यह मिस कॉल किसकी थी, वह एसएमएस क्यों आया? अकसर यह भी हिदायत देने से वे बाज नहीं आतीं कि कुंवारी लड़कियां काला जादू करा कर ब्याहता मदरे को अपने कब्जे में करने के गुर जानती हैं। दरअसल, खुद के कहीं और आकर्षित हो जाने के भय से विमुख होने के ढोंग में वे नीरस होती जाती हैं। कॉलेज के रास्ते में आने वाला, घर से बाहर दिखता, कहीं पड़ोस में, रिश्तेदारों में, परिवार के चचेरे-ममेरे भइयाओं और दादाओं के आकर्षण में कभी ना कभी कैद रही युवा होती लड़की के जीवन का वही आइडियल होता है। 14 से 18 साल की उम्र ही ऐसी होती है, जिसमें किसी के आकर्षण की गिरफ्त में आने से शायद ही कोई बचता है। टाटा कहते हैं- चार बार प्रेम हुआ, वे इसको आकर्षण नहीं बता रहे। आकर्षण यानी अंग्रेजी का 'इनफैचुएशन' बार-बार होता है। बस दोनों का फर्क समझने में लोग फेल हो जाते हैं। अपनी गऊ टाइप औरतों के प्रेम के चरित्र भी बदलते हैं, अपने दायरे में ही वे सबसे पहले (अनजाने ही) अपने किसी बड़े भइया/छोटे चाचा की दीवानी हो जाती हैं। कम उम्र में ही ब्याह दी गई तो देवर या ननदोई की, थो ड़ा आगे चले तो पति के साथ काम करने वाले किसी शर्माजी/चोपड़ाजी की अदाओं पर मर मिटने लगती हैं। अधेड़ होने तक बच्चों के टय़ूशन टीचर या बॉलीबाल मास्टर पर दिल आ सकता है। यह सिलसिला यूं ही सारा जीवन चलता रहता है। पर अपने प्रेम-संबंधों को लगातार दोहरा कर शेखी बघारने वाला पति नाम का पुरुष अपनी औरत के इस आकर्षित होने को भी वैर-भाव से ही लेता है। अपने अंदाज में जीने के लिए चर्चित रही एलिजाबेथ टेलर की मौत की खबर में सबसे महत्व जिसको मिला, वह उनकी प्रतिभा या ऑस्कर विजेता होना नहीं था, बल्कि उनकी आठ शदियां थीं जिनके बारे में सुन/पढ़ कर हर मन आज भी ललचा उठा। कोई आपके जीवन में आया ही नहीं या आपका मन किसी के लिए मचला ही नहीं, यह तो इम्पॉसिबिल है। हां, आप यह मान सकती/सकते हैं कि आपका साहस चुक गया, आप डर गये, आपका आत्मविश्वास डगमगा गया, सामाजिक-पारिवारिक दबावों की घुटन में हिम्मत जवाब दे गई ..या फिर यह भी कि आपको उसका अहसास ही तब हुआ, जब सबकुछ खत्म हो चुका था।
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