पार्टी संगठन में महिलाओं को बहुत ज्यादा तवज्जो न देने का खामियाजा राजनीति दलों को भुगतना पड़ सकता है। दलों के सामने यक्ष प्रश्न होगा कि पुनर्गठित एमसीडी में कहां से 50 फीसदी वैसे उम्मीदवार को लाए जो महिला हो और राजनीति में दल विशेष में अच्छा खासा अनुभव हो। दिल्ली सरकार ने दिल्ली में तीन नगर निगम बनाने का फैसला तो ले लिया साथ ही उसमें महिलाओं की सीटों का आरक्षण 50 प्रतिशत कर दिया है। इस हिसाब से नगर निगम में महिलाएं पुरुषों पर भारी पड़ने वाली हैं। वर्ष 2007 में एमसीडी चुनाव में वार्डो की संख्या 272 हुई थी तो वहां पहले से 33 फीसदी आरक्षण होने से 91 महिला प्रत्याशी ढ़ूढने में ही राजनीतिक दलों के पसीने निकल गए। इस कारण कई पति पार्षदों (जिनके पति टिकट के कतार में थे लेकिन सीटें आरक्षित हो जाने से उन्हें टिकट नहीं मिल सका) को मैदान में उतारा गया। अब दिल्ली सरकार ने वहां महिलाओं का आरक्षण 50 प्रतिशत कर दिया है, इस लिहाज से वहां अब 136 महिला पार्षद चुनी जाएंगी, यानी कई पुरुष नेताओं या पार्षदों की टिकटें हर हाल में कटेंगी। सूत्र बताते हैं कि एमसीडी में अभी जितनी भी महिला पार्षद हैं, उनमें से करीब 75 प्रतिशत महिलाएं पार्टी के किसी पुरुष नेता की पत्नी या रिश्तेदार हैं। इनमें से कुछ ही महिलाएं ऐसी हैं, जो स्वतंत्र रूप से राजनीति कर रही हैं। वर्तमान नगर निगम में देखें तो कई महिलाओं को इसलिए टिकट मिल गया कि अंतिम समय में कई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो गई, जिसके चलते इलाके के भारी भरकम नेता की महिला रिश्तेदार को टिकट थमा दी गई। प्रस्तावित एमसीडी में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षित संबंधी सरकार के इस निर्णय से पुरुष नेताओं की चिंताएं अभी से बढ़ गई हैं। इन सबके बावजूद दिल्ली के नेता खासे बेचैन हैं। इस मामले में जब जागरण ने कुछ पार्षदों से बात की तो उनका मानना है कि महिलाओं का आरक्षण बढ़ने से उनकी नेतागिरी खतरे में पड़ सकती है। उन्होंने साफ कहा कि आरक्षण के कारण अगर उन्हें टिकट नहीं मिलता है तो वे अपने परिवार की महिलाओं को चुनाव लड़ाने से परहेज नहीं करेंगे। उनका कहना है कि वे सालों से पार्टी में जान इसीलिए तो लड़ा रहे हैं कि जनप्रतिनिधि बनें, लेकिन अगर ऐसा नहीं होता तो उनके घर की महिलाओं को चुनाव लड़ाने में बुराई क्या है।
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Wednesday, June 1, 2011
Thursday, May 5, 2011
पंचायतों में महिलाओं का आधा राज
बिहार में वर्ष 2006 में जब पंचायतों में 50 फीसद आरक्षण के साथ विभिन्न पदों पर जीत कर आइर्ं तो चारों तरफ आरोपों के शोर थे-महिलाएं पंचायत नहीं चला सकती हैं। वह तो सिर्फ रबर स्टाम्प रहेंगी। काम तो उनके पति, बेटा, पिता, भाई या कोई पुरुष रिश्तेदार ही करेंगे। इन तानों को सुनते हुए भी महिला जनप्रतिनिधियों ने अपने हौसले नहीं खोए। तब द हंगर प्रोजेक्ट ने उस वक्त प्रदेश के चार जिलों के 1000 से अधिक महिला जनप्रतिनिधियों का क्षमतावर्धन करने तथा राजनीतिक गुर सिखाने का काम किया। आज यह अभियान बिहार के 17 जिले के 47 प्रखण्ड के 742 पंचायतों के 5000 संभावित महिला नेताओं के साथ सघन रूप से चलाया जा रहा है। इन प्रयासों के उत्साहवर्धक परिणाम मिले। फिर तो कई उदाहरण सामने आएं, जहां महिला जनप्रतिनिधियों ने अपने काम से पंचायत को नई दिशा दी। पांच साल की इस अवधि में उन्होंने पंचायतों में योजनाओं का क्रियान्वयन, निर्माण कार्य के साथ सामाजिक विकास के भी काम किए। महिला जनप्रतिनिधियों ने स्वशासन को सही संदभरें में समझने की कोशिश की। उन्होंने ग्राम सभा के साथ- साथ वार्ड सभा को भी तबज्जो दिया। लेकिन यह सच है कि बहुतेरी महिलाओं को न तो वास्तव में दायित्व के निर्वहण का अधिकार मिला और न ही निर्णय लेने की आजादी। पंचायतों में 50 फीसद आरक्षण ने सरकार, समाज एवं महिला नेतृत्व के पैरोकार के सामने नई बहस छेड़ दी है। बिहार पंचायती राज व्यवस्था में नित्य नई चुनौतियां बढ़ रही हैं। गौरतलब है कि जहां पहले दहेज में घर- परिवार के वैभव के सामान लिए जाते थे, अब वोट की खरीद के लिए महिलाओं पर दबाव बनाए जाते हैं। परिणामस्वरूप अब पंचायत में राजनीति करने की महत्त्वाकांक्षा रखने वाली महिलाओं के विरुद्ध हिंसा हो रही है। मुजफ्फरपुर जिले के पारू प्रखंड के जाफरपुर पंचायत की मुखिया प्रत्याशी प्रियंका अपनी जान गवां बैठी। कारण रहा-वोट खरीदने के लिए मायके से 2 लाख रुपए न ला पाना। इसी तरह की और भी कई घटनाएं हुईं जो साबित करती हैं कि महिलाओं के प्रति हिंसा के स्वरूप एवं कारणों में तब्दीली हुई है। यह एक नई चोट है-महिलाओं के राजनीतिक अधिकार पर। निस्संदेह बिहार के पंचायती राज व्यवस्था में महिला नेतृत्व की राहें बहुत मुश्किल हैं लेकिन बावजूद इसके वे पंचायत को अपना नेतृत्व देने के लिए उत्साहित हैं। 2011 के पंचायत चुनाव महिला नेतृत्व को बढ़ावा देने, समुदाय द्वारा उन्हें स्वीकार्य करने एवं सशक्त पंचायती राज हेतु स्वीप की तरफ से एक अभियान चलाया जा रहा है। यह पंचायत की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी का उद्देश्य को स्थापित करने के लिए है। महिला नेतृत्व को पंचायत चुनाव में स्वीप कर, पंचायत से सभी कमजोर पहलुओं को दुरुस्त करना और समानता पर आधारित विकसित समाज बनाने की पहल करना है। बिहार में वर्ष 2011 का पंचायत चुनाव के तीसरे चरण से गुजर चुका है। अभी 7 और चरण बाकी हैं, जहां के मतदाता अपने गांव में अपने राज की अवधारणा को सफल बनाने के लिए योग्य नेतृत्व का चयन करेंगे। बेशक महिलाएं राजनीति के सकारात्मक मायने समझ चुकी हैं और वे अपनी इस महत्त्वपूर्ण भूमिका को खुल कर निभाने में लगी हुई हैं। पंचायत चुनाव के दस्तक देने से पूर्व ही महिलाओं ने चुनाव की रणनीति बनानी शरू की। उन्होंने महिला मतदाताओं को राजनीति और इसमें उनकी अहम भूमिका से भी अवगत कराया। पूर्व की महिला जनप्रतिनिधि पुन: पंचायतों में चुनकर आने और पिछले पांच सालों में सीखी गई बातों को जमीन पर उतारने के लिए व्याकुल हैं। दूसरी तरफ घर के आंगन की महिलाएं भी पंचायत की पगडंडियों पर अपने सफर की शुरुआत के लिए उतावली हैं। वह नेतृत्व करना चाहती हैं। अपनी पंचायत का, अपने समुदाय का, समाज का -जहां अभी बहुत काम करना बाकी है। सशक्त महिला नेतृत्व के माध्यम से मजबूत पंचायती राज का सपना तभी साकार होगा जब महिला समुदाय की सक्रिय और सजग भागीदारी पंचायती राज व्यवस्था में होगी।
Thursday, April 28, 2011
बंदिशों की चुभन
लड़कियों के मामले में अपना समाज कितनी लिजलिजी सोच रखता है, यह बार-बार याद दिलाने की जरूरत क्यों पड़ती है? एक करोड़ दस लाख परित्यक्त बच्चों में 90 फीसद लड़कियां होती हैं। सिंगल मदर या कुंवारी मांओं को लेकर उपेक्षाभाव रखने वालों से यह सवाल पूछा जाना जरूरी है कि वैवाहिक संबंधों की मजबूत बेड़ियां भी अपनी नन्हीं बच्चियों को सुरक्षा क्यों नहीं दे पा रही हैं? केवल मादा भ्रूणहत्या को लेकर बयानबाजी करते रहने, पोस्टर छापने, अखबारों में सरकारी विज्ञापन देने से बच्चियों को बचाने का 'ढोंग' करने वाली सरकार को यह क्यों नजर नहीं आता? उसी समय सुप्रीम कोर्ट मान रहा है कि हमारी इतनी ज्यादा लड़कियां परिवारवालों द्वारा छोड़ दी जाती हैं। खोये हुए बच्चे भी अपने यहां तभी मुस्तैदी से ढ़ूंढे जाते हैं, जब वे संपन्न घरों से आते हों। गरीब के बच्चे को ढ़ूंढ निकालने में किसी की कोई दिलचस्पी नहीं होती। उनके गुम हो जाने पर ना तो बड़ी प्रेस कांफ्रेस होती है, ना ही मीडिया कैमरों के साथ उमड़ता है। आज भी अपने यहां बेटी का पैदा होना अनचाहा ही होता है। बिहार और राजस्थान के तमाम इलाकों में नवजात लड़कियों को मारने वाली दाइयों का दबदबा रहा है। कुछ पैसों के लोभ में ये पैदा होते ही बच्ची को मारने की विशेषज्ञ होती हैं। दोष इन दाइयों का नहीं है, ये तो मात्र घरेलू प्रसव विशेषज्ञ होती हैं, अपनी गरीबी और लोभ के चलते ये चांडाल का काम करने लगती हैं। मेरा मानना है, इनको कोसने से समाज नहीं बदल सकता। जैसे 'बेटी बचाओ' का स्लोगन बच्चियों को मरने से नहीं रोक पाया, उल्टे उसने बच्चियों के त्याग का एक और संवेदनहीन तरीका अख्तियार कर लिया है जिसमें परिवार खुद को जान लेने के पाप से मुक्त मान लेता है। बस में , रेल-यात्रा के दौरान, मे ले-ठे ले में छोटी लड़कियों को छोड़ कर भाग निकलने वाले मां-बाप को आप क्या कहेंगे? दकियानूस विचारधारा और सामाजिक ढोंगों ने मानसिकता ही इतनी घटिया कर दी है कि संवेदन-शून्यता हावी होती जा रही है। बेटे की चाह में लड़कियों की लाइन लगाने वाले दंपति सिर्फ नासमझ ही नहीं होते, उनके भीतर की भावनाएं भी मर चुकी होती हैं। मादाओं के प्रति होने वाली उपेक्षा जब वैश्विक पटल पर घृणित-दृष्टि से देखी जाती है तो घबरा कर सरकारें उपाय ढूंढने का ढोंग करने लगती हैं। मादा भ्रूणहत्याओं को रोकने के नाम पर सरकार पैसा ही नहीं लुटा रही, विदेशों से भी मोटी सहायता खींची जाती है, जबकि असलियत तो यही है कि लड़कियों को गर्भ से निकाल कर ना मारा जाए तो भी जन्मते ही गला घोंट दिया जाता है या फिर ऐसे ही मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। दो-चार औरतों की तरक्की को नमूने के तौर पर पेश कर अपना फेस सेव करने वालों की अक्ल मारी गई है, उनको यह सब हकीकत नहीं नजर आती। जो परिवार लड़कियों को कहीं छोड़ने का साहस नहीं कर पाते, वे बहुत छोटी ही उम्र में उनको ब्याहते हैं ताकि उनका बोझ कुछ कम हो सके। इनको स्कूलों में नहीं डाला जाता, अक्षर ज्ञान तक नहीं कराया जाता। छोटी ही उम्र में चूल्हा फूंकने, जलावन ढ़ूंढ कर लाने, दूर किसी सार्वजनिक कुएं/जलाशय से पानी ढोकर लाने या ढोर चराने की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है। घर के छोटे बच्चों को पालना इनका नैतिक दायित्व बन जाता है, रोटी पकाने, बासन धो ने, घास छीलने को ही ये अपना मनोरंजन समझ लेती हैं। खबर है, मेरठ में एक गरीब बाप अपनी दो लड़कियों को घर में कैद किये है, यह सुनकर अजीब लग सकता है पर उसकी बेचारगी इस घिनौनी-व्यवस्था का नमूना है। वह कहता है कि बच्चियां विक्षिप्त हैं और इलाज कराने के लिए उसके पास पैसा नहीं है इसलिए वहशी दरिंदों से इनको बचाने का उसको यह सस्ता-टिकाऊ तरीका लगा। परिवारों की प्रशस्ति करने वालों और पश्चिमी समाज का मखौल उड़ाने वालों से पूछा जाना चाहिए कि सभ्य समाज की हकीकत यही है क्या? यह सरकार की लाचारी है कि वह दुनियाभर में अपनी सस्ती चिकित्सा सुविधाओं के लिए प्रसिद्धि पा रही है, पर गांव/कस्बे में लोग पैसों के अभाव में लाइलाज ही मरते जा रहे हैं। बेटी को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी के लिए इसी बाप ने अपनी बेटी को कैद नहीं कर रखा है। संभ्रांत दिखने वाले पढ़े-लिखे, शहरी भी अपनी नन्हीं बच्चियों को दरिंदगी से बचाने के लिए कुछ ऐसा कर रहे हैं। इनमें से कोई भी अन्ना हजारे की तरह आंदोलन नहीं करना चाहता। कोई जुबान नहीं हिलाता पर सबको अपनी बेटी की फिक्र है। कहीं सुरक्षाकर्मी बने दादाजी बस स्टॉप तक जा रहे हैं, कहीं मां धूप में झुलस रही है। खेल का मैदान हो या परिवहन, मां की चौकसी बढ़ती जा रही है। वह बच्ची से उसकी स्वतंत्रता किसी जालिम की तरह छीन रही है। समाज में छुट्टा घूमते बलात्कारी भेड़ियों से अपनी बच्ची को बचाये रखने का यह भय किस समाज को रच रहा है? बच्चों के एक बहुत अच्छे स्कूल के गेट पर हर रोज मैं एक मां को सुबह और दोपहर सीखचों के पार से अपनी बिटिया को ताकते देखती हूं। स्कूल की बिल्डिंग में जब तक वह घुस ना जाए, तब तक वह ऐसे ही एकटक उसको ताकती नजर आती है, दोपहर को छुट्टी से कुछ पहले ही आकर वह गेट पर मुस्तैद हो जाती है। सालों से यह नजारा मैंने देखा है और इस व्यवस्था के घिनौनेपन से घृणा से भरा पाया है खुद को, जहां अपने बच्चे को सुरक्षित माहौल नहीं दे पा रहे हम। बेटी की 'बॉडी गार्ड' बन चुकी इस मां की भावनाओं पर कोई संदे ह नहीं कर रही मैं, पर कोई यह भी सोचेगा कि उस बच्ची की गुलामी, सुरक्षा के नाम पर बंधनों की यह जकड़न उसको भीतर से कितना कमजोर कर रही है? सिर्फ गरीब और साधनहीन मांओं की ये दिक्कतें नहीं हैं, यही झेलना पड़ता है, विशाल बंगले में सुरक्षा गाडरे और नौकरों से चाक-चौबन्द मां को भी। आरुषी और हेमराज की मौत के पीछे मां तलवार की घोर लापरवाही को मैंने कभी नकारा नहीं है। युवा होती बेटी को पुरुष नौकर के भरोसे छोड़ना किसी भी एंगल से सामान्य नहीं कहा जा सकता, तब भी जब वह सालों से आपका विश्वसनीय रहा हो। स्त्री-पुरुष के दरम्यान कब- क्या घटित हो जाए, कहा नहीं जा सकता पर पुरुष के भीतर का हैवान कन्या पर कभी भी सवार हो सकता है, इस पर डाउट नहीं किया जा सकता! छोटी बच्चियों पर होने वाले यौनाक्रमणों के अपराधी 80 फीसद जान-पहचान वाले या रिश्तेदार ही होते हैं। लेकिन पुरुषों की इन घिनौनी मानसिकता से बच्चियों को बचाने के लिए ना तो बेड़ियां कारगर हो सकती हैं, ना ही ताले। पाबंदियों से उसका आत्मविश्वास और साहस कुचला ही नहीं जा रहा, उसको इन्हीं बच्चियों की तरह बेबस भी बनाया जा रहा है, जिनको त्याग दिया जाता है। ये बेसहारा छोड़ दी गई उपेक्षित हैं, अकेली हैं, इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। और सुरक्षित रखने के नाम पर जिनकी मानसिक प्रताड़ना चल रही है, दम घुट रहा है। निजता को चूर-चूर किया जा रहा है। दोनों के मन एक बराबर कमजोर बनाये जा रहे हैं। दोनों ही घुटन में हैं। दोनों ही असहाय और बेचारगी जी रही हैं। इन सबकी मुक्ति के उपाय कौन करेगा? किसको फिक्र है इनकी? इस भयानक समाज में इन्हीं दरिंदों के बीच उसको सारा जीवन काटना है। जैसा पालन किया जा रहा है, वह तो इनको हमेशा किसी मजबूत सहारे को तलाशने को छोड़ने वाला है। आश्रित बना रहा है इनको। मानसिक रूप से भी और दैहिक रूप से भी। यह है इस मक्कार समाज का सच, जहां कुछ लोग बेटी को त्यागने को बेबस किये जा रहे हैं तो कुछ मानसिक/भावनात्मक रूप से उसका दम घोटने को मजबूर हैं। बच्चियां परित्यक्त हों या पाबंदियों तले जीने को मजबूर, इसका दोषी है यह समाज, जिसे कुछ लोग सभ्य कहते शर्माते नहीं। कुछ मां-बाप घबरा कर उन्हें फुटपाथ पर या कचरे ढेर में फेंकने को मजबूर हैं तो कुछ हर वक्त उन पर छतरी के तरह छाये रहने को मजबूर। ऐसे में कैसे होगा उनका विकास। कैसे आयेगा उनको पंख फैला कर उड़ना। कैसे सीखेंगी वे अपनी शख्सियत को तराशना। फिर बहाने करेंगे, बेटे की दीवानगी के। लैंगिक विभेद के जितने बारीक और खतरनाक कांटें अपने यहां बिछे हैं, उतने शायद ही किसी समाज में होंगे। जिनको ढांपने का ढोंग करने वाले कभी उस पीड़ा को समझ भी नहीं सकते, जिनकी चुभन नन्हीं बच्चियां और उनके परिवार हर रोज झेलते हैं।
Friday, April 22, 2011
प्यार+पुरुष = प्रचार
औरतों को खुद को महान दिखाने के लिए जरूरी है, अपनी भावनाओं को कुचल डालें। वे जो वास्तव में हैं, उसको छिपा लें! बने-बनाये रिश्तों को मासूमियत के साथ जीने का ढोंग करती रहें। मन में भी किसी की छवि आ जाए तो स्यापा करने लगें। प्रेम हो भी जाए तो मौन रहें। प्रेम-प्रदर्शन से बचें! इस दिखावे के चक्कर में होता यही है कि वे चिड़चिड़ी, झगड़ालू और शकी होती जाती हैं
मशहूर उद्योगपति रतन टाटा अपनी तमाम व्यावसायिक बुलंदियों की बजाए इस दफा अपने प्रेम- संबंधों को लेकर र्चचा में हैं। उन्होंने बेहद खुले मन से किसी विदेशी चैनल को इंटरव्यू देते हुए स्वीकारा कि वे जीवन में चार बार 'सीरियस' प्रेम में पड़े। धुरंधर उद्योगपति की यह सीरियसली प्रेम करने वाली अदा सबको बड़ी भायी। यह धन-कुबेर यहां सलमान खान से पिछड़ भले ही गया, पर इस उम्र में यह कहकर कि वे लगभग शादी करने ही जा रहे थे कि दो देशों की जंग छिड़ गई और उनका दांपत्य बनते-बनते रह गया। अपने दर्द को छिपाने का प्रयास करते हुए उन्होंने माना कि जो हुआ, वह अच्छा ही रहा। मानो उनके घर में हमारे-आपके घर की तरह कोई कलह होने जा रही थी। अब तो फिल्म इंडस्ट्री के सबसे बड़े कुंवारे सलमान भी मानने लगे हैं कि इश्क तो ठीक है पर शादी की जिम्मेदारी उनको डराती है। इसको उनकी बेबाकी मान कर अनसुना सा किया जा सकता है पर यह अधिकार किसी औरत को देने में सबकी नानी मरती है? निश्चित रूप से पुरुषों की कुछ ज्यादा ही। इस तरह का कोई खुलासा करते हुए हमारी औरतें घबरा क्यों जाती हैं! टाटा को प्यार चार बार हो सकता है, सलमान को दस बार, राजेश खन्ना छह और महेश भट्ट पांच बार प्यार करते हैं। ये इसीलिए ऐसा कर पाते हैं क्योंकि इन्होंने यह अधिकार बेहद बेदर्दी से हमेशा से छेंक रखा है। अपने प्रेम पर इतराना और उसको छोड़ कर आगे बढ़ जाना पुरुष के लिए संतोषजनक होता है, पर स्त्री के लिए नहीं। शायद यही कारण है कि पुरुष एक साथ कई लड़कियों को 'टहला'
लेता है, जबकि औरत एक बार में एक पर ही 'कन्संट्रेट' करती है। यहां मैं उनकी बात कतई नहीं कर रही, जो पुरुषों का इस्तेमाल किसी परपज से कर रही होती हैं, क्योंकि इसमें संवेदना नहीं होती। प्रेम की आड़ में होने वाले खिलवाड़ों को भावनात्मक लगाव से न जोड़ा जाना ठीक है। लाभ के लोभ में बनाया गया कोई भी रिश्ता टेम्प्रेरी ही होता है। अपने यहां यूं भी औरतों को रिश्तों में बांध कर किसी अंधेरे कोने की तरफ फेंक देने की पुरानी परंपरा है। कई-कई औरतों से संबंध रखने को पुरुष अपनी सत्ता से जोड़ता है। जो ताकतवर है, पावरफुल है, धनवान और वीर्यवान है, उसकी तरफ आकर्षित होने वाली हर स्त्री उसकी गुलाम ना भी हो तो भी उसके लोभों को नहीं पहचाना जा सकता। ऐसा पहले भी होता था, आज भी हो रहा है और आगे भी होता रहेगा। प्रेम प्राकृतिक जरूरत है। सब चाहते हैं, उनको कोई ना कोई प्यार करे। प्रेमविहीन जीवन वही जी सकता है, जिसके भीतर किसी तरह की कोई संवेदनशीलता ही शेष ना हो। हम खुद कुछ करें ना करें, पर दूसरों से यही उम्मीद रखते हैं कि वे हमको जबर्दस्त रूप से चाहें। अब आते हैं इस प्रेम की चाहना के स्त्रीवादी पक्ष पर। पुरुषों ने क्योंकि औरत को कभी 'वस्तु' से ज्यादा कुछ माना ही नहीं, इसलिए उनकी सारी की सारी प्रतिक्रियाएं आज भी इसी दुविधा की शिकार हैं। जब वे ये लफ्फाजियां कर रहे होते हैं कि उन्होंने इतनी औरतों से प्रेम किया, तो वे अपनी भावनाओं के बल पर नहीं फेंक रहे होते, वे अपने पावर को एन्ज्वॉय करने और कराने की कोशिश में होते हैं। ऐसा नहीं है कि यह केवल धन वालों या पराक्रमियों का ही अंदाज है। सामाजिक जीवन में गरीब से गरीब पुरुष के कई औरतों से संबंध होते हैं। घर-घुस्सू औरतें भी पति के भाई, बहनोई, युवा होते भतीजों-भांजों की गिरफ्त में आ ही जाती हैं। कई बार ये उड़ानें बहुत सीमित होती हैं तो कभी-कभी जबरदस्त नजदीकियों के बावजूद परिवार पर आने वाली आंच के भय से दूरियां जानबूझ कर बढ़ा ली जाती हैं। यह सच है कि प्रेम पर किसी का जोर नहीं होता, पर उससे भी बड़ा सच है कि पुरुषों को प्रेम-प्रदर्शन के मौके बारम्बार मिलते हैं, जबकि औरतों के प्रेम पर पहरे होते हैं। औरतों पर शुचिता के इतने कड़े पहरे रहते हैं कि उनको भावनाओं को काबू रखने की कला अनजाने ही सीखनी पड़ती है। बल्कि यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि औरतों को बार-बार अपनी शुचिता के इम्तिहान से गुजरना पड़ता है। यह इम्तिहान भले ही सीता माता की तरह अग्नि परीक्षा जैसा ना हो, पर धधकती हुई मानसिक आग में कूदने जैसा तो होता ही है। मनोविज्ञान कहता है कि किसी को जीवन में कई बार भी प्यार हो सकता है, जैसा कि टाटा या सलमान को होता रहता है। सैफ अली का प्यार भी साल दर साल बदलता है पर उनकी फैन्स लिस्ट ज्यों की त्यों रहती है। करीना का शाहिद कपूर को डिच (धोखा) करना युवाओं को अखरता है। युवक तो युवक, लड़कियां भी करीना से नाराज हो जाती हैं। पांच शादियां करने वाले हरफनमौला किशोर कुमार ने प्यार ना जाने कितनी औरतों से किया होगा? ये बड़े लोग हैं। संपन्न हैं। समृद्धि इनके कदम चूमती है। ये चुटकियों में जो चाहें, उसे कदमों में गिराने का माद्दा रखते हैं। इनके प्यार पर किसी घर-परिवार-समाज का दबाव नहीं होता। इनकी इज्जत भी हमारी-आपकी इज्जत की तरह जरा सी पोटली में नहीं होती, विशाल खजाने सी इज्जत कितना भी गिरने पर गुमती नहीं। सीना चौड़ा करके ये एलानियां दंभ दिखाते हैं, इतने प्यार किये, लगभग बीवी की तरह रखा, शादी करते-करते छोड़ दिया। पर यही बात जब मीना कुमारी, रेखा या दूसरी हीरोइनों के लिए आती है तो भौंएं तन जाती हैं। लता दीदी को प्यार करते देखने की हिम्मत ना जुटा पाने वालों की भी यही दिक्कत है। उनकी शुचिता का ठेका जो ले रखा है हमने। औरतों को खुद को महान दिखाने के लिए जरूरी है अपनी भावनाओं को कुचल डालें। वे जो वास्तव में हैं, उसको छिपा लें। बने-बनाये रिश्तों को मासूमियत के साथ जीने का ढोंग करती रहें। मन में भी किसी की छवि आ जाए तो स्यापा करने लगें। प्रेम हो भी जाए तो मौन रहें। प्रेम-प्रदर्शन से बचें। इस दिखावे के चक्कर में होता यही है कि वे चिड़चिड़ी, झगड़ालू और शकी होती जाती हैं। अपने इसी प्रेम को दबाने की खीज के चलते वे पति पर पाबंदियां थोपती फिरती हैं। उसको चाय-नाश्ते के साथ विशेषज्ञ की नाइर्ं सीख देती रहती हैं कि 'लड़कियों से खबरदार, उनसे दूरी बनाये रखो।' यह मिस कॉल किसकी थी, वह एसएमएस क्यों आया? अकसर यह भी हिदायत देने से वे बाज नहीं आतीं कि कुंवारी लड़कियां काला जादू करा कर ब्याहता मदरे को अपने कब्जे में करने के गुर जानती हैं। दरअसल, खुद के कहीं और आकर्षित हो जाने के भय से विमुख होने के ढोंग में वे नीरस होती जाती हैं। कॉलेज के रास्ते में आने वाला, घर से बाहर दिखता, कहीं पड़ोस में, रिश्तेदारों में, परिवार के चचेरे-ममेरे भइयाओं और दादाओं के आकर्षण में कभी ना कभी कैद रही युवा होती लड़की के जीवन का वही आइडियल होता है। 14 से 18 साल की उम्र ही ऐसी होती है, जिसमें किसी के आकर्षण की गिरफ्त में आने से शायद ही कोई बचता है। टाटा कहते हैं- चार बार प्रेम हुआ, वे इसको आकर्षण नहीं बता रहे। आकर्षण यानी अंग्रेजी का 'इनफैचुएशन' बार-बार होता है। बस दोनों का फर्क समझने में लोग फेल हो जाते हैं। अपनी गऊ टाइप औरतों के प्रेम के चरित्र भी बदलते हैं, अपने दायरे में ही वे सबसे पहले (अनजाने ही) अपने किसी बड़े भइया/छोटे चाचा की दीवानी हो जाती हैं। कम उम्र में ही ब्याह दी गई तो देवर या ननदोई की, थो ड़ा आगे चले तो पति के साथ काम करने वाले किसी शर्माजी/चोपड़ाजी की अदाओं पर मर मिटने लगती हैं। अधेड़ होने तक बच्चों के टय़ूशन टीचर या बॉलीबाल मास्टर पर दिल आ सकता है। यह सिलसिला यूं ही सारा जीवन चलता रहता है। पर अपने प्रेम-संबंधों को लगातार दोहरा कर शेखी बघारने वाला पति नाम का पुरुष अपनी औरत के इस आकर्षित होने को भी वैर-भाव से ही लेता है। अपने अंदाज में जीने के लिए चर्चित रही एलिजाबेथ टेलर की मौत की खबर में सबसे महत्व जिसको मिला, वह उनकी प्रतिभा या ऑस्कर विजेता होना नहीं था, बल्कि उनकी आठ शदियां थीं जिनके बारे में सुन/पढ़ कर हर मन आज भी ललचा उठा। कोई आपके जीवन में आया ही नहीं या आपका मन किसी के लिए मचला ही नहीं, यह तो इम्पॉसिबिल है। हां, आप यह मान सकती/सकते हैं कि आपका साहस चुक गया, आप डर गये, आपका आत्मविश्वास डगमगा गया, सामाजिक-पारिवारिक दबावों की घुटन में हिम्मत जवाब दे गई ..या फिर यह भी कि आपको उसका अहसास ही तब हुआ, जब सबकुछ खत्म हो चुका था।
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