हाल में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने यह स्वीकार किया कि विश्वविद्यालय से जुडे़ सभी कॉलेजों में महिला शिक्षक अब अपने चाइल्ड केयर लीव का उपयोग आसानी से कर पाएंगी। दरअसल विकल्प के अभाव में कई कॉलेजों की महिला शिक्षक बच्चों की देखभाल वाली छुट्टियां नहीं ले पा रही थीं। यूजीसी के स्पष्टीकरण के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा है कि चाइल्ड केयर लीव पर जाने वाली शिक्षिकाओं की जगह तदर्थ तथा गेस्ट लेक्चरर की नियुक्ति की जाएगी। यह सही है कि छात्रों के लिए वैकल्पिक इंतजाम जरूरी हैं ताकि उनकी पढ़ाई बाधित न हो, लेकिन यूजीसी से यह अवश्य पूछा जाना चाहिए कि वह चाइल्ड केयर की सुविधा सिर्फ महिलाओं को किन वजहों से दे रहा है? वैसे तो यह नियम केंद्र सरकार ने बनाया है और उससे भी यह पूछना चाहिए कि बच्चों की देखभाल बच्चों के पिता क्यों नहीं करेंगे? मातृत्व अवकाश तो महिलाओं को ही मिलना चाहिए और यह सही है कि उसे तीन महीने से बढ़ाकर छह माह किया गया है। इस समय मांओं को स्वास्थ्य लाभ के साथ नवजात शिशु को स्तनपान भी कराना होता है इसलिए यदि मातृत्व अवकाश को जरूरत पड़ने पर कुछ माह और बढ़ा दिया जाए तो वह वाजिब होगा, लेकिन चाइल्ड केयर लीव की सुविधा तो बच्चे की शुरुआती उम्र से लेकर 18 वर्ष के होने तक कभी भी ली जा सकती है। बच्चों की जरूरतें ऐसी होती हैं, जिसमें माता-पिता को छुट्टी लेनी पड़ती है और नौकरी के दौरान कर्मचारी को ऐसा मौका अवश्य मिलना चाहिए कि वह अपने बच्चे की परवरिश ठीक से कर पाए। याद रहे कि जब गृह मंत्रालय ने महिलाओं के लिए ढाई साल के देखभाल अवकाश को मंजूरी दी तो मीडिया ने उसे महिलापक्षी कदम बताया था। लोगों ने कहा और लिखा कि आजकल के एकल परिवारों में जहां पति-पत्नी दोनों नौकरी पर जाते हों वहां बच्चे बेचारे उपेक्षित रह जाते हैं। साथ ही सरकार ने यह कहा कि ऐसी सुविधा वह इसलिए दे रही है ताकि महिलाएं बच्चों की जिम्मेदारी के कारण अपनी नौकरी न छोड़ें और समाज उनके अनुभव का लाभ उठा सके। हो सकता है इन बातों में कुछ सच्चाई भी हो, लेकिन यदि किसी साधारण समझ के इंसान से भी हम समझना चाहें तो जान सकते हैं कि आज के उदारवाद और निजीकरण के जमाने में जहां परफार्मेस ही नौकरी में बने रहने का मूल तत्व हो और प्रतियोगी माहौल सर्वत्र व्याप्त हो तो उसमें ढाई साल तक भले टुकड़े टुकड़े में ही छुट्टी ली गई हो वह अपने कार्यक्षेत्र से बाहर रहेगी तो क्या वह लौटने पर अच्छा नतीजा दे पाएगी? यहां प्रमुख मुद्दा यह है कि जो काम माता-पिता में से कोई भी कर सकता है उसके लिए विकल्प खुला क्यों नहीं रखा जाता ताकि माता-पिता स्वयं तय करें कि वह जिम्मेदारी कौन निभाए? आज के समय में यह सुविधा सिर्फ महिलाओं को देना लिंगभेद के दृष्टिकोण का परिचायक है, क्योंकि एक तो यह जिम्म्ेादारी उठाने के लिए बाध्य करेगा दूसरी बात आज के समय में परफॉर्मेस एक महत्वपूर्ण कारक है। उल्लेखनीय है कि यह छुट्टी दो बच्चों के 18 साल का होने तक कभी भी ढाई-ढाई साल की ली जा सकती है। यानी सभी छुट्टी जोड़ लें तो कुल छह साल तक वह नौकरी पर रहते हुए घर में बिता सकती है। इसे सिर्फ सहूलियत के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि वह एक कर्मचारी और सेवाप्रदाता भी है जिसे सरकारी और सामूहिक खजाने से वेतन मिलता है। बराबर काम के लिए बराबर दाम के साथ बराबर की जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। यह सही है कि बच्चे की जिम्मेदारी उठाकर वह दूसरे रूप में समाज की जिम्मेदारी उठाती है, लेकिन यह जिम्म्ेादारी का बोध पुरुषों में भी डालना जरूरी है। दरअसल, आज के समय में किसी न किसी रूप में यह मुद्दा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में एजेंडा पर आया है कि जब महिलाएं सार्वजनिक दायरे की जिम्मेदारी बराबरी से निभा रही हैं तो निजी दायरा सिर्फ उन्हीं के हिस्से में क्यों माना जाए? शहरी मध्यवर्ग के परिवार इसका एक सतही समाधान निकाल लेता है कि जो काम पहले सिर्फ औरत करती थी, उसके लिए मेड रख ली जाती हैं, लेकिन घर में चाहे जितनी मदद करने वाले रख लिए जाएं, घर मेहनत की मांग करता है और इसीलिए घर के अंदर के काम में साझेदारी एक मुद्दा है। भले ही इसके प्रति असहजता रहे। यही कारण है कि सरकारें भी महिलाओं द्वारा बिना आंदोलन चलाए स्वत: ही यह अधिकार उनकी झोली में डालने के लिए आगे बढ़ी हैं। हालांकि महिलाएं कब से मांग कर रही हैं कि कार्यस्थल को सुरक्षित करने के लिए कानून बने। असंगठित क्षेत्र में आज भी बराबर काम की बराबर मजदूरी का मसला सुनिश्चित नहीं हो पाया है। जिन नौकरियों में महिलाओं की संख्या कम है, वहां उनकी भागीदारी बढ़ाने का खासतौर से उच्च पदों पर कोई विशेष उपाय किए जाएं। इन पर सरकार चिंतित नहीं है, लेकिन परंपरागत रूप से चूंकि घर के अंदर की जिम्मेदारी जिसमें बच्चे भी शामिल हैं महिलाएं ही संभालती आई हैं और समाज में अभी भी यह जिम्मेदारी परिवार के पुरुष सदस्य संभालने को तैयार नहीं हैं। इस कारण सरकार ने भी इस मानसिकता पर अपनी मुहर लगा दी है। जहां तक सहयोग का मसला है उसकी जरूरत पहले भी होती थी किंतु अब यह ज्यादा जरूरी हो गया है, क्योंकि एक तो महिलाओं के काम का दायरा बढ़ गया है तथा दूसरे पूरा पारिवारिक ढांचा बदल गया है। आमतौर पर घर के अंदर काम की जिम्मेदारी औरत के पास तथा बाहर के काम की जिम्मेदारी पुरुष के पास होती थी। गैर बराबरी के खिलाफ जंग में औरत ने बाहर के काम पर दावा ठोंका और जहां-जहां अवसर हासिल होता गया वह साबित करती गई कि वह उस काम को कर सकती है। अब स्वाभाविक ही है कि घर के अंदर के काम में पुरुष के हिस्सेदारी की मांग बनेगी और देर-सबेर पुरुष को यह काम करना होगा अन्यथा यह परिवार में तनाव का कारण भी बनेगा। इस मुद्दे के एक दूसरे पहलू पर भी विचार किया जाना चाहिए। चाइल्ड केयर लीव सिर्फ स्थायी सरकारी कर्मचारी के लिए है। यदि विश्विद्यालय के संदर्भ में इसे देखें तो जिन शिक्षिकाओं की छुट्टी के दौरान तदर्थ या गेस्ट लेक्चरर की नियुक्ति होगी उसमें भी महिला टीचर होगी। चाइल्ड केयर लीव तो उन्हें नहीं ही मिलेगी, क्योंकि वे स्थायी नहीं हैं, लेकिन विश्वविद्यालय के पास उनके मातृत्व अवकाश के लिए भी कोई स्पष्ट नीति नहीं है। ज्ञात हो कि ये नियुक्तियां कुछ-कुछ महीनों के लिए ही होती हैं। जो टीचर कई कई वर्षो से तदर्थ तौर पर पढ़ा रही है उनका सर्विस भी ब्रेक करके नियमानुसार पुनर्नियुक्ति दी जाती है। लिहाजा, वे मातृत्व अवकाश का कानूनी हकदार नहीं बन पाती हैं। महिलाओं का यह उत्पीड़न शिक्षण संस्थाओं में बदस्तूर जारी है। यद्यपि 15 दिन के लिए पिताओं को भी पितृत्व अवकाश का कानूनी प्रावधान है, किंतु आमतौर पर इसके प्रति जागरूकता की कमी है। पिता ऐसी छुट्टी मांगने से संकोच करते हैं और प्राइवेट कंपनियां छुट्टी देती भी नहीं हैं। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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Thursday, September 29, 2011
Wednesday, June 15, 2011
बेटियों से भेदभाव
आमतौर पर यह माना जाता है कि शिक्षित समाज सामाजिक विषयों को लेकर कहीं अधिक संवेदनशील होता है, क्योंकि उसमें चेतना का विकास अपेक्षतया अधिक होता है। मगर यह धारणा कन्याभ्रूण हत्या के संदर्भ में सार्थक सिद्ध नहीं होती। हाल ही में एक अध्ययन से यह तथ्य सामने आया कि पिछले तीन दशकों में लगभग एक करोड़ इक्कीस लाख लड़कियों को गर्भ में ही मार दिया गया। बालक-बालिकाओं के बिगड़ते अनुपात के संबंध में चिंता जाहिर करते हुए देश के प्रधानमंत्री ने इसे राष्ट्रीय शर्म करार देते हुए कहा कि महिलाओं की कामयाबी के बावजूद भारतीय समाज लड़कियों के प्रति पूर्वाग्रह का शिकार है। आम भारतीयों की सोच है कि असंतुलित लिंगानुपात पिछड़े, अशिक्षित और निचले तबकों के कारण है जो बिल्कुल गलत है। सच तो यह है कि पिछले दशक में उनके बीच कन्या शिशुओं की तादाद में खासी बढ़ोत्तरी हुई है। अनेक अध्ययनों से यह तथ्य सामने आ चुका है कि कन्याभ्रूण हत्या की समस्या देश के अपेक्षतया संपन्न इलाकों और सुशिक्षित तबकों में गंभीर रूप धारण कर लिया है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि बीस प्रतिशत संपन्न परिवारों में कन्या भ्रूणहत्या की दर में लगातार इजाफा हुआ है और प्रति एक हजार लड़कों पर लड़कियों की संख्या साढ़े सात सौ तक गिर गई है। शिक्षा और आर्थिक सुदृढ़ता व्यक्ति की मानसिकता को परिवर्तित कर देती है परंतु बेटियों के प्रति दृष्टिकोण को लेकर ऐसा नहंी हुआ, बल्कि संपन्नता और आधुनिक शिक्षा उनके लिए और घातक बन गई है। आधुनिक तकनीक सोनोग्राफी का उपयोग बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य और जीवन रक्षा के लिए होना चाहिए था, लेकिन संकीर्ण विचारधारा से ग्रस्त माता-पिता ने बेटियों को गर्भ में ही समाप्त करने वाले शस्त्र के रूप में उपयोग किया। महिलाएं चाहे कितनी भी शिक्षित हो जाएं, लेकिन अधिकांशतया बेटा ही चाहती हैं, क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज में स्वयं की स्थिति को ऊंचा बनाए रखने का एकमात्र उपाय बेटे की मां होना है। इस सत्य को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि भारतीय परिवारों में, अधिकांश महिलाएं अपने निर्णयों को लेकर आज भी स्वतंत्र नही हैं। उनके हर निर्णय पर परिवार की सहमति अनिवार्य है। बेटे का जन्म प्रतिष्ठा और बेटी का जन्म परिवार के लिए बोझ माना जाता है। भारत में लिंगानुपात आर्थिक तौर पर अपेक्षाकृत अधिक पिछड़े देशों पाकिस्तान व नाइजीरिया से कम है। यूनीसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में रोजाना 7000 लड़कियों की गर्भ में हत्या कर दी जाती है। पिछले कुछ वर्षो में कानून-निर्माताओं ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी, परंतु डॉक्टर और अभिभावक उससे बचने के सहज रास्ते ढूंढ़ लेते हैं। यह उस शोध और अध्ययन परिणामों के आधार पर कहा जा रहा है जिसे देश के महापंजीयक तथा जनगणना आयुक्त, स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय और संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष ने संयुक्त रूप से किया है। अगर यूं ही बेटियों की तादाद में गिरावट आती गई तो यह निश्चित है कि इसका व्यवस्थित सामाजिक ढांचे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। समाज को यह नहीं भूलना चाहिए कि वंश योग्य संतान से चलता है न कि सिर्फ बेटे के जन्म से। मनुष्य की निर्मात्री नारी है तो हमारा समाज बेटियों के प्रति निर्ममता क्यों दिखाता है? जो समाज इतनी निर्ममता से बच्चियों को जन्म से पहले ही मार रहा है उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि अंततोगत्वा उसे इसका परिणाम झेलना होगा, क्योंकि बेटियों की घटती संख्या से उनके भविष्य पर सामाजिक दबाव निश्चित तौर पर बढे़गा। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जो परिवार अब भी संकीर्ण मानसिकता को छोड़ने के लिए तैयार नही हैं उनके लिए कानून के बंधनों को इतना कठोर बनाने की जरूरत है कि स्वप्न में भी बालिका भू्रणहत्या की कल्पना न कर सकें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Wednesday, June 1, 2011
कैसे ढूंढेंगे 136 महिला पार्षद!
पार्टी संगठन में महिलाओं को बहुत ज्यादा तवज्जो न देने का खामियाजा राजनीति दलों को भुगतना पड़ सकता है। दलों के सामने यक्ष प्रश्न होगा कि पुनर्गठित एमसीडी में कहां से 50 फीसदी वैसे उम्मीदवार को लाए जो महिला हो और राजनीति में दल विशेष में अच्छा खासा अनुभव हो। दिल्ली सरकार ने दिल्ली में तीन नगर निगम बनाने का फैसला तो ले लिया साथ ही उसमें महिलाओं की सीटों का आरक्षण 50 प्रतिशत कर दिया है। इस हिसाब से नगर निगम में महिलाएं पुरुषों पर भारी पड़ने वाली हैं। वर्ष 2007 में एमसीडी चुनाव में वार्डो की संख्या 272 हुई थी तो वहां पहले से 33 फीसदी आरक्षण होने से 91 महिला प्रत्याशी ढ़ूढने में ही राजनीतिक दलों के पसीने निकल गए। इस कारण कई पति पार्षदों (जिनके पति टिकट के कतार में थे लेकिन सीटें आरक्षित हो जाने से उन्हें टिकट नहीं मिल सका) को मैदान में उतारा गया। अब दिल्ली सरकार ने वहां महिलाओं का आरक्षण 50 प्रतिशत कर दिया है, इस लिहाज से वहां अब 136 महिला पार्षद चुनी जाएंगी, यानी कई पुरुष नेताओं या पार्षदों की टिकटें हर हाल में कटेंगी। सूत्र बताते हैं कि एमसीडी में अभी जितनी भी महिला पार्षद हैं, उनमें से करीब 75 प्रतिशत महिलाएं पार्टी के किसी पुरुष नेता की पत्नी या रिश्तेदार हैं। इनमें से कुछ ही महिलाएं ऐसी हैं, जो स्वतंत्र रूप से राजनीति कर रही हैं। वर्तमान नगर निगम में देखें तो कई महिलाओं को इसलिए टिकट मिल गया कि अंतिम समय में कई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो गई, जिसके चलते इलाके के भारी भरकम नेता की महिला रिश्तेदार को टिकट थमा दी गई। प्रस्तावित एमसीडी में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षित संबंधी सरकार के इस निर्णय से पुरुष नेताओं की चिंताएं अभी से बढ़ गई हैं। इन सबके बावजूद दिल्ली के नेता खासे बेचैन हैं। इस मामले में जब जागरण ने कुछ पार्षदों से बात की तो उनका मानना है कि महिलाओं का आरक्षण बढ़ने से उनकी नेतागिरी खतरे में पड़ सकती है। उन्होंने साफ कहा कि आरक्षण के कारण अगर उन्हें टिकट नहीं मिलता है तो वे अपने परिवार की महिलाओं को चुनाव लड़ाने से परहेज नहीं करेंगे। उनका कहना है कि वे सालों से पार्टी में जान इसीलिए तो लड़ा रहे हैं कि जनप्रतिनिधि बनें, लेकिन अगर ऐसा नहीं होता तो उनके घर की महिलाओं को चुनाव लड़ाने में बुराई क्या है।
आइएमएफ की मुखिया महिला क्यों नहीं
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) का अगला अध्यक्ष कौन होगा? हमेशा की तरह कोई यूरोपीय इस पद को संभालेगा या यूरोप से बाहर के किसी व्यक्ति को इस अहम पद का ताज सौंपकर नया इतिहास रचा जाएगा। इस सवाल पर विकसित और विकासशील देशों के बीच बहस शुरू हो चुकी है। इस बहस में एक तरफ जी-20 के देश भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और रूस हैं तो दूसरी तरफ अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, इटली। दरअसल, आइएमएफ प्रमुख पद संबंधी बहस में एक और पहलू भी जुड़ गया है। बहस ने यह रुख भी अख्तियार कर लिया है कि क्यों न इस बार किसी महिला को यह प्रमुख पद सौंपकर 55 साल पुरानी रवायत को तोड़ते हुए एक आदर्श मिसाल कायम की जाए। बता दें कि आइएमएफ के अब तक इतिहास में कभी भी शीर्ष पद पर किसी महिला की ताजपोशी नहीं हो पाई है। आइएमएफ के प्रमुख पद को लेकर हाल में बहस तब शुरू हुई, जब कुछ दिन पहले इस संगठन के पूर्व प्रमुख डोमेनिक स्ट्रॉस कॉन को दुराचार के आरोपों के कारण अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था। स्ट्रॉस कॉन पर अमेरिका के मैनहट्टन में एक होटल की एक महिला कर्मचारी के साथ दुष्कर्म के प्रयास का आरोप लगाया गया है। अब वह जमानत पर रिहा हैं, लेकिन उन्हें आइएमएफ प्रमुख के पद से इस्तीफा देना पड़ा। बहरहाल, उनके इस्तीफा देने के बाद से आइएमएफ की महिला कर्मचारियों ने इस पद पर किसी महिला को चुने जाने की पैरवी शुरू कर दी है। ई-मेल के जरिए मुहिम हाल में न्यूयार्क टाइम्स ने अपने एक लेख में खुलासा किया था कि किस प्रकार आइएमएफ में कार्यरत महिलाएं इस विश्वस्तरीय वित्तीय संस्थान में पुरुषों के वर्चस्व को लेकर परेशान हैं। यौन उत्पीड़न की शिकायतों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता। पुरुषों की तुलना में बहुत कम महिलाएं शीर्ष पदों पर हैं। अलबत्ता, महिलाओं ने स्ट्रॉस कॉन की इस घटना के बाद सोचा कि महिला प्रमुख पद की मांग को उठाने के लिए यह उचित मौका है। अगर कोई महिला इस संस्थान की मुखिया बन कर आती है तो संभवत: कार्यस्थल पर माहौल ज्यादा वुमन फ्रेंडली बन जाए। संस्थान के वैश्विक स्तर पर महिला हितों के प्रतिकूल नजरिए और नीतियों में बदलाव का रास्ता खुले। लिहाजा ई-मेल के जरिए विचारों का आदान-प्रदान शुरू हुआ। अमेरिकी समाचार एजेंसी सीएनएन ने दावा किया है कि उसके पास इन ई-मेल का ब्यौरा है। एक महिला अधिकारी का कहना है कि आइएमएफ जैसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संस्थान की नकारात्मक छवि को तोड़ने के लिए बेहतर होगा कि एक महिला को इसका प्रमुख बना दिया जाए। वैसे भी महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले बेहतर मैनेजर माना जाता है। एक अन्य महिला लिखती हैं कि क्या हमें आइएमएफ में ग्लास सिलिंग नहीं होने का ढोंग जारी रखना चाहिए? ऐसी आवाजों के पीछे वॉशिंगटन स्थित आइएमएफ की दो बड़ी-बड़ी इमारतों की कार्यशैली और महिलाओं की कम संख्या भी वजह है। आइएमएफ में महिलाओं की भागीदारी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद आर्थिक संकट से बचने और वैश्विक अर्थव्यवस्था के सार्थक विकास के लिए 1945 में आइएमएफ का गठन किया गया था। आज इस सस्ंथान में 2,421 लोगों का स्टाफ है। इसके 30 सीनियर एक्यूजिटव में सिर्फ छह महिलाएं हैं। मैनेजर स्तर पर महिलाओं की भागीदारी 21.5 प्रतिशत है। आइएमएफ में शीर्ष पदों पर पेशेवर महिलाओं की कम संख्या से जुड़ी इस ताजा बहस ने अन्य संस्थानों का जायजा लेने का भी माहौल बना दिया है। दुनिया के कई देशों में कंपनियों के बोर्ड रूम में बहुत कम महिला निदेशक नजर आती हैं। महिलाएं और वैश्विक नजरिया उद्योग चैंबर एसोचैम के अध्ययन कारपोरेट वुमन क्लोज द जेंडर गैप एंड ड्रीम बिग के अनुसार, कनाडा और अमेरिका में ऐसे महत्वपूर्ण पदों पर 15 व 14.5 प्रतिशत महिलाएं हैं। ब्रिटेन में यह संख्या करीब 12.5 प्रतिशत है। नार्वे में 39 तो स्वीडन में 25 प्रतिशत है। फिनलैंड में 23 प्रतिशत है। हांगकांग और ऑस्ट्रेलिया में यह संख्या क्रमवार 8.9 और 8.3 है। दुनिया के 39 देशों में हुए एक सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक थाईलैंड में महिला सीईओ की संख्या सबसे ज्यादा है। इस देश में विभिन्न कंपनियों में सीईओ के रूप में 30 प्रतिशत महिलाएं काम कर रही हैं। चीन केवल 19 प्रतिशत महिला सीईओ के साथ दुनिया में दूसरे नंबर पर है। यूरोपीय देशों में यह प्रतिशत नौ और उत्तरी अमेरिका में केवल पांच प्रतिशत ही है। जहां तक अपने देश भारत का सवाल है तो बीएसई की चोटी की 100 कंपनियों के बोर्ड में महिलाओं की संख्या महज 5.3 प्रतिशत है। बीएसई की इन सूचीबद्ध कंपनियों में 1,112 निदेशक हैं, जिनमें 59 महिलाएं हैं यानी 5.3 प्रतिशत। दरअसल, ऐसे अध्ययनों और सर्वेक्षणों का मकसद कारपोरेट क्षेत्र में ऊंचे पदों पर महिलाओं की कम संख्या वाले मुद्दे को उठाना और बदलाव के लिए बहस का माहौल बनाना है। विभिन्न देशों ने महिलाओं को बोर्ड रूम में शमिल करने के लिए अलग-अलग नीतियां अपनाई हैं, क्योंकि अनुभव बताता है कि विशेष प्रयास किए बिना स्थिति सुधरने वाली नहीं। नार्वे और स्पेन की सरकार ने महिला निदेशकों की अनिवार्य भर्ती संबंधी कानून बनाया और इसके सकारात्मक नतीजे सामने आए। आज नार्वे में महिला निदेशकों की संख्या 39 प्रतिशत है और इसी तरह स्पेन में भी महिलाओं की स्थिति सुधरी है। अमेरिका में 15 प्रतिशत महिलाएं हैं और बोर्ड रूम में महिलाओं की यह संख्या बीते कई सालों से सरकी नहीं है। वहां कोई कानूनी पहल के बगैर बोर्ड रूम में कब्जा करने वाली पुरुष मानसिकता को बदलने पर है। ब्रिटेन में भी कानून नहीं है और यह आंकड़ा 12.5 पर ही अटका हुआ है। वहां सरकार ने हाल में कारपोरेट सेक्टर में महिलाओं की कम तादाद पर एक जांच कराई और इस जांच के नतीजों ने कंपनियों को अपने-अपने यहां महिला कार्यकारी अधिकारियों की अनिवार्य नियुक्ति संबंधी कोटा निश्चित करने के लिए मजबूर किया। इस सरकारी जांच के मुखिया लार्ड डेविस का मानना है कि देशभर की कंपनियों में उच्च पदों पर प्रतिभाशाली और योग्य महिलाओं को मौका मिले, यह सुनिश्चित करने के लिए मूलभूत बदलाव लाने की जरूरत थी। दरअसल, आइएमएफ का महिला स्टाफ अब महिला प्रमुख पद की जो मांग कर रहा है, उसे दुनिया में महिला निदेशकों की ताजा संख्या से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उनका सरोकार भी कमोबेस ऐसा कदम उठाकर एक संदेश देना है कि महिलाएं भी इस पद के योग्य हैं, हकदार हैं और उन्हें यह पद मिलना चाहिए। बेशक आइएमएफ के प्रमुख पद के लिए फ्रांस की वित्तमंत्री क्रिस्टीन लेगार्ड उम्मीदवार हैं और आइएमएफ के बोर्ड में शमिल तमाम यूरोपीय सदस्य मुल्कों की हिमायत उन्हें हासिल है, लेकिन उनकी इस मजबूत दावेदारी के साथ यह विवाद भी जुड़ गया है कि गैर-यूरोपीय प्रमुख की दावेदारी की काट के लिए यूरोपीय देशों ने अपना कब्जा बनाए रखने की खातिर कहीं महिला प्रमुख पद वाले ई-मेलों के पीछे प्रयोजक की भूमिका तो नहीं निभाई? (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Wednesday, May 25, 2011
देश के धनी भी नहीं चाहते घर की लक्ष्मी
एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि संतान के रूप में एक कन्या होने के बाद यदि गर्भ में दूसरी भी लड़की आ जाती है तो ऐसे भ्रूण की हत्या करवाने की प्रवृत्ति भारत में धनी एवं शिक्षित तबकों में तेजी से बढ़ रही है। प्रतिष्ठित लैंसेट पत्रिका के आगामी अंक में छपने वाले इस अध्ययन के निष्कर्षो के अनुसार 1980 से 2010 के बीच इस तरह के गर्भपातों की संख्या 42 लाख से एक करोड़ 21 लाख के बीच रही है। अध्ययन में दावा किया गया है कि पिछले कुछ दशकों में पुत्र की चाहत में चुनिंदा गर्भपात का चलन बढ़ा है। साथ ही लड़के-लड़कियों के अनुपात में कमी की प्रवृत्ति जो अभी तक उत्तरी राज्यों में ही ज्यादा पाई जाती थी अब उसका प्रकोप पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में भी फैलने लगा है। टोरंटो विश्वविद्यालय के प्रभात झा इस अध्ययन पत्र के मुख्य लेखक हैं। उन्होंने बताया, भारत की अधिकतर आबादी ऐसे राज्यों में रहती है जहां इस तरह के मामले आम हैं। अध्ययन में जनगणना आंकड़ों और राष्ट्रीय सर्वेक्षण के जन्म आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इस विश्लेषण का मकसद ऐसे परिवारों में दूसरे बच्चे के जन्म में बालक-बालिका के अनुपात का अंदाजा लगाया जा सका जहां पहली संतान के रूप में बच्ची पैदा हो चुकी थी। अध्ययन में पाया गया कि 1990 में प्रति 1000 लड़कों पर 906 लड़कियां थीं जो 2005 में घटकर 836 रह गई। झा ने कहा कि अनुपात में यह गिरावट उन परिवारों में अधिक देखी गई जहां जन्म देने वाली मां ने दसवीं या उससे उच्च कक्षा की शिक्षा हासिल कर रखी थी और जो संपन्न गृहस्थी की थी। लेकिन ऐसे ही परिवारों में यदि पहला बच्चा लड़का है तो दूसरी संतान के मामले में लड़का-लड़की अनुपात में कोई कमी नहीं आई। उन्होंने कहा कि इससे यह सुझाव मिलता है कि कन्या भ्रूण का चुनिंदा गर्भपात शिक्षित एवं संपन्न परिवारों में ज्यादा मिलता है। ऐसी प्रवृत्ति आम तौर पर पहली संतान के लड़की होने के मामलों में देखी जाती है। 1980 के दशक में कन्या भ्रूण का चुनिंदा गर्भपात 0.20 लाख था, जो 1990 के दशक में बढ़कर 12 लाख से 40 लाख तथा 2000 के दशक में 31 लाख से 60 लाख तक हो गया।
आओ, इसका जश्न मनाएं
वैश्विक राजनीति में महिलाओं की स्थिति जो भी रही हो, लेकिन कम से कम द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भारतीय उपमहाद्वीप के राजनीतिक परिदृश्य में महिलाएं हमेशा महत्वपूर्ण दिखती रही हैं। चाहे दुनिया में सबसे ज्यादा महिला प्रधानमंत्रियों की बात हो या राष्ट्रपतियों की। दक्षिण एशिया ने इसकी जबरदस्त मिसाल पेश की है। पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे कट्टरपंथी इस्लामिक देशों में भी महिला प्रधानमंत्री इस क्षेत्र की ही देन हैं। इंदिरा गांधी जैसी दुनिया की ताकतवर महिला राजनीतिज्ञ भी दक्षिण एशिया के खाते में ही आती हैं। इसलिए एक साथ भारत के चार महत्वपूर्ण राज्यों में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर महिलाओं का विराजना आश्चर्य की बात नहीं है, लेकिन यह राजनीति की शानदार उर्वर दिशा का संकेत भी है। हाल के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में दो राज्यों में महिलाओं ने अपने दम पर जीत का परचम लहराया और पारंपरिक राजनीति के मायने बदल दिए। तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने 34 साल पुराने लाल दुर्ग को ढहा दिया तो दूसरी तरफ लगभग अजेय-सा दिखने वाला करुणानिधि परिवार जयललिता के जादू के सामने टिक नहीं पाया, जबकि तमाम राजनीतिक पंडित कम से कम तमिलनाडु के चुनावों को लेकर भविष्यवाणी करते हुए बेहद असमंजस स्थिति में थे। जयललिता की ही तरह ममता बनर्जी ने भी पश्चिम बंगाल में वामपंथियों को चारो खाने चित्त कर दिया। 294 विधानसभा सीटों वाले पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और उसके सहायक दलों को 227 सीटें मिलीं, जबकि लेफ्ट फ्रंट को, जिसे 2006 में 235 सीटें मिली थी, महज 62 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। इस तरह उसे 173 सीटों का नुकसान हुआ। पिछली बार की ही तरह अन्य दल इस बार भी सिर्फ पांच सीटें ही हासिल कर सके। बहरहाल, यहां सीटों की संख्या और राजनीतिक ताकत का आकलन करना मकसद नहीं है, बल्कि यह झांकने की कोशिश करना है कि भारतीय राजनीति में अब महिलाएं अपनी स्वतंत्र ताकत से ऐतिहासिक फेरबदल करने का माद्दा दिखाने लगी हैं। हालांकि पहले यह काम इंदिरा गांधी कर चुकी हैं, लेकिन इंदिरा गांधी की मजबूत परंपरा को दशकों तक देश की दूसरी महिला राजनीतिज्ञ कायम नहीं रख सकीं। आमतौर पर भारतीय राजनीति में महिलाओं की हैसियत दूसरे नंबर की रही। वह बॉलीवुड फिल्मों की तरह पूरी फिल्म का खूबसूरत, मगर एक तरह से फिल्म में फर्क न पड़ने वाले हिस्से की माफिक रहीं। भारतीय राजनीति में महिलाएं पीढ़ी और परंपरा कायम नहीं कर सकीं। वह या तो पति या बेटों, भाइयों आदि की विरासतों को ढोने वाली रहीं या अपनी खूबसूरती और राजनीतिक वरदहस्त के तहत आगे बढ़ीं। इससे भारत में महिला राजनीतिज्ञों की संख्या तो जरूर हमेशा ऐसी रही, जिसे अगर शानदार नहीं तो खराब भी नहीं कहा जा सकता था, लेकिन वास्तविक ताकत के नजरिए से ये महिलाएं महज मोहरा भर रहीं। यही कारण है कि पंचायती राज व्यवस्था में 33 फीसदी महिलाओं की अनिवार्य मौजूदगी भी देश में महिला राजनीतिज्ञों के प्रभाव का माहौल नहीं बना सकी। मगर यह पहला ऐसा मौका है, जब उत्तर प्रदेश में मायावती, तमिलनाडु में जयललिता, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और दिल्ली में शीला दीक्षित की सरकार किसी पुरुष राजनीतिज्ञ के रहमोकरम की मोहताज नहीं है, बल्कि इन महिला राजनीतिज्ञों ने अपनी ताकत खुद बनाई है। यही वजह है कि यह क्षण महत्वपूर्ण है, जब देश के तीन बड़े आबादी वाले और चौथे सबसे बड़े प्रभाव वाले राज्य यानी दिल्ली में महिलाओं के नेतृत्व को किसी की विरासत या किसी की छाया नहीं करार दिया जा सकता, बल्कि इनकी अपनी ताकत और प्रभाव के रूप में देखा जा सकता है। बहरहाल, चार राज्यों में महिलाओं का नेतृत्व इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये चारों राज्य देश की राजनीति में अहम भूमिका अदा करते हैं। साथ ही इन चारों राज्यों से केंद्र सरकार की वास्तविक गति निर्धारित होती है। भारतीय राजनीति में पहली बार एक साथ चार राज्यों की कमान महिलाओं के हाथ में होना एक नए राजनीतिक माहौल और बदलाव की तरफ इशारा करता है। भारतीय राजनीति में महिलाओं की ताकतवर होती स्थिति न सिर्फ देश में मजबूत होते लोकतंत्र का प्रतीक है, बल्कि देश में महिलाओं की मजबूत होती स्थिति का भी प्रतीक है। इसलिए चार राज्यों में महिलाओं का नेतृत्व भारत के लिए एक नए युग की दस्तक है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
आधी दुनिया का सियासी दबदबा
आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास में महिलाओं के नाम एक और उपलब्धि दर्ज हो गई है। पहली मर्तबा देश के 29 सूबों में से चार सूबों की मुख्यमंत्री महिला हैं। हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद दो राज्यों पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में ममता बनर्जी और जयललिता ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती हैं। ऐसा पहली बार है कि एक समय में दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क के चार राज्यों की कमान महिलाओं के हाथ में है और वे देश की कुल आबादी की एक तिहाई आबादी पर राज कर रही हैं। अपने मुल्क की महिला मुख्यमंत्रियों की फेहिरस्त बहुत ही छोटी है। इतनी छोटी की एक बार में ही याद हो जाए। इस फेहिरस्त में सबसे पहला नाम सुचेता कृपलानी का है। वह उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं और देश में पहली मर्तबा एक महिला को राजनीति की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया था। पंजाब में रजिंदर कौर भट्टल तीन साल तक मुख्यमंत्री रहीं तो उड़ीसा में नंदिनी सतपथी ने 10 साल तक मुख्यमंत्री के नाते सत्ता संभाली। असम में अनवरा तमिरा मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। तमिलनाडु में एमजी रामचंद्रन की पत्नी सी जानकी छह महीने के लिए मुख्यमंत्री के पद पर रहीं तो बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू यादव ने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया। मध्य प्रदेश में उमा भारती करीब दो-ढाई साल तक बतौर मुख्यमंत्री रहीं। सुषमा स्वराज दिल्ली की तो वसुंधरा राजे राजस्थान की मुख्यमंत्री थीं। सुचेता कृपलानी, नंदिनी सतपथी, रजिंदर कौर भट्टल, अनवरा, शीला दीक्षित का ताल्लुक कांगे्रस से है तो राबड़ी देवी राजद, सी जानकी, जयललिता अन्नाद्रमुक, ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस, मायावती बसपा और सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे, उमा भारती भारतीय जनता पार्टी से हैं। केरल जैसा प्रगतिशील राज्य इस संदर्भ में हर विधानसभा चुनावों में हमारे सामने इस विचारणीय मुददे को रखता है कि यहां अभी तक कोई महिला मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन पाई? केरल एक ऐसा मॉडल राज्य है, जहां महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा और साक्षरता दर भी उल्लेखनीय है। यही नहीं, बारी-बारी से राज्य की सियासत संभालने वाली दो मुख्य राजनीतिक पार्टियों लेफ्ट और कांग्रेस की विचारधारा भी यहां चुनावी राजनीति व जिताऊ फैक्टर के सामने नतमस्तक दिखी। देश के वामपंथियों के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि पश्चिम बंगाल में 34 साल तक उनकी सत्ता थी और एक बार भी किसी महिला को मुख्यमंत्री नहीं बनाया। क्या यह ऐतिहासिक चूक नहीं है। इसी तरह केरल व त्रिपुरा में भी उन्होंने किसी महिला को मुख्यमंत्री पद के काबिल नहीं समझा। वामपंथी स्त्री-पुरुष की बराबरी का दावा करते हैं, लेकिन सत्ता के शीर्ष पदों पर महिलाओं के चुनाव को लेकर उन्होंने हमारे सामने कोई राजनीतिक आदर्श नहीं रखा है। ऐसा भी नहीं है कि उनके पास अनुभवी महिला कॉडर की कमी हो। वामपंथी संसद व विधानसभा में एक तिहाई महिला आरक्षण की वकालत करने में भले ही सबसे ज्यादा मुखर शैली अपनाते हों, पर सच यह है कि यहां भी राजनीति में पुरुषत्व ही हावी दिखता है। देश के उत्तर-पूर्व राज्यों के कबीलाई समाज में पुरुषों की तुलना में महिलाओं के पास ज्यादा अधिकार हैं, लेकिन राजनीति पर उनकी पकड़ प्रभावित नहीं करती। राजनीति में आदिवासी पुरुष नेता तो हैं, लेकिन किसी आदिवासी महिला राजनेता का नाम याद नहीं आता। राजनीति, सत्ता जेंडर न्यूट्रल वर्ड हैं, लेकिन जब राजनीति, सत्ता एक खास जेंडर की ओर झुकी हो, यहां तक कि उसी विशेष जेंडर का वहां दबदबा हो तो उसे तोड़ने या यों कहें कि करेक्शन के लिए महिला राजनीतिज्ञों को क्या कोई पहल नहीं करनी चाहिए। किसी भी महिला राजनेता ने संगठित महिला शक्ति का विकास नहीं किया। देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी इसका अपवाद नहीं कही जा सकतीं। इंदिरा गांधी के बाद की महिला राजनेताओं मसलन जयललिता, सुषमा स्वराज, मायावती, ममता बनर्जी, उमा भारती, राबड़ी देवी और सोनिया गांधी ने भी इंदिरा गांधी की परपंरा को तोड़ने की कोई ठोस पहल नहीं की। जयललिता, ममता बनर्जी, मायावती के चुनावी घोषणापत्रों में महिलाओं को राजनीतिक तौर पर सशक्त करने की कोई नीति का जिक्र नहीं मिलता। इस समय अपने देश की राष्ट्रपति प्रतिभा सिंह पाटिल हैं। लोकसभा में स्पीकर मीरा कुमार हैं तो कांग्रेस व संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज हैं। देश के तीन राज्यों गुजरात, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की राज्यपाल महिला हैं। चार राज्यों में महिला मुख्यमंत्री हैं। इसे महिलाराज के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि क्या यह देश इस ऐतिहासिक संयोग या कहें परिस्थितियों का लाभ उठा पाएगा? अब तक देश में महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की बाबत आलंकारिक व्याख्याएं ही ज्यादा हुई हैं। क्या अब महिलाओं को राजनीतिक तौर पर सशक्त करने के लिए कुछ ठोस होता नजर आएगा? यह हमारे परिपक्व होते लोकतंत्र के लिए एक अहम सवाल है। देश में महिला मुख्यमंत्रियों की संख्या तो दो से बढ़कर अब चार हो गई है, लेकिन जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए, वहां जीतकर विधानसभा पहंुचने वाली महिला विधायकों की संख्या 2006 विधानसभा की तुलना में घटी है। वर्ष 2006 के चुनावों में इन राज्यों यानी पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पांडिचेरी में 80 महिला विधायक चुनकर आई थीं, मगर इस बार यह संख्या 72 तक सिमट कर रह गई है। पंचायत और नगर निगम में तो महिलाओं के लिए पचास प्रतिशत आरक्षण की घोषणा अब पुरानी हो चुकी है, असली टेस्ट संसद और विधानसभा में होता है, जहां नतीजे जोर-जोर से बोलते हैं। फिलहाल तो यही लगता है कि मंजिल बहुत दूर है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Thursday, May 19, 2011
किसकी जरूरत हैं चीयरलीडर्स
विश्वकप फुटबॉल मैचों से अधिक चर्चित हुई चीयरलीडर्स के साथ घटी वह घटना जो आइपीएल क्रिकेट के जरिए लोगों तक पहुंची है। कुछ समय पहले एक सांवली रंग की एक लड़की ने बताया कि किस तरह उसके साथ भेदभाव किया गया और उसे टीम से हटा दिया गया। अब ताजा विवाद चीयरलीडर्स की टीम में शामिल एक दक्षिण अफ्रीकी युवती के ब्लॉग के बहाने शुरू हुआ है। इस युवती ने अपने ब्लॉग में अपने आपबीती का बयान किया है। उसने लिखा है कि वह वही लिख रही है, जो उसने महसूस किया है। आइपीएल चीयरलीडर गैब्रिएला पास्कलोट्टो को खेल के दौरान इस घटना के तत्काल बाद दक्षिण अफ्रीका वापस भेज दिया गया। उसने खिलाडि़यों के अभद्र बर्ताव के बारे में विस्तार से बताया है कि चीयरलीडर्स को लोग पीस ऑफ मीट यानी मांस के लोथड़े की तरह देखते हैं और चलते-फिरते पोर्न की तरह इस्तेमाल करते हैं। मालूम हो कि आइपीएल यानी इंडियन प्रीमियर लीग के बहाने पिछले चार साल से कुछ अलग ढंग से क्रिकेट के नए फॉर्मेट वाले खेल का सिलसिला शुरू हुआ है। इसमें देश-विदेश के खिलाड़ी खेलते हैं और अलग-अलग खिलाडि़यों की महंगी बोली लगती है। इसी के साथ हम लोग क्रिकेट के मैदान पर चीयरलीडर्स से रू-ब-रू हुए हैं। खेल शुरू होने के पहले अलग ढंग से परिधान में सजी इन युवतियों की प्रस्तुतियां एक तरह से क्रिकेट के खेल की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए होता है। निश्चित ही यह कोई पहली घटना नहीं होगी और न ही मामला सिर्फ गैब्रिएला तक सीमित होगा। देखने और सुनने में जो आया है उसके मुताबिक खिलाड़ी, दर्शक तथा खेल से जुड़े अधिकारी और कर्मचारी भी चीयरलीडर्स के साथ छूट लेने में कतराते नहीं हैं, क्योंकि उनकी नियुक्ति ही उत्साहवर्धन और मनोरंजन के लिए होता है। इस चीयरलीडर के खुलासे ने परदे के पीछे ऑफ द पिच पार्टी की संस्कृति से पर्दा उठा दिया है। वीआइपी के रूप में एकत्र लोग कैसा आनंद उठाते हंै इसकी झलक इस आत्मकथा टाइप बयान में देखी जा सकती है। वह कहती है कि ये नशा करते हंै और उससे उन्हें आसानी से हासिल करने की इच्छा रखते हैं। इस बारे में आयोजकों का कहना है कि उन्हें उनके काम और भूमिका के बारे में स्पष्ट रूप से पहले ही बताया गया होता है और ताली एक हाथ से नहीं बजती। चीयरलीडर्स खुद भी मर्यादा तोड़ती हैं। संभव है कि इस बात में भी सच्चाई हो फिर भी मुद्दा अपनी जगह पर कायम है, जो वहां उपस्थित पुरुषों के नजरिये और कंुठित मानसिकता को कठघरे में खड़ा करता है। मूल प्रश्न यह है कि खेलों को लोकप्रिय बनाने के लिए चीयरलीडर्स की जरूरत ही क्यों पड़ी? जिसकी खेल में रुचि है वह खेल देखेगा इससे काम क्यों नहीं चला? इस पूरे घटनाक्रम पर सेलेब्रिटी लोग चुप हैं फिर चाहे वह शिल्पा शेट्टी हों, प्रीति जिंटा हों या नेस वाडिया। इस खेल महकमे से कुछ लोग मीडिया को बताते हंै कि वे लड़कियां भी वयस्क होती हंै और कांट्रैक्ट पर हस्ताक्षर करते समय उनको यहां के वातावरण के बारे में अच्छी तरह से सब कुछ पता होता है। भारत के कुछ खास शहरों में खासतौर पर उत्तर भारत में लड़कियों के साथ ऐसा अपमानजनक व्यवहार आम बात है। पिछले साल आइपीएल पार्टी में कुछ आम दर्शक भी घुस गए थे तथा जिसे लेकर काफी बवाल मचा। यह भी कहा जाता है कि जो विदेशी चीयरलीडर्स होती हैं उनसे लोग ज्यादा छूट लेते हैं, क्योंकि उनका पहनावा अलग होता है और भारतीय पुरुषों को वह ज्यादा आकर्षित करती हैं। पिछले साल एक मॉडल ने कहा कि रैंप का तख्त जानबूझकर ऊंचा रखा गया था ताकि दर्शक इन्हें ठीक से देख पाएं। इसे आयोजकों ने बकवास आरोप बताया था। एक चीयरलीडर ने व्यंग्य में इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार को बताया कि आप क्या सोचते हैं कि दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में मैच में लोग सिर्फ सीटी बजाते हैं। कहने का तात्पर्य यह था कि लोग तरह-तरह की अश्लील भंगिमाएं और कमेंट भी करते हैं। याद रहे कि दो साल पहले भारत-ऑस्ट्रेलिया के एकदिवसीय मैच में चीयरलीडर्स की तरह ड्रिंकगर्ल्स का जादू भी दर्शकों पर छा गया। ये लड़कियां इंटरवल के दौरान ड्रिंक्स की ट्रॉली लेकर मैदान में पहुंचती हैं, फिर खिलाड़ी के साथ दर्शक भी निहारते है इन्हें। उड़ीसा में कलिंगसेना के लोगों ने चेताया था कि कटक में होने वाले मैचों में चीयरगर्ल्स और ड्रिंकगर्ल्स तंग कपड़ों में नहीं, बल्कि साड़ी में आएं। पोशाक चाहे साड़ी हो या स्कर्ट, उससे औरत की पोजिशन या उसके सम्मान पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। कपड़ों के पीछे के शरीर के बारे में ही लोग सोचते-विचारते रहते हैं। किसी भी कपड़े में लिपटी इन लड़कियों की उम्र 18 से 20 वर्ष रखी जाती है यानी दर्शकों को कमनीयता भी चाहिए। अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ, जब बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन की तरफ से महिला खिलाडि़यों के लिए एक नया ड्रेस कोड का निर्देश जारी किया गया। इसके तहत अब उन्हें स्कर्ट में ही खेलना अनिवार्य होगा। ऐसा करने के पीछे फेडरेशन की तरफ से यही कारण बताया गया था कि वे बैडमिंटन के खेल को अधिक आकर्षक बनाना चाह रहे हैं। अगर अखबार में इस संबंध में जारी रिपोर्टो को देखें तो वह टेनिस के तर्ज पर इसे अधिक सेक्सी और ग्लेमरस बनाना चाह रहे हैं। इस पर गौर करने की बात थी कि आकर्षक खेल के लिए अच्छा खेल खेलना मायने रखता है या खिलाडि़यों द्वारा पहना जाने वाला पोशाक मायने रखती है। इस सवाल पर फेडरेशन का कहना था कि इसके द्वारा बैडमिंटन के प्रशंसकों और दर्शकों की संख्या बढ़ेगी तथा स्पॉन्सरशिप भी बढ़ेगा यानि शोहरत और आय के लिए खेल ही नहीं खिलाडि़यों के आकर्षण को भी बेचा जाना जरूरी है। वापस यदि हम चीयरलीडर्स की चर्चा पर लौटें तो यहां इन लड़कियों का ही नहीं, बल्कि उपभोक्तावादी संस्कृति का भी जलवा है। इसमें सब कुछ उपभोग के लिए होता है और पितृसत्ता भी उन्हें उपभोग की वस्तु ही मानती है। वह यदि औरतों को बराबरी और गरिमा का दर्जा देने लगे तो अपनी ही कब्र खोदेगी। अक्सर कई लोग इस भ्रम के शिकार होते हैं कि जो लोग औरत के भारतीय परिधान या भारतीय परंपरा व संस्कृति की बात कर रहे हैं वे शायद औरत को सम्मानित जगह दे रहे हैं। दरअसल, दोनों ही प्रकार के सोच वालों के लिए औरत का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। इनकी नजर में वो बराबरी की हकदार नहीं है। एक के लिए वह घर-परिवार में कैद निजी इस्तेमाल की वस्तु है तो दूसरा मुफ्त बाजार में परोसने की हिमायत करता है। औरत की असली मुक्ति तो वहीं होगी, जिसमें वह न देवी समान हो न दासी समान और न ही बिकाऊ माल के बराबर, बल्कि वह स्वतंत्र हैसियत वाली बराबर की इंसान हो, जिसमें स्त्रीसमुदाय का होने का कारण वह किसी प्रकार के सामाजिक गैर-बराबरी की शिकार न हो। ऐसा समाज निर्मित किया जाना बाकी है और जो इसी समाज में मौजूद सही विचार और सोच वाले स्त्री-पुरुष मिलकर बनाएंगे। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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