आमतौर पर यह माना जाता है कि शिक्षित समाज सामाजिक विषयों को लेकर कहीं अधिक संवेदनशील होता है, क्योंकि उसमें चेतना का विकास अपेक्षतया अधिक होता है। मगर यह धारणा कन्याभ्रूण हत्या के संदर्भ में सार्थक सिद्ध नहीं होती। हाल ही में एक अध्ययन से यह तथ्य सामने आया कि पिछले तीन दशकों में लगभग एक करोड़ इक्कीस लाख लड़कियों को गर्भ में ही मार दिया गया। बालक-बालिकाओं के बिगड़ते अनुपात के संबंध में चिंता जाहिर करते हुए देश के प्रधानमंत्री ने इसे राष्ट्रीय शर्म करार देते हुए कहा कि महिलाओं की कामयाबी के बावजूद भारतीय समाज लड़कियों के प्रति पूर्वाग्रह का शिकार है। आम भारतीयों की सोच है कि असंतुलित लिंगानुपात पिछड़े, अशिक्षित और निचले तबकों के कारण है जो बिल्कुल गलत है। सच तो यह है कि पिछले दशक में उनके बीच कन्या शिशुओं की तादाद में खासी बढ़ोत्तरी हुई है। अनेक अध्ययनों से यह तथ्य सामने आ चुका है कि कन्याभ्रूण हत्या की समस्या देश के अपेक्षतया संपन्न इलाकों और सुशिक्षित तबकों में गंभीर रूप धारण कर लिया है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि बीस प्रतिशत संपन्न परिवारों में कन्या भ्रूणहत्या की दर में लगातार इजाफा हुआ है और प्रति एक हजार लड़कों पर लड़कियों की संख्या साढ़े सात सौ तक गिर गई है। शिक्षा और आर्थिक सुदृढ़ता व्यक्ति की मानसिकता को परिवर्तित कर देती है परंतु बेटियों के प्रति दृष्टिकोण को लेकर ऐसा नहंी हुआ, बल्कि संपन्नता और आधुनिक शिक्षा उनके लिए और घातक बन गई है। आधुनिक तकनीक सोनोग्राफी का उपयोग बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य और जीवन रक्षा के लिए होना चाहिए था, लेकिन संकीर्ण विचारधारा से ग्रस्त माता-पिता ने बेटियों को गर्भ में ही समाप्त करने वाले शस्त्र के रूप में उपयोग किया। महिलाएं चाहे कितनी भी शिक्षित हो जाएं, लेकिन अधिकांशतया बेटा ही चाहती हैं, क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज में स्वयं की स्थिति को ऊंचा बनाए रखने का एकमात्र उपाय बेटे की मां होना है। इस सत्य को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि भारतीय परिवारों में, अधिकांश महिलाएं अपने निर्णयों को लेकर आज भी स्वतंत्र नही हैं। उनके हर निर्णय पर परिवार की सहमति अनिवार्य है। बेटे का जन्म प्रतिष्ठा और बेटी का जन्म परिवार के लिए बोझ माना जाता है। भारत में लिंगानुपात आर्थिक तौर पर अपेक्षाकृत अधिक पिछड़े देशों पाकिस्तान व नाइजीरिया से कम है। यूनीसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में रोजाना 7000 लड़कियों की गर्भ में हत्या कर दी जाती है। पिछले कुछ वर्षो में कानून-निर्माताओं ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी, परंतु डॉक्टर और अभिभावक उससे बचने के सहज रास्ते ढूंढ़ लेते हैं। यह उस शोध और अध्ययन परिणामों के आधार पर कहा जा रहा है जिसे देश के महापंजीयक तथा जनगणना आयुक्त, स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय और संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष ने संयुक्त रूप से किया है। अगर यूं ही बेटियों की तादाद में गिरावट आती गई तो यह निश्चित है कि इसका व्यवस्थित सामाजिक ढांचे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। समाज को यह नहीं भूलना चाहिए कि वंश योग्य संतान से चलता है न कि सिर्फ बेटे के जन्म से। मनुष्य की निर्मात्री नारी है तो हमारा समाज बेटियों के प्रति निर्ममता क्यों दिखाता है? जो समाज इतनी निर्ममता से बच्चियों को जन्म से पहले ही मार रहा है उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि अंततोगत्वा उसे इसका परिणाम झेलना होगा, क्योंकि बेटियों की घटती संख्या से उनके भविष्य पर सामाजिक दबाव निश्चित तौर पर बढे़गा। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जो परिवार अब भी संकीर्ण मानसिकता को छोड़ने के लिए तैयार नही हैं उनके लिए कानून के बंधनों को इतना कठोर बनाने की जरूरत है कि स्वप्न में भी बालिका भू्रणहत्या की कल्पना न कर सकें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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Wednesday, June 15, 2011
Monday, May 16, 2011
Saturday, April 23, 2011
पूजिए न सही, रौंदिए तो नहीं !
एक ही रास्ता बचता है कि अपनी सुरक्षा स्वयं करो के सिद्घांत को अपनाते हुए नारी उठ खड़ी हो। वह अपने मन से दीनता व हीनता के भाव को निकाल फेंके। नारी को अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी.. की छवि से छुटकारा पाना होगा। वह अपनी शक्ति को पहचाने। उसे यह भी सिद्घ करना होगा कि वह बेटी, बहन और ममतामयी मां के अलावा जरूरत पड़ने पर दुर्गा का रूप भी धारण करना जानती है..अप्रैल की शाम जब सारा देश सामाजिक समरसता व न्याय की बात कहने वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर की अगले दिन मनाई जानेवाली जयंती की तैयारियों में जुटा था, उसी समय उत्तर प्रदेश के जनपद फरूखाबाद के गांव बखतेरापुर में चार दरिंदों ने खेत पर काम कर रही एक नाबालिग छात्रा तान्या को अगवा कर लिया। दरिंदों ने उसकी अस्मत लूटने के बाद गला दबाकर हत्या कर दी। इस कांड की गूंज दिल्ली तक पहुंच चुकी है। हालांकि दुष्कर्म की यह कोई पहली घटना नहीं है। शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो, जिस दिन दिल दहला देने वाली ऐसी घटनाओं से अखबारों के पन्ने रंगे न होते हों। कभी-कभी ऐसी खबरें भी प्रकाश में आती हैं, जिनमें किसी मासूम बालिका की अस्मत लूटने वाला उसका कोई सगा संबंधी ही होता है। ये घटनाएं मन को झकझोर देती हैं। तब ऐसा लगता है कि आधी आबादी न घर के भीतर सुरक्षित है और न बाहर। सभ्य कहे जानेवाले हमारे देश में तेजी से बढ़ रही ये घटनाएं गंभीर चिंता का विषय हैं। इन घटनाओं से यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता और विभिन्न अवसरों पर की जानेवाली नारी सशक्तीकरण व महिलाओं को पुरुषों के समान दर्जा दिए जाने की बातें बेमानी लगने लगती हैं।
कैसी विडंबना है कि एक ओर नारी को पूजने की बात कही जाती है, वहीं दूसरी ओर असामाजिक तत्व उसे रौंदने से बाज नहीं आते हैं। जरा सोचिए कि इस त्रासदी का शिकार महिला के दिल पर क्या गुजरती होगी। उसकी खोई इज्जत कभी वापस नहीं मिल सकेगी, यह सोचकर उसके मन में यही विचार आता होगा कि क्यों न सारी व्यवस्था को आग लगा दूं। उसे कभी-कभी समाज के ताने भी सुनने पड़ते हैं। उसके मन की पीड़ा वही समझ सकती है। दुष्कर्म की घटनाओं पर कैसे रोक लगे, यह एक विचारणीय बिंदु है। कहने को तो देश में मौजूद कानून में दुराचारियों के खिलाफ सख्त से सख्त सजा दिए जाने का प्रावधान है, लेकिन कानून के रखवालों की नीयत ठीक हो तब न। जब कोई पीड़ित महिला न्याय पाने की उम्मीद से पुलिस स्टेशन की सीढ़ियां चढ़ती है तो वहां बैठे कानून के रखवाले उससे घिनौने सवाल पूछते हैं, जिन्हें सुनकर शर्म भी शायद शर्मसार हो जाए। बांदा के शीलू कांड में पुलिस की भूमिका को लोग कैसे भूल सकते हैं कि किस तरह इस कांड में आरोपी सत्तारूढ़ पार्टी के एक माननीय विधायक को बचाने के लिए पीड़ित-प्रताड़ित शीलू को ही उल्टे चोरी के इल्जाम में जेल भेज दिया था। वह तो भला हो मीडिया का, जिसकी सक्रियता के चलते शीलू को न्याय मिल सका।
तान्या कांड में भी पुलिस का यही चेहरा सामने आया। सत्तारूढ़ दल के लोगों की जी-हुजूरी में लगी रहने वाली पुलिस ने देशभर में न जाने कितनी शीलू और तान्या को न्याय मिलने से वंचित कर दिया होगा। रसूखदार लोगों के ऐसे किसी कांड में शमिल होने पर समाज भी खामोशी की चादर ओढ़ लेता है। पुलिस और समाज के इस रवैए के कारण असामाजिक तत्वों के हौसले बढ़ते जा रहे हैं। नतीजतन, आधी आबादी के साथ छेड़छाड़ और दुष्कर्म की शर्मनाक घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। रही बात राजनेताओं की तो वे भुक्तभोगी महिलाओं के घर जाकर गहरी सहानुभूति प्रकट करते हैं। वे कानून व्यवस्था को दोषी ठहराते हैं और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की मांग करते हैं। ऐसी घटनाओं को शर्मनाक, अमानवीय और जघन्य अपराध बताते हुए चिंता जाहिर करते हैं। यदि उन्हें लगता है कि अमुक कांड से उन्हें सियासी फायदा मिल सकता है तो वे पीड़ित महिला व उसके परिवार की आथिर्क मदद भी कर देते हैं। यही सब मंजर तान्या कांड में भी देखने को मिल रहा है। केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद भी यहां आ चुके हैं, क्योंकि यह कांड उनके गृह क्षेत्र का है। उन्होंने कहा था कि ऐसे कांडों को अंजाम देने वाले दरिंदे हमारे समाज में ही रहते हैं, यहीं पल कर वह हम पर ही प्रहार करते हैं। इनको संरक्षण देनेवालों को उन्होंने जानवर की संज्ञा दी थी। लेकिन आधी आबादी की सुरक्षा कैसे होगी, इस सवाल का जवाब नहीं मिल रहा है।
कानून के रखवालों ने तो निराश ही कर रखा है। रही बात जन प्रतिनिधियों की तो उनसे भी ज्यादा उम्मीद नहीं है, क्योंकि कुछ माननीयों के दामन पर भी ऐसे कुकृत्य में लिप्त होने या फिर ऐसे दरिंदों को संरक्षण देने के दाग लगे हैं। ऐसी स्थिति में एक ही रास्ता बचता है कि अपनी सुरक्षा स्वयं करो के सिद्घांत को अपनाते हुए नारी उठ खड़ी हो। वह अपने मन से दीनता व हीनता के भाव को निकाल फेंके। नारी को अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी.. की छवि से छुटकारा पाना होगा। वह अपनी शक्ति को पहचाने। उसे यह भी सिद्घ करना होगा कि वह बेटी, बहन और ममतामयी मां के अलावा जरूरत पड़ने पर दुर्गा का रूप भी धारण करना जानती है। वह इतिहास में दर्ज बहादुर नारियों के जीवन से सबक ले, वह गुलाबी गैंग की कमांडर संपत पाल से भी सीख ले। उसे अपना मनोबल इतना ऊंचा करना होगा कि पत्थरों से भी टकराने में पीछे नहीं हटे। पश्चिमी सभ्यता को ओढ़ने और बिछाने की प्रवृत्ति को छोड़ना होगा। जिस दिन भारतीय नारी यह सब करने में सक्षम हो जाएगी, उसी दिन से छेड़छाड़ और दुष्कर्म की घटनाओं में कमी आएगी.
कैसी विडंबना है कि एक ओर नारी को पूजने की बात कही जाती है, वहीं दूसरी ओर असामाजिक तत्व उसे रौंदने से बाज नहीं आते हैं। जरा सोचिए कि इस त्रासदी का शिकार महिला के दिल पर क्या गुजरती होगी। उसकी खोई इज्जत कभी वापस नहीं मिल सकेगी, यह सोचकर उसके मन में यही विचार आता होगा कि क्यों न सारी व्यवस्था को आग लगा दूं। उसे कभी-कभी समाज के ताने भी सुनने पड़ते हैं। उसके मन की पीड़ा वही समझ सकती है। दुष्कर्म की घटनाओं पर कैसे रोक लगे, यह एक विचारणीय बिंदु है। कहने को तो देश में मौजूद कानून में दुराचारियों के खिलाफ सख्त से सख्त सजा दिए जाने का प्रावधान है, लेकिन कानून के रखवालों की नीयत ठीक हो तब न। जब कोई पीड़ित महिला न्याय पाने की उम्मीद से पुलिस स्टेशन की सीढ़ियां चढ़ती है तो वहां बैठे कानून के रखवाले उससे घिनौने सवाल पूछते हैं, जिन्हें सुनकर शर्म भी शायद शर्मसार हो जाए। बांदा के शीलू कांड में पुलिस की भूमिका को लोग कैसे भूल सकते हैं कि किस तरह इस कांड में आरोपी सत्तारूढ़ पार्टी के एक माननीय विधायक को बचाने के लिए पीड़ित-प्रताड़ित शीलू को ही उल्टे चोरी के इल्जाम में जेल भेज दिया था। वह तो भला हो मीडिया का, जिसकी सक्रियता के चलते शीलू को न्याय मिल सका।
तान्या कांड में भी पुलिस का यही चेहरा सामने आया। सत्तारूढ़ दल के लोगों की जी-हुजूरी में लगी रहने वाली पुलिस ने देशभर में न जाने कितनी शीलू और तान्या को न्याय मिलने से वंचित कर दिया होगा। रसूखदार लोगों के ऐसे किसी कांड में शमिल होने पर समाज भी खामोशी की चादर ओढ़ लेता है। पुलिस और समाज के इस रवैए के कारण असामाजिक तत्वों के हौसले बढ़ते जा रहे हैं। नतीजतन, आधी आबादी के साथ छेड़छाड़ और दुष्कर्म की शर्मनाक घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। रही बात राजनेताओं की तो वे भुक्तभोगी महिलाओं के घर जाकर गहरी सहानुभूति प्रकट करते हैं। वे कानून व्यवस्था को दोषी ठहराते हैं और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की मांग करते हैं। ऐसी घटनाओं को शर्मनाक, अमानवीय और जघन्य अपराध बताते हुए चिंता जाहिर करते हैं। यदि उन्हें लगता है कि अमुक कांड से उन्हें सियासी फायदा मिल सकता है तो वे पीड़ित महिला व उसके परिवार की आथिर्क मदद भी कर देते हैं। यही सब मंजर तान्या कांड में भी देखने को मिल रहा है। केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद भी यहां आ चुके हैं, क्योंकि यह कांड उनके गृह क्षेत्र का है। उन्होंने कहा था कि ऐसे कांडों को अंजाम देने वाले दरिंदे हमारे समाज में ही रहते हैं, यहीं पल कर वह हम पर ही प्रहार करते हैं। इनको संरक्षण देनेवालों को उन्होंने जानवर की संज्ञा दी थी। लेकिन आधी आबादी की सुरक्षा कैसे होगी, इस सवाल का जवाब नहीं मिल रहा है।
कानून के रखवालों ने तो निराश ही कर रखा है। रही बात जन प्रतिनिधियों की तो उनसे भी ज्यादा उम्मीद नहीं है, क्योंकि कुछ माननीयों के दामन पर भी ऐसे कुकृत्य में लिप्त होने या फिर ऐसे दरिंदों को संरक्षण देने के दाग लगे हैं। ऐसी स्थिति में एक ही रास्ता बचता है कि अपनी सुरक्षा स्वयं करो के सिद्घांत को अपनाते हुए नारी उठ खड़ी हो। वह अपने मन से दीनता व हीनता के भाव को निकाल फेंके। नारी को अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी.. की छवि से छुटकारा पाना होगा। वह अपनी शक्ति को पहचाने। उसे यह भी सिद्घ करना होगा कि वह बेटी, बहन और ममतामयी मां के अलावा जरूरत पड़ने पर दुर्गा का रूप भी धारण करना जानती है। वह इतिहास में दर्ज बहादुर नारियों के जीवन से सबक ले, वह गुलाबी गैंग की कमांडर संपत पाल से भी सीख ले। उसे अपना मनोबल इतना ऊंचा करना होगा कि पत्थरों से भी टकराने में पीछे नहीं हटे। पश्चिमी सभ्यता को ओढ़ने और बिछाने की प्रवृत्ति को छोड़ना होगा। जिस दिन भारतीय नारी यह सब करने में सक्षम हो जाएगी, उसी दिन से छेड़छाड़ और दुष्कर्म की घटनाओं में कमी आएगी.
Friday, April 1, 2011
Tuesday, March 8, 2011
Monday, March 7, 2011
महिला सशक्तिकरण का यक्ष प्रश्न
भारत अपनी स्वतंत्रता के छह दशक बिता चुका है और इन वर्षो में भारत में बहुत कुछ बदला है। विश्व के सबसे मजबूत गणतंत्र में सभी को अपनी इच्छा से जीने, सोचने और अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता मिली है, जिसका हम उपभोग भी कर रहे हैं। हालांकि एक वर्ग ऐसा भी है जो आज भी इस सुखानुभूति से वंचित है और वह हैं स्ति्रयां। स्त्री और पुरुष के बीच भेद आज भी कायम है और यह तथ्य आंकड़ों से उद्घाटित होता है जो विभिन्न सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों द्वारा समय-समय पर किए गए सर्वेक्षणों पर आधारित है। एसोचैम की रिपोर्ट बताती है कि भारतीय महिलाएं घर और दफ्तर दोनों ही जगह भेदभाव का शिकार हैं। काम के बढि़या अवसर तो दूर उन्हें पदोन्नति के समान अवसर तक नहीं मिलते, जिस कारण वह उच्च पदों पर नहीं पहुंच पाती हैं। महज 3.3 प्रतिशत महिलाएं ही शीर्ष पदों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाती हैं। भारत में महिला आर्थिक गतिविधि दर केवल 42.5 प्रतिशत है, जबकि नार्वे में यह 60.3 प्रतिशत और चीन में 72.4 प्रतिशत है। यह आंकड़े बाजार अर्थव्यवस्था से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों के हैं। विश्व के कुल उत्पादन में लगभग 160 खरब डॉलर का योगदान अदृश्य सेवा का होता है, इसमें भारतीय महिलाओं का योगदान काफी बड़ा है। इसके बावजूद समाज के आर्थिक वर्गो की गणना करते हुए घरेलू महिलाओं के श्रम का उचित मूल्यांकन नहीं हो पाता और उनकी तुलना नगण्य माने जाने वाले पेशों के तहत होती है। देश के नीति-निर्धारकों की ओर से आर्थिक वर्गाीकरण करते हुए देश की आधी आबादी को इस दृष्टिकोण से देखा जाना न केवल उनके श्रम की गरिमा के प्रति घोर असंवेदनशीलता का परिचायक है, बल्कि यह भेदभाव और लैंगिक पूर्वाग्रह की पराकाष्ठा है। विगत दो दशक में महिला सशक्तीकरण की अवधारणा ने जोर पकड़ा है। यह वह प्रक्रिया है जो महिलाओं को सत्ता की कार्यशैली समझने की न केवल समझ देता है अपितु सत्ता के स्रोतों पर नियंत्रण कर सकने की क्षमता भी प्रदान करता है। सामाजिक विकास अंतर्निहित रूप से राजनीतिक होता है, इसलिए यदि यह असमानतापूर्ण और गैर सहभागितापूर्ण हो तो इससे समाज का विकास प्रभावित होगा। इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन के अनुसार विभिन्न देशों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व वहां की संसद में भारत की अपेक्षा बहुत अधिक है। यूं तो पंचायत और शहरी निकायों के माध्यम से विकास प्रक्रियाओं एवं निर्णयन की प्रक्रिया में सहभागिता बढ़ाने के लिए पचास प्रतिशत सीटें आरक्षित की गई है। हालांकि अध्ययन बताते हैं कि सत्ता का उपभोग वास्तविक रूप में पदासीन महिलाओं की बजाय उनके परिवार के पुरुष सदस्य करते हैं। यदि कभी ऐसा नहीं होता तो उसके घातक परिणाम भी देखने में आए हैं। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में एक महिला सरपंच को पूर्व सरपंच तथा उसके साथियों ने बस स्टैंड पर नग्न करके मात्र इसलिए पीटा कि, क्योंकि कार्यभार संभालने के एवज में उसने पंचायत फंड से सात हजार रुपये नहीं दिए। देश का संविधान, विभिन्न कानूनी प्रावधान और व्यक्तिगत तथा सामूहिक प्रयास स्त्री को उबारने में लगे हैं, लेकिन महिलाओं की परेशानियां कम नहीं हो रही हैं। देश में शायद ही कोई ऐसी जगह हो जहां महिलाएं स्वयं को सुरक्षित महसूस करती हों। बस, ट्रेन, ऑफिस, स्कूल-कॉलेज अथवा भीड़भाड़ वाले स्थानों से लेकर सुनसान रास्तों में फब्तियां कसने, घूरने, छेड़छाड़ आदि की घटनाएं आम हैं। सन 2009 में बलात्कार के 21 हजार मुकदमे दर्ज हुए। इनमें से 15 से 17 वर्ष वाली लड़कियों का प्रतिशत 12 फीसदी रहा तो उनसे छोटी लड़कियों की तादाद 29 प्रतिशत रही। हाल में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार पिछले वर्ष, हर तीन में से दो महिलाएं यौन हिंसा का शिकार हुई। आंकड़े बताते हैं कि लड़कियां और स्ति्रयां बाहर की तरह अपने घरों में भी असुरक्षित हैं। पति और रिश्तेदारों द्वारा होने वाले अपराधों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। महिलाओं पर हो रही घरेलू हिंसा के आंकड़े जितने लंबे-चौड़े हैं उतने ही डरावने भी। उत्पीड़न, प्रताड़नाओं और अवहेलनाओं के कंटीले तारों से बींधता भारतीय स्त्री का जीवन इस धरा पर आने के लिए भी संघर्ष करता है। जन्म से पूर्व ही लिंग के प्रति भेदभाव आरंभ हो जाता है। भारत में बालिका भू्रणहत्या के संदर्भ में नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने इस चिंता से सहमति जताई है कि इस कुप्रथा के चलते देश में ढाई करोड़ बच्चियां जन्म से पूर्व ही गुम हो गई। यही नहीं, डब्ल्यूईएफ ने बच्चियों के स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा के आंकड़ों के हिसाब से भी पुरुष-महिला समानता की सूची में इन्हें निचले पायदान पर पाया है। विश्व आर्थिक मंच की रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वास्थ्य और जीवित रहने जैसे मसलों में पुरुष और महिलाओं के बीच लगातार अंतर बना हुआ है। भारत में महिला संवेदी सूचकांक लगभग 0.5 है जो कि स्पष्ट करता है कि महिलाएं मानव विकास की उपलब्धियों से दोहरे तौर पर वंचित हैं। विकसित देशों में प्रति लाख प्रसव पर 16-17 की मातृत्व मृत्युदर की तुलना में भारत में 540 की मातृत्व मृत्युदर, स्वास्थ्य रक्षा और पोषक आहार सुविधाओं में ढांचागात कमियों की ओर इशारा करती है। जीवन के मूलभूत अधिकारों से वंचित देश की महिलाएं अनवरत रूप से असमानताओं के दंश झेल रही है। भारतीय महिलाओं में साक्षरता की कमी है सामंती समाज येन-केन प्रकारेण महिलाओं के अधिकारों का हनन परंपराओं के नाम पर करता है। यह विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को ऐसे कटघरे में ला खड़ा करता है जहां उसके पास मानवता के हनन को रोकने का कोई उत्तर नहीं है। जब स्ति्रयां आगे बढ़ती हैं तो परिवार आगे बढ़ता है, गांव आगे बढ़ता है और राष्ट्र अग्रसर होता है। पर क्या हम वाकई इस तथ्य को आत्मसात कर पाए हैं या फिर स्त्री सशक्तीकरण की नियति महिला दिवस पर चर्चाओं और नारेबाजी तक सीमित हो गई है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Tuesday, February 15, 2011
इसरो से आ रही घोटाले की बू
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की कहानी अभी चल ही रही थी कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो का एस बैंड का नया घोटाला सामने आ गया है। अंतरिक्ष विभाग सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अधीन है, इसलिए वह अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते हैं। यदि वह घोटाले में सीधे शामिल नहीं हैं तो भी उनके राज चलाने पर सवाल खडे़ हो गए हैं। प्रतियोगी नीलामी के बिना बहुमूल्य एस बैंड स्पेक्ट्रम निजी कंपनी को देने के एंट्रिक्स समझौते पर उनकी सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। इसरो द्वारा समझौता रद करने से यह प्रकरण समाप्त नहीं होगा, क्योंकि जितने जवाब होंगे उससे ज्यादा सवाल खडे़ होंगे। संगठन का दावा है कि स्पेस कमीशन ने जुलाई 2010 में समझौता रद करने की पहल की, पर वह यह नहीं बता पाया कि इस प्रक्रिया में 6 महीने क्यों लगे। इसके साथ ही 2005 में हुए समझौत के बाद इसरो को यह समझने में पांच साल लगे कि देवास के साथ समझौता देश के हित में नहीं था। सरकार को देर से आई समझ की बात मान ली भी जाए तो भी चीजें ठीक करने के लिए इसकी जांच करवानी चाहिए थी कि विवादास्पद समझौते पर हस्ताक्षर कैसे हुए? पर एक विवादास्पद समझौता समाप्त करने के बाद होने वाली सरकारी प्रतिक्रिया से ऐसा कदापि नहीं लगता कि वह मामले की तह तक पहुंचना चाहती है। हालांकि केंद्रीय एजेंसी की कंपनी एंट्रिक्स द्वारा किया यह गलत समझौता लागू होने पर सरकारी खजाने को लगभग 2 लाख करोड़ का नुकसान होता, इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि समझौते के बारे में कैबिनेट को अंधेरे में रखा गया। यदि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान के पूर्व अध्यक्ष राधा कृष्णन की बात मानी जाए तो ऐसे मामले में कैबिनेट को कम से कम समझौते के बारे मे सूचित किया जाना चाहिए था। आश्चर्य है कि प्रशासन में मौजूद परिपक्व नौकरशाहों और वैज्ञानिकों ने ऐसा क्यों नहीं किया। स्पष्ट है कि समझौते पर हस्ताक्षर न केवल जल्दबाजी में, बल्कि छुपाकर किए गए। इससे एक अन्य मुद्दा उठता है। चूंकि स्पेस कमीशन तथा अन्य स्पेस एजेंसियां भारत के प्रधानमंत्री के प्रत्यक्ष नियंत्रण में आती हैं, इसलिए प्रधानमंत्री कार्यालय की संलिप्तता खारिज नहीं की जा सकती है। यदि कैबिनेट को दायरे से बाहर रखा गया हो तो भी समझौते पर प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा गौर किया जाना चाहिए था। इसलिए प्रधानमंत्री इससे अब तक अनजान कैसे रह सकते हैं। एस बैंड स्पेक्ट्रम प्लेट में रखकर देवास मल्टीमीडिया को पेश करने के साथ ही देवास मल्टीमीडिया की अचानक तरक्की भी महत्वपूर्ण है। 2004 में इसकी स्थापना इसरो संगठन के पूर्व वैज्ञानिक सचिव एमजी चंद्रशेखर द्वारा हुई थी और एक साल के भीतर ही यह ऐसा समझौता करने में सफल हो गई, जिसके लिए स्थापित संगठन कुछ भी खर्च कर सकते थे। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान तथा देवास मल्टीमीडिया ने जोर दिया है कि स्पेक्ट्रम आवंटित न होने के कारण किसी भी तरह का वित्तीय नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन यह तकनीकी मामले उठाकर मामला दबाने का प्रयास किया जा रहा है। तथ्य यह है कि प्राइवेट फर्म को दो संचार उपग्रह छोड़ने के बाद एक बार ट्रांसपांडर प्रयोग करने का मौका मिल जाता तो इसके बाद एस बैंड स्पेक्ट्रम मिल जाता। ऐसा तब और प्रासंगिक हो जाता है, जब दोनों उपग्रहों को देवास की आवश्यकतानुसार बनाया जाना था, जिसका उद्देश्य देश भर में और भारतीय रेलवे जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को उपग्रह आधारित ब्रॉडबैंड सेवाएं उपलब्ध कराना था। यदि भारत के लेखा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी ने समझौते को लाल झंडी न दिखाई होती तो देवास कंपनी परम प्रसन्न होती और जमकर फायदा उठाती। केंद्र सरकार को इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गनाइजेशन, देवास मल्टीमीडिया प्राइवेट लिमिटेड समझौते के बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उसे अपनी बची-खुची छवि बचाने के लिए ऐसा करना चाहिए, जिसे अनेक घोटालों और स्कैंडलों खासकर 2जी स्टेक्ट्रम की भयंकर डकैती से जबर्दस्त नुकसान पहुंचा है। भारतीय अंतरिक्ष विभाग जिस तरह एंट्रिक्स कॉरपोरेशन को एक स्वतंत्र वाणिज्यिक कंपनी बताकर पूरे मामले से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहा है, उससे उसकी नियत पर शक और गहरा रहा। इसका गठन 1992 में अंतरिक्ष विभाग और इसरो ने किया था। इसी कंपनी ने 2007 में अपनी पंद्रहवीं सालगिरह पर न केवल अंतरिक्ष विभाग, बल्कि इसरो, विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर, नेशनल रिमोट सेंसिंग एजेंसी, इसरो सैटेलाइट ट्रैकिंग सेंटर, मास्टर कंट्रोल फैसिलिटी के कर्मचारियों को भी सोने के सिक्कों से नवाजा था। तब कंपनी का मुनाफा 56 करोड़ रुपये था, जिसमें सात करोड़ रुपये से ऊपर की रकम इन तोहफों पर खर्च हुई जब मामला कैग की निगाह में भी आया तो कंपनी ने जवाब दिया था कि वह अंतरिक्ष विभाग और इसरो के कर्मचारियों का धन्यवाद देना चाहती थी। कैग ने इन तोहफों पर विपरीत टिप्पणी की थी। एंट्रिक्स से सोने के सिक्कों की बौछार का यह मामला इसरो की व्यवस्था के भी विपरीत था, क्योंकि यहां हर उपग्रह की सफल लांचिंग पर कर्मचारियों को नकद प्रोत्साहन दिया जाता है। कुल मिलाकर अंतरिक्ष विभाग और एंट्रिक्स कॉरपोरेशन का कामकाज इस कदर अपारदर्शी है कि वहां घोटालों की कतार छिपी हो सकती है। सरकार पिछले कई वर्ष से अंतरिक्ष विभाग में तरह-तरह की अपारदर्शिताओं पर पर्दा डालती रही है। पिछले दो-तीन वर्ष में कैग सहित विभिन्न संस्थाओं ने अंतरिक्ष विभाग और इसकी वाणिज्यिक कंपनी एंट्रिक्स में अनियमितता के कई मामले पकड़े हैं, मगर सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के मातहत यह विभाग हर तरह की कारवाई से ऊपर रहा है। देवास का मामला तो 2005 का है, मगर अंतरिक्ष विभाग को कर्मचारियों को सोने के सिक्कों से नवाजे जाने का मामला सिर्फ तीन साल पहले का है। एंट्रिक्स कॉरपोरेशन शायद देश की अनोखी सरकारी कंपनी होगी, जिसने अपने प्रशासनिक विभाग और सहयोगी एजेंसियों को इतनी बड़ी संख्या में इतने महंगे तोहफे बांटे। इस उदारता की सूचना तब सरकार तक पहुंची भी थी, लेकिन अंतरिक्ष विभाग का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सका। केंद्रीय सतर्कता आयोग कर्मचारियों को तोहफे देने पर रोक लगा चुका है। इसरो और देवास मल्टीमीडिया के बीच हुए करार को रद करने की तैयारियां कर रही सरकार ने अब इसकी समीक्षा के लिए समिति गठित कर दी है। योजना आयोग के सदस्य और पूर्व कैबिनेट सचिव बीके चतुर्वेदी की अध्यक्षता में गठित समिति को एक महीने के भीतर रिपोर्ट देने को कहा गया है, लेकिन इसी दौरान करार रद होने की खबरें बाहर आने के बाद ही देवास मल्टीमीडिया दावा कर रही है कि अंतरिक्ष के साथ हुए इस करार को खुद सरकार मंजूरी दे चुकी है। यह कानूनन बाध्यकारी है। ऐसे में अब सरकार अपने करार से कैसे मुकर सकती है। वैसे जुलाई 2010 में ही कानून मंत्रालय ने अंतरिक्ष विभाग को दी अपनी कानूनी राय में सरकार से करार को रद करने की सिफारिश की थी, जिस पर सरकार सात-आठ महीने बाद भी फैसला नहीं ले पाई है। एक ओर कांगे्रस समीक्षा समिति की आड़ में बचने का रास्ता ढूंढ़ रही है, जबकि भाजपा ने इस समिति पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी प्रवक्ता निर्मला सीतारमण के अनुसार समझौते को मंजूरी देने वालों में शामिल चतुर्वेदी मामले की जांच कैसे कर सकते हैं? बहरहाल, एस बैंड घोटाले को लेकर एंट्रिक्स और देवास फंसी हुई है, वही इसरो की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह विपक्ष के निशाने पर है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
Saturday, February 12, 2011
नजीर बनतीं मिस्र की महिलाएं
मिस्र में हालात अब तेजी से बदल रहे हैं। बीते एक पखवाड़े से काहिरा का तहरीर चौक लगातार अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छाया हुआ है। तहरीर चौक पर राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के खिलाफ इकट्ठे हुए प्रदर्शनकारियों में इस मुल्क की आधी आबादी यानी महिलाओं ने अपनी उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। हाल में एक अखबार के पहले पन्ने पर तहरीर चौक पर थकी-मांदी सो रही एक बच्ची की तस्वीर छपी, जिसके माथे पर अरबी में लिखा हुआ था मेरी आत्मा, मेरा दिल मिस्र है। वास्तविक लोकतंत्र को हासिल करने के इस अहिंसक संघर्ष में हर उम्र की महिलाओं का कारवां आगे बढ़ता नजर आया। इस संक्रमण दौर में उनकी भूमिका आगे की ओर बढ़ते हुए कदम हैं, ये मिस्र के इन ऐतिहासिक पलों की अत्यंत महत्वपूर्ण पात्र हैं। महिलाओं के ये बयान पढ़ने-सुनने को भी मिले कि वे मिस्र में बदलाव लाने के लिए पुरुषों के साथ मिलकर काम कर रही हैं। अलेक्जेंडर ब्लैकमैन जो काहिरा में सेंटर फॉर अरबी स्टडी एबोर्ड में फेलो हैं, लिखती हैं कि पुरुषों की तरह ही विरोध करने वाली महिलाएं मिस्र के सभी सामाजिक-आर्थिक वर्गो, धर्मो व पीढि़यों से तहरीर चौक पर नजर आती हैं। किसी ने नकाब तो किसी ने पूरा चेहरा ढका हुआ है तो कोई डिजायनर जींस पहनी हुए हैं। धूप के चश्मे पहनी युवा लड़कियों, महिलाओं के हाथों में लोकतंत्र के पोस्टर दिखाई दिए। वह पुलिस का सामना करने में भी पीछे नहीं रहीं। संगठित होकर रणनीति अपनाई और अपने अपने काम बांट लिए। कुछ ने होस्नी मुबारक के खिलाफ व लोकतंत्र के पक्ष में नारे लगाने का जिम्मा लिया तो कुछ ने सुरक्षा का काम संभाला। दरअसल राजनैतिक हकों वाले इस संघर्ष में उन्होंने आगे की कतार में खड़े होकर पुलिस विरोध का मुकाबला किया और हजारों की भीड़ के सामने नारेबाजी का नेतृत्व करने में भी पीछे नजर नहीं आई। मिस्र के इतिहास पर नजर डालें तो 1919 व 1922 में वहां ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ जो राजनैतिक विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ, उसमें छात्र, सिविल अधिकारी, व्यापारी यूनियन, पुरुषों व महिलाओं ने भी शिरकत की। उच्च मध्य वर्ग की महिलाएं राष्ट्रवादी नेताओं से प्रभावित होकर विरोध प्रदर्शन के लिए बाहर निकलीं तो गरीब महिलाएं भी पीछे न रहीं। बीसवीं सदी के दूसरे दशक में मिस्र की महिलाओं ने राजनैतिक संघर्ष में जो भूमिका निभाई वह आगे चलकर विस्तृत होती गई। बेशक 1919 की मिस्र क्रांति महिलाओं के शमिल होने व उनके राष्ट्रीय मुद्दों से जुड़ने पर रोशनी डालती है, मगर इतिहास यह भी बताता है कि चार साल बाद जो संविधान लिखा गया, उसमें महिलाओं को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा गया यानी वे पुरुषों की तरह न तो वोट डाल सकतीं थी और न ही चुनाव लड़ सकती थीं। यहां अगर उनकी भारतीय महिलाओं से तुलना करें तो उन्हें अपने राजनैतिक अधिकार हासिल करने के लिए अधिक संघर्ष करना पड़ा। भारतीय महिलाओं को आजादी के बाद पुरुषों के समान ही चुनाव लड़ने व वोट डालने का अधिकार मिल गया था, जबकि मिस्र की महिलाओं को इसके लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। 1923 में नारीवादी आंदोलन की शुरुआत उस समय हुई, जब काहिरा के रेलवे स्टेशन पर महिलाओं ने नकाब उतारते हुए कहा कि यह अब अतीत की बात है। नारीवादी आंदोलन ने महिलाओं को उनके राजनैतिक अधिकार दिलाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने का काम किया। 1947 में मिस्र वीमेन एसोसिएट ने महिलाओं को मताधिकार देने के लिए चुनाव संबंधी कानून में संशोधन की मांग की। इस मांग में महिलाओं को पुरुषों के बराबर मत देने के अधिकार के साथ ही स्थानीय व प्रतिनिधित्व काउंसिल में पहुंचने का अधिकार भी शमिल था। 1952 में इस देश में फिर क्रांति हुई और 1956 में महिलाओं को पुरुषों के बराबर मत डालने का अधिकार मिल गया। 1962 में देश में पहली बार एक महिला को मंत्री बनाया गया। यह घटना वहां के मुस्लिम समाज में एक ऐतिहासिक लकीर बनी। दरअसल, जब महिलाओं को उनके राजनैतिक अधिकार दिए गए तो उस समय तक इस बात को स्वीकार लिया गया था कि महिलाओं को उनके अधिकार न देना लोकतंत्र के नियमों का विरोध करना है। ऐसे राजनैतिक अधिकार मिलने से अन्य क्षेत्रों में भी महिलाओं के अधिकार बढ़े व उनके आगे बढ़ने का मार्ग खुला है। इससे महिलाओं की भागीदारी विस्तृत हुई। उच्च पदों पर उनकी नियुक्ति का माहौल बनने लगा और पुरानी रुढि़वादी सोच को चुनौती मिलने लगी। आज मिस्र में महिलाएं चुनाव लड़ती हैं, वह सरकार में मंत्री भी बनती हैं। जज और राजदूत के पदों पर भी हैं। अपनी पंसद की पोशाक के साथ तहरीर चौक पर तानाशाही रवैये वाले राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के विरोध में हजारों की संख्या में नजर आती हैं और अंतरराष्ट्रीय मीडिया उनकी इस महत्वपूर्ण भूमिका का बार-बार जिक्र भी करता है। इस तहरीर चौक पर महिलाओं को इकट्ठा होने के आह्वान के साथ-साथ उन्हें कुछ हिदायतें भी उन तक पहुंचा दी गई थीं। मसलन, प्रदर्शनकारी युवतियों, महिलाओं से सुरक्षा बलों व ठगों के यौन हमलों से बचने के लिए बदन पर ड्रेस के दो जोड़े पहनकर आने को कहा गया। इसी तरह दो स्कॉर्फ के साथ आने को कहा गया। इसके पीछे उनकी चिंता यह थी कि अगर यौन हमले में उनके बदन पर पहनी पहली परत वाली ड्रेस फाड़ दी जाती है तो वे घबराएं नहीं। ऐसे में ड्रेस की दूसरी परत उनकी सुरक्षा कवच बनेगी। यौन हमलों का उद्देश्य इन महिलाओं को निशाना बनाकर उन्हें अपमानित करना हो सकता है। महिलाओं को इस बावत आगाह रहने के लिए तैयार रहने के पीछे वजह यह थी कि कुछ साल पहले होस्नी मुबारक के शासन काल में सुरक्षा बलों का इस्तेमाल महिलाओं पर यौन हमलों के लिए किया गया था। महिलाओं के अधिकारों की आवाज उठाने वाली इस देश की जानी-मानी नारीवादी नवल इल सादावी को राजनीतिक बंदी बनाया गया। फिर देश निकाला दिया गया। अब वह तहरीर चौक लौट आई हैं। अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि महिलाएं व लड़कियां, पुरुषों व लड़कों के साथ गलियों में खड़ी हैं। हम न्याय, आजादी, बराबरी व वास्तविक लोकतंत्र और एक ऐसे नए संविधान की मांग कर रहे हैं जिसमें महिलाओं व पुरुषों के बीच कोई भेदभाव न हो। मुस्लिम, ईसाई के बीच कोई भेदभाव न हो। हम व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे हैं ताकि वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना हो सके। राजनीतिक आंदोलनों में महिलाएं हिस्सा लेती रही हैं, पर इस भागीदारी, उनके जुड़ने वाली भूमिका व योगदान के बेहतर नतीजे नहीं आए। अपने देश की दिवंगत महिला नेता प्रोमिला दंडवते ने एक बार अफसोस जताते हुए कहा था कि जिस तरह आजादी की लड़ाई में भारतीय महिलाओं ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी, उस अनुपात में उन्हें देश आजाद होने के बाद उन्हें उनका हिस्सा नहीं मिला। कमोबेश ऐसे ही हालातों के कारण महिलाओं को और अधिक संघर्ष करने व राजनीति में उचित प्रतिनिधित्व के लिए दबाव बनाए रखने में अपनी ऊर्जा का एक बहुत बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। मिस्र की महिलाओं का भी मानना है कि इस संघर्ष, प्रतिरोध के खत्म होने के बाद भी उन्हें आजादी व बराबरी के लिए चौकस रहना होगा। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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