कल ही हमने ’महिला दिवस‘ मनाया है, तमाम बड़ी - बड़ी बातों के बीच जिन चीजों को हम भूल जाते हैं, उनमें खास है पाठय़पुस्तकों में मौजूद लिंग के आधार पर भेदभाव। फिर बात चाहे छोटे स्कूलों की हो या बड़े नामी स्कूलों की। पढ़ाई-लिखाई से लेकर खेलकूद, लाइब्रेरी, लैबोरेट्री में भेदभाव का शिकार हो रहीं लड़कियां भला कैसे वह पाठ समझ पाएंगी, जो उन्हें सशक्तिकरण की ओर ले जाएगा। सही व उचित शिक्षा पण्राली से बेजार सरकार का ध्यान इन मुद्दों की तरफ नहीं जाता, आंकड़ों सहित बता रहे हैं शिरीष खरे-
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Friday, March 11, 2011
शिक्षा ही सशक्तिकरण
कल ही हमने ’महिला दिवस‘ मनाया है, तमाम बड़ी - बड़ी बातों के बीच जिन चीजों को हम भूल जाते हैं, उनमें खास है पाठय़पुस्तकों में मौजूद लिंग के आधार पर भेदभाव। फिर बात चाहे छोटे स्कूलों की हो या बड़े नामी स्कूलों की। पढ़ाई-लिखाई से लेकर खेलकूद, लाइब्रेरी, लैबोरेट्री में भेदभाव का शिकार हो रहीं लड़कियां भला कैसे वह पाठ समझ पाएंगी, जो उन्हें सशक्तिकरण की ओर ले जाएगा। सही व उचित शिक्षा पण्राली से बेजार सरकार का ध्यान इन मुद्दों की तरफ नहीं जाता, आंकड़ों सहित बता रहे हैं शिरीष खरे-
Tuesday, March 8, 2011
Monday, March 7, 2011
जमीन पर महिलाओं की हिस्सेदारी
आधुनिकता के दौर में भले ही हम महिला-पुरुष में गैर बराबरी के खत्म होने का जितना दम भर लें, पर यह रोग जल-जंगल-जमीन से जुड़े कानूनों में भी मौजूद है। आम जनमानस ने महिलाओं के भूमि अधिकारों के सवाल को हमेशा संपत्ति के सवाल से जोड़ कर ही देखा है। सिर्फ पारिवारिक विरासत को लेकर बने कानूनों के आधार पर ही नारियों को भूमि पर अधिकार दिए जाने की बात की जाती रही है। पर सचाई यही है कि ऐसे मामलों में भी उन्हें स्वतंत्र अधिकार नहीं दिया जाता। यह सुखद है कि देश के इतिहास में पहली बार वनाधिकार कानून-2006 में महिलाओं को वनभूमि पर समान अधिकार को मान्यता देने की बात की गई है।
वनाधिकार कानून में पहली बार महिलाओं के मालिकाना हक को दर्ज करने के कानूनी प्रावधान किए गए हैं। लेकिन इस कानून में वनक्षेत्रों में रहने वाले गरीब दलित आदिवासी तबकों का वन एवं वन भूमि पर नियंत्रण स्थापित हो जाने के डर से इन समुदायों को मालिकाना हक देने के लिए सरकार कोई विशेष दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। सरकार इसलिए सुस्त है, क्योंकि जब वनाधिकार कानून के अनुसार महिलाओं व वंचित समुदायों के मालिकाना हक में जंगल आ जाएंगे, तो वह बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को बड़े पैमाने पर न तो कौड़ियों के दाम वनभूमि उपलब्ध करा पाएगी और न प्राकृतिक संसाधनों का कोई सौदा ही होगा। इसके अलावा वन विभाग, पुलिस विभाग, प्रशासनिक अधिकारियों व माफियाओं की जंगल से होने वाली अवैध कमाई भी खतरे में पड़ जाएगी।
वनाधिकार कानून जनजातीय समुदायों के पिछले 250 वर्षों के संघर्ष का नतीजा है। पहली बार संसद ने वन भूमि व वनों पर महिलाओं के अधिकारों को व्यक्तिगत भूमि अधिकार सहित सामुदायिक और प्रबंधन के अधिकार को मान्यता दी। हालांकि अभी पूरी तरह से इन अधिकारों को महिला को केंद्र में रख कर दर्ज नहीं किया गया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी देखें, तो महिलाएं पुरुषों की तुलना में प्रकृति के कहीं ज्यादा करीब होती हैं और उनमें सामुदायिकता का भाव अधिक होता है। इसलिए वनाधिकार कानून में नारियों के जिन अधिकारों को मान्यता दी गई है, उनका अपना महत्व है। अब वनों पर केवल पुरुषों का ही एकाधिकार नहीं होगा, बल्कि ये अधिकार उन्हें तभी मिलेंगे, जब उनके साथ परिवार की महिला का अधिकार भी दर्ज होगा। यही नहीं, अगर कहीं पर एकल महिला है या परिवार की मुखिया महिला है, तो भी यह अधिकार उसी के नाम से दर्ज होगा।
मेहनतकश, भूमिहीन व खेतिहर मजदूर महिलाओं द्वारा किसानी में 90 प्रतिशत से अधिक योगदान देने के बावजूद आज तक उन्हें किसान का दरजा नहीं दिया गया। देश में जितने भी भूमि कानून बने हैं, उनके अनुसार घर के पुरुष अथवा पति के देहांत होने पर सारे अधिकार बेटे अथवा परिवार के अन्य पुरुषों को विरासत में मिल जाते हैं। महिलाओं के लिए वनाधिकार कानून इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि आंशिक अधिकार मिलने के बावजूद वे उनसे अपने बच्चों के भोजन और कुछ हद तक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सुरक्षा भी प्राप्त कर सकती हैं। अगर वनाधिकार कानून के अनुरूप महिलाएं अपना अधिकार पाने में सफल हो जाती हैं, तो इन महिलाओं को पति अथवा परिवार के पुरुष आसानी से घर से बाहर नहीं निकाल पाएंगे। यही नहीं महिलाओं के अधिकार बढ़ने से वन भी बढ़ेंगे। झारखंड में महिला आयोग की सदस्या वासवी कीरो द्वारा किए गए अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि जहां-जहां घने वन हैं, वहां महिलाओं का अनुपात पुरुषों के मुकाबले कहीं ज़्यादा है।
वनाधिकार कानून में भले ही वन समुदायों के साथ हुए अन्यायों की बात को स्वीकार किया गया है, पर वन संपदा पर काबिज अभिजात्य शक्तियां इसे वास्तविक रूप से स्थापित नहीं होने देना चाहतीं। वनाधिकार कानून को अमली जामा पहनाने के लिए महिलाओं को ही चेतना पड़ेगा, नहीं तो वन विभाग इन वन संपदाओं को देशी-विदेशी कंपनियों के साथ सौदा करके उन्हें बेच देगा। महिलाओं को स्वयं आगे बढ़कर इस कानून को समझना होगा और आम नागरिक समाज का समर्थन भी हासिल करना होगा, क्योंकि यह कानून महिलाओं के अधिकार ही नहीं, बल्कि पर्यावरण और पृथ्वी के अस्तित्व की सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है
महिला सशक्तिकरण का यक्ष प्रश्न
भारत अपनी स्वतंत्रता के छह दशक बिता चुका है और इन वर्षो में भारत में बहुत कुछ बदला है। विश्व के सबसे मजबूत गणतंत्र में सभी को अपनी इच्छा से जीने, सोचने और अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता मिली है, जिसका हम उपभोग भी कर रहे हैं। हालांकि एक वर्ग ऐसा भी है जो आज भी इस सुखानुभूति से वंचित है और वह हैं स्ति्रयां। स्त्री और पुरुष के बीच भेद आज भी कायम है और यह तथ्य आंकड़ों से उद्घाटित होता है जो विभिन्न सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों द्वारा समय-समय पर किए गए सर्वेक्षणों पर आधारित है। एसोचैम की रिपोर्ट बताती है कि भारतीय महिलाएं घर और दफ्तर दोनों ही जगह भेदभाव का शिकार हैं। काम के बढि़या अवसर तो दूर उन्हें पदोन्नति के समान अवसर तक नहीं मिलते, जिस कारण वह उच्च पदों पर नहीं पहुंच पाती हैं। महज 3.3 प्रतिशत महिलाएं ही शीर्ष पदों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाती हैं। भारत में महिला आर्थिक गतिविधि दर केवल 42.5 प्रतिशत है, जबकि नार्वे में यह 60.3 प्रतिशत और चीन में 72.4 प्रतिशत है। यह आंकड़े बाजार अर्थव्यवस्था से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों के हैं। विश्व के कुल उत्पादन में लगभग 160 खरब डॉलर का योगदान अदृश्य सेवा का होता है, इसमें भारतीय महिलाओं का योगदान काफी बड़ा है। इसके बावजूद समाज के आर्थिक वर्गो की गणना करते हुए घरेलू महिलाओं के श्रम का उचित मूल्यांकन नहीं हो पाता और उनकी तुलना नगण्य माने जाने वाले पेशों के तहत होती है। देश के नीति-निर्धारकों की ओर से आर्थिक वर्गाीकरण करते हुए देश की आधी आबादी को इस दृष्टिकोण से देखा जाना न केवल उनके श्रम की गरिमा के प्रति घोर असंवेदनशीलता का परिचायक है, बल्कि यह भेदभाव और लैंगिक पूर्वाग्रह की पराकाष्ठा है। विगत दो दशक में महिला सशक्तीकरण की अवधारणा ने जोर पकड़ा है। यह वह प्रक्रिया है जो महिलाओं को सत्ता की कार्यशैली समझने की न केवल समझ देता है अपितु सत्ता के स्रोतों पर नियंत्रण कर सकने की क्षमता भी प्रदान करता है। सामाजिक विकास अंतर्निहित रूप से राजनीतिक होता है, इसलिए यदि यह असमानतापूर्ण और गैर सहभागितापूर्ण हो तो इससे समाज का विकास प्रभावित होगा। इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन के अनुसार विभिन्न देशों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व वहां की संसद में भारत की अपेक्षा बहुत अधिक है। यूं तो पंचायत और शहरी निकायों के माध्यम से विकास प्रक्रियाओं एवं निर्णयन की प्रक्रिया में सहभागिता बढ़ाने के लिए पचास प्रतिशत सीटें आरक्षित की गई है। हालांकि अध्ययन बताते हैं कि सत्ता का उपभोग वास्तविक रूप में पदासीन महिलाओं की बजाय उनके परिवार के पुरुष सदस्य करते हैं। यदि कभी ऐसा नहीं होता तो उसके घातक परिणाम भी देखने में आए हैं। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में एक महिला सरपंच को पूर्व सरपंच तथा उसके साथियों ने बस स्टैंड पर नग्न करके मात्र इसलिए पीटा कि, क्योंकि कार्यभार संभालने के एवज में उसने पंचायत फंड से सात हजार रुपये नहीं दिए। देश का संविधान, विभिन्न कानूनी प्रावधान और व्यक्तिगत तथा सामूहिक प्रयास स्त्री को उबारने में लगे हैं, लेकिन महिलाओं की परेशानियां कम नहीं हो रही हैं। देश में शायद ही कोई ऐसी जगह हो जहां महिलाएं स्वयं को सुरक्षित महसूस करती हों। बस, ट्रेन, ऑफिस, स्कूल-कॉलेज अथवा भीड़भाड़ वाले स्थानों से लेकर सुनसान रास्तों में फब्तियां कसने, घूरने, छेड़छाड़ आदि की घटनाएं आम हैं। सन 2009 में बलात्कार के 21 हजार मुकदमे दर्ज हुए। इनमें से 15 से 17 वर्ष वाली लड़कियों का प्रतिशत 12 फीसदी रहा तो उनसे छोटी लड़कियों की तादाद 29 प्रतिशत रही। हाल में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार पिछले वर्ष, हर तीन में से दो महिलाएं यौन हिंसा का शिकार हुई। आंकड़े बताते हैं कि लड़कियां और स्ति्रयां बाहर की तरह अपने घरों में भी असुरक्षित हैं। पति और रिश्तेदारों द्वारा होने वाले अपराधों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। महिलाओं पर हो रही घरेलू हिंसा के आंकड़े जितने लंबे-चौड़े हैं उतने ही डरावने भी। उत्पीड़न, प्रताड़नाओं और अवहेलनाओं के कंटीले तारों से बींधता भारतीय स्त्री का जीवन इस धरा पर आने के लिए भी संघर्ष करता है। जन्म से पूर्व ही लिंग के प्रति भेदभाव आरंभ हो जाता है। भारत में बालिका भू्रणहत्या के संदर्भ में नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने इस चिंता से सहमति जताई है कि इस कुप्रथा के चलते देश में ढाई करोड़ बच्चियां जन्म से पूर्व ही गुम हो गई। यही नहीं, डब्ल्यूईएफ ने बच्चियों के स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा के आंकड़ों के हिसाब से भी पुरुष-महिला समानता की सूची में इन्हें निचले पायदान पर पाया है। विश्व आर्थिक मंच की रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वास्थ्य और जीवित रहने जैसे मसलों में पुरुष और महिलाओं के बीच लगातार अंतर बना हुआ है। भारत में महिला संवेदी सूचकांक लगभग 0.5 है जो कि स्पष्ट करता है कि महिलाएं मानव विकास की उपलब्धियों से दोहरे तौर पर वंचित हैं। विकसित देशों में प्रति लाख प्रसव पर 16-17 की मातृत्व मृत्युदर की तुलना में भारत में 540 की मातृत्व मृत्युदर, स्वास्थ्य रक्षा और पोषक आहार सुविधाओं में ढांचागात कमियों की ओर इशारा करती है। जीवन के मूलभूत अधिकारों से वंचित देश की महिलाएं अनवरत रूप से असमानताओं के दंश झेल रही है। भारतीय महिलाओं में साक्षरता की कमी है सामंती समाज येन-केन प्रकारेण महिलाओं के अधिकारों का हनन परंपराओं के नाम पर करता है। यह विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को ऐसे कटघरे में ला खड़ा करता है जहां उसके पास मानवता के हनन को रोकने का कोई उत्तर नहीं है। जब स्ति्रयां आगे बढ़ती हैं तो परिवार आगे बढ़ता है, गांव आगे बढ़ता है और राष्ट्र अग्रसर होता है। पर क्या हम वाकई इस तथ्य को आत्मसात कर पाए हैं या फिर स्त्री सशक्तीकरण की नियति महिला दिवस पर चर्चाओं और नारेबाजी तक सीमित हो गई है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
असमानता की कसक
महिलाओं के साथ भेदभाव पर लेखिका की टिप्पणी
हम महिला दिवस शायद इसलिए मनाते हैं कि कम से कम एक दिन तो महिलाओं की समस्याओं पर गंभीरता से चर्चा कर सकें। पर जितनी गंभीरता से योजनाएं तैयार की जाती हैं, उतनी ही लापरवाही से इनका क्रियान्वयन होता है। अनेक शीर्ष पदों पर आसीन महिलाओं को देखकर लगता है कि भारत की महिलाएं तेजी से कदम बढ़ा रही हैं, नई ऊंचाइयां छू रही हैं पर कुछ दिग्गज महिला राजनेताओं, नौकरशाहों, उद्यमियों व कलाकारों के आधार पर महिलाओं के बारे में धारणा बनाना सरासर गलत है। महिलाओं को लेकर देश का उपेक्षा भाव इस बात से ही जाहिर हो जाता है कि कन्या भ्रूण हत्या की संसद और विधानसभाओं में शायद ही कभी चर्चा होती हो। उन बेटियों का दर्द कोई नहीं समझ पा रहा जिनकी जन्म से पहले ही हत्या कर कूडे़ के डिब्बे में फेंक दिया जाता है और वे कहीं मेडिकल वेस्ट के नाम पर जला या दफना दी जाती हैं। हमारी सामाजिक कुरीतियां, धार्मिक अंधविश्वास और पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता महिला उत्पीड़न का प्रमुख कारण हैं। भारत में प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु दर भी छोटे-छोटे पड़ोसी देशों से भी कहीं ज्यादा है। श्रीलंका में एक लाख महिलाएं बच्चों को जन्म देती हैं तो कुल 34 महिलाओं की मृत्यु होती हैं जबकि भारत में यह आंकड़ा 254 है। इसका बड़ा कारण महिलाओं की अशिक्षा, छोटी आयु में शादी तथा प्रसव के लिए अस्पताल तक न पहुंचना है। भारत में बहुत-सी लड़कियां छोटी आयु में ही विवाह के बंधन में बांध दी जाती हैं। श्रीलंका में लड़कियों के विवाह की औसत आयु 23 वर्ष से भी कुछ अधिक है और महिला शिक्षा दर भी पुरुषों से कम नहीं है। यही कारण है कि वहां महिलाओं की संख्या पुरुषों से तीन प्रतिशत अधिक है और उन्हें बच्चों को जन्म देने के दंड में मौत का सामना नहीं करना पड़ता। महिला दिवस के नाम पर मनाए जा रहे आयोजनों के संदर्भ में क्या हम केवल इतना ही कर सकते हैं कि महिलाओं के अधिकारों पर भाषण देने के लिए ऐसे नेता, वक्ता मंच पर न सजाएं जिनके अपने परिवारों में ही दहेज लिया-दिया गया है और जिनके परिवार में कभी अजन्मी बेटी की हत्या हुई है। जिस समाज में आज भी ऐसे धर्म स्थान हैं जहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित हो, वह कैसे कह सकता है कि जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं। सच तो यह है कि बहुत सारे देवस्थलों से नारी को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। धर्म के नाम पर यह भी उपदेश दिया जाता है कि अगर अंतिम संस्कार के समय किसी को बेटी का हाथ लग गया तो उस व्यक्ति की आत्मा की कभी गति नहीं हो सकती। जब पुरुष प्रधान समाज के कुछ धर्मगुरु कहते हैं कि बेटी दिवंगत माता-पिता का श्राद्ध नहीं कर सकती और उसकी अपनी आय में से चार पैसे पिता का तर्पण करने में चले गए तो पिता की आत्मा को कष्ट होगा। ऐसा समाज महिलाओं को कहां समानता दे सकेगा? आज भी पूर्व और उत्तर-पूर्व भारत से खबरें आती हैं कि महिला को डायन मानकर पत्थर से मार दिया गया या जला दिया गया। आज भी उन महिलाओं की पूजा होती है जो कभी पति की चिता पर जल गईं। महिला दिवस मनाने से अच्छा है कि महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण बदला जाए। क्या यह सत्य नहीं कि महिलाओं को आज उपभोग की वस्तु बना दिया गया है। चौराहों पर, शराब के ठेकों पर ऐसे विज्ञापन मिलते हैं, जिन्हें देखकर सिर शर्म से झुक जाता है। उन गीतों पर भी कोई प्रतिबंध नहीं जो महिलाओं की अस्मिता का अपमान करते हैं। रेडियो, टीवी और कैमरे वालों को यह सब दिखाने और सुनाने की छूट दे दी गई। महिला दिवस मना रहे संगठनों और नेताओं से निवेदन है कि हमें न पूजा की वस्तु बनाइए, न पांव की जूती। मानव के नाते जो हमारा स्थान और अधिकार है, बस हमें वही चाहिए। आरक्षण की बैसाखियां नहीं, हमें समानता चाहिए। (लेखिका पंजाब सरकार में मंत्री हैं)
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