विभिन्न मंत्रालयों द्वारा पोषण के अलग-अलग दावों के बावजूद हालत यह है कि 35 फीसद से ज्यादा महिलाएं कुपोषण का शिकार हैं और इनमें मुस्लिम महिलाओं की संख्या ज्यादा है। ये महिलाएं 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की है। कुपोषित महिलाओं के चलते ही पांच वर्ष तक नवजात शिशुओं की मौत सबसे ज्यादा भारत में हो रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सव्रेक्षण से पता चला है कि 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की लड़कियों व महिलाओं में कराए गए सव्रेक्षण से पता चला है कि 36.4 फीसद हिंदू महिलाएं और 35.1 फीसद मुस्लिम महिलाएं अभी भी कुपोषण का शिकार हैं। इन महिलाओं का बॉडी मास इंडेक्स का पता लगाने के लिए एक विशेष तरह की रक्त जांच एवं वजन कराया गया है जिसमें पता चला है कि इन महिलाओं के स्वास्थ्य शरीर के सूचकांक में गिरावट आ रही है। इससे ज्यादा चौंकाने वाली बात उक्त सव्रे से यह पता चली है कि हिंदू एवं मुस्लिम महिलाएं क्रमश: 55.9 एवं 54.7 फीसद एनीमिया से प्रभावित हैं। उधर महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ का कहना है कि महिलाओं के कुपोषण के कारण ही नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य में जन्मजात गिरावट आ रही है। हालांकि कुपोषण से निपटने के लिए कई मंत्रालय एक साथ काम कर रहे हैं मगर सव्रे से जो स्थिति सामने आई है उसको देखते हुए लगता है कि समन्वित कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि मिड-डे मील योजना, ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, समन्वित बाल विकास योजना सहित कई योजनाएं है जो महिलाओं एवं बच्चों के कुपोषण से निपटने के लिए चलाई गई है और इस दिशा में कई मंत्रालय मिल कर काम करेंगे।
Friday, November 25, 2011
Friday, November 18, 2011
अनचाहे नाम की विडम्बना
मराठी भाषा में एक शब्द है ‘नकुशा’ जिसका शाब्दिक अर्थ है अनचाही या अवांछित। महाराष्ट्र के अनेक ग्रामीण इलाकों में एक प्रचलित कुरीति के चलते आज भी अनेक लड़कियों का नाम नकुशा रखा जाता है। लोकमान्यता के मुताबिक यदि किसी दंपत्ति के यहां एक या दो लड़कियों के बाद फिर लड़की पैदा होती है तो उसका नाम नकुशा यानी अनचाही रख दिया जाता है क्योंकि माता-पिता चाहते तो बेटा थे लेकिन हो गई बेटी। मान्यता है कि अनचाही बेटी को नकुशा पुकारने से अगली संतान के रूप में बेटा ही जन्म लेगा, जबकि अक्सर ऐसा होता नहीं है। इस सामाजिक धारणा के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। बल्कि यह लड़कियों को खुले तौर पर अपमानित करने, उनके भीतर हीन भावना भरने, परवरिश में उपेक्षा भाव व उन्हें सक्षम न समझने वाली मानसिकता का द्योतक है। मगर हाल में बेटी बचाओ सरकारी अभियान के तहत महाराष्ट्र के सतारा जिले में नकुशा नाम की लड़कियों की पहचान कर उनका नाम बदलकर समाज में सार्थक संदेश देने वाली नायाब पहल का अपना महत्व है। गौरतलब है कि महाराष्ट्र देश के उन पांच राज्यों में एक है,जहां बाल लिंग अनुपात बहुत असंतुलित है। 2011 की जनगणना के प्रारंभिक आंकड़ों के मुताबिक यहां प्रति हजार बालकों पर बालिकाओं की संख्या 883 है जबकि दस साल पहले 2001 में यह 914 थी। यूनाइटड नेशंस पॉपुलेशन फंड एजेंसी के हालिया सव्रे में दावा किया गया है कि महाराष्ट्र में हर साल 55,053 से अधिक कन्या भ्रूण का गर्भपात विकसित अवस्था में कराया जाता है। सतारा, जो राज्य के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण का गृह जिला है, में यह आंकड़ा 881 का है। सतारा आर्थिक दृष्टि से कमजोर या पिछड़ा नहीं है मगर पुत्र प्राप्ति के नाम पर आज भी पुरातनपंथी सोच में जकड़ा है। यह पुष्टि जनगणना के आंकड़ों के साथ-साथ यहां लड़कियों के प्रति प्रचलित सामाजिक परपंराएं भी करती हैं। मसलन बेटी होने पर नामकरण संबंधी समारोह न करना, मां को बेटियों को स्तनपान कराने की इजाजत न देना, परिवार में पहले बेटों को भोजन देना और जो बच जाए वह बेटियों के हिस्से आना यहां का आम रिवाज है। लब्बोलुआब यह कि यहां का समाज लड़कियों के पौष्टिक आहार, शिक्षा व कल्याण पर कुछ खर्च नहीं करना चाहता है। यही नहीं, कई परिवारों में उन्हें नकुशा नाम देकर यानी अनचाही अर्थ वाले नाम से पुकार कर उनकी गरिमा पर सार्वजनिक हमला किया जाता है। इतिहास बताता है कि छत्रपति शिवाजी के व्यक्तित्व निर्माण में उनकी मां जीजाबाई ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन यह बात समझ से परे हैं कि एक महिला के रूप में जीजाबाई के योगदान को सतारा ने क्यों और कैसे भुला दिया है। यह आभास वहां नकुशा नाम कराता है। बहरहाल, क्षेत्र में नकुशा की जगह नया नाम देकर समाज में उनके प्रति नजरिया बदलने वाली पहल करीब दो महीने पहले शुरू हुई। जिलाधिकारी डॉ. एन. रामास्वामी ने घर-घर जाकर यह नाम पता लगाने वाला अभियान छेड़ा और करीब 18 साल से कम उम्र वाली 900 ऐसी लड़कियों का पता चला है। पाटण तहसील में 92, कराड़ में 16, महाबलेर में 12, सतारा में 11, खंडाला में 11 और जावली तहसील में पांच नकुशा नाम की लड़कियां मिलीं। इस मुहिम के तहत हाल में करीब 222 लड़कियों के नाम बदले गए। अब वे प्रसन्न हैं क्योंकि उन्हें न तो कोई इनके नाम के आधार पर चिढ़ाएगा और न ही वे अपने भीतर हीन भाव महसूस करेंगी। गरीब परिवारों की इन लड़कियों के नए नाम रखने का जिम्मा बालिकाओं के ग्रुप,परिवारों व सरकारी अधिकारियों को सौंपा गया था। किसी का ऐर्या तो किसी का नाम पूजा रखा गया है। 11 महीने की एक बच्ची का नाम नकुशा से बदलकर निकिता रखा गया है। यूं कहा जाता है कि नाम में क्या रखा है? लेकिन ऐसा नाम जिसका मतलब ही अनचाही, अवांछित हो और जो ताउम्र समाजीकरण की प्रक्रिया में एक बोझ साबित होता हो तो उससे निजात पाना ही बेहतर विकल्प है। नाम से जिंदगी को नई दिशा, समाज में लड़कियों के महत्व को पहचान व उनके प्रति जागरूकता पैदा करने वाले लक्ष्यों के मददेनजर इस सार्थक पहल में समाज की भागीदारी अहम भूमिका निभा सकती है। साझा प्रयासों से ही इस सामाजिक कुरीति को मिटाया जा सकता है।
Friday, October 14, 2011
विषमता की पीड़ा
बीते दिनों अमेरिकी पत्रिका न्यूजवीक में भारत में महिलाओं की दयनीय स्थिति की चर्चा है। न्याय, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों की कसौटी पर इस पत्रिका द्वारा तैयार 165 देशों की सूची में भारत 141वें नंबर पर आया। उसे 100 में से सिर्फ 41.9 अंक मिले। रिपोर्ट के अनुसार भारत आर्थिक रूप से बड़ी ताकत बनने की राह पर है, लेकिन देश की अधिकतर महिलाएं इस बदलाव से अछूती हैं। इस सत्य को नकार पाना शायद किसी के लिए संभव नहीं है कि स्वतंत्रता के छह दशक बीत जाने के बावजूद महिलाएं दोयम दर्जे की नागरिक हैं। इस कटु सत्य को देश की राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने स्वीकार करते हुए कहा, आजादी के बाद देश में महिलाओं का काफी विकास हुआ लेकिन लैंगिक असमानता के क्षेत्र में अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। कुछ दिन पूर्व गैर सरकारी संगठन कम्युनिटी बिजनेस द्वारा एशिया की उभरती अर्थव्यवस्था वाले छह देशों की कामकाजी महिलाओं पर तैयार एक रिपोर्ट में भारत का स्थान चीन, मलेशिया, हांगकांग, सिंगापुर और जापान के बाद है। इस रिपोर्ट के मुताबिक चीन के कुल श्रमिकों में 49.79 प्रतिशत महिलाएं हैं, वहीं भारत में यह हिस्सा महज 24.43 प्रतिशत है। चंद महिलाओं की उपलब्धियों पर गौरवान्वित होता भारत इस सत्य को स्वीकार करेगा कि भारतीय महिलाएं न केवल दफ्तर में भेदभाव का शिकार होती हैं, बल्कि इसके साथ ही उन्हें यौन शोषण का भी शिकार होना पड़ता है। देश में महिलाओं को न तो काम के बेहतर अवसर मिलते हैं और न ही पदोन्नति के समान अवसर। जो महिलाएं नौकरी पा गईं वे भी शीर्ष पदों तक नहीं पहुंच पातीं। महज 3.3 प्रतिशत महिलाएं ही शीर्ष पदों तक उपस्थिति दर्ज करा पाती हैं। समान कार्य का समान वेतन की नीति सिर्फ कागजों तक ही सीमित है। श्रम मंत्रालय से मिले आंकड़ों से पता चलता है कि कृषि क्षेत्र में स्त्री और पुरुषों को मिलने वाली मजदूरी में 27.6 प्रतिशत का अंतर है। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि झाड़ू लगाने जैसे अकुशल काम में भी स्त्री और पुरुष श्रमिक में भेदभाव किया जाता है। विश्व के कुल उत्पादन में लगभग 160 खरब का अदृश्य योगदान केयर (देखभाल) अर्थव्यवस्था का होता है। इसमें भारतीय महिलाओं का योगदान 110 खरब का है। यूनीसेफ की रिपोर्ट यह सुनिश्चित करती है कि महिलाएं नागरिक प्रशासन में भागीदारी निभाने में सक्षम हैं। यही नहीं वे बच्चों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए सभी तरीकों का प्रयोग करती है और यह पूर्णतया सत्य है कि महिलाओं के सही प्रतिनिधित्व के बगैर किसी भी क्षेत्र में काम ठीक से और सौहार्द्र के साथ नहीं हो सकता। भारत में महिला संवेदी सूचकांक लगभग 0.5 है। इससे स्पष्ट होता है कि महिलाएं मानव विकास की समग्र उपलब्धियों से दोहरे तौर पर वंचित है। विकसित देशों में प्रति लाख प्रसव पर 16-17 की मातृ मृत्यु दर की तुलना में भारत में लगभग 540 की मातृ मृत्यु दर है। सबसे दुखद पहलू तो यह है कि यहां जन्म से पूर्व ही लिंग के प्रति भेदभाव आरंभ हो जाता है। विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट लैंगिक समानता और विकास के मुताबिक दुनिया में जन्म से पहले ही लड़कियों को मार देने की सबसे ज्यादा घटनाएं चीन के बाद भारत में होती हैं। परिवारों में लड़कों की चाहत आज भी इस कदर हावी है कि लड़कियां अवांछित बनी हुई हैं। डब्ल्यूईएफ ने बच्चियों के स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा के आंकड़ों के हिसाब से भी पुरुष-महिला समानता की सूची में निम्नतम पायदान पर पाया है। विश्व आर्थिक मंच की रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वास्थ्य और जीवित रहने जैसे मसलों में पुरुष और महिलाओं के बीच लगातार अंतर बना हुआ है। भारतीय महिलाओं के योगदान के बिना समाज और देश कदापि उन्नति नहीं कर सकते। जब स्ति्रयां आगे बढ़ती हैं तो परिवार आगे बढ़ते हैं, गांव आगे बढ़ते हैं और राष्ट्र भी अग्रसर होता है- देश के सामाजिक आर्थिक विकास की समूची अवधारणा का मूल आधार देश के प्रथम प्रधानमंत्री के ये शब्द रहे पर क्या देश वाकई इस तथ्य को आत्मसात कर पाया? (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं
Tuesday, October 11, 2011
बचाओ-बचाओ कब तक
‘बेटी बचाओ’ अभियान के नाम पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री एक मासूम बच्ची को गोद में चिपटा कर भव्य तस्वीर जिस समय छपवा कर खुश हो रहे थे, उसी समय एक ऐसी बच्ची खबरों में थी, जिसके तीन पिता हैं? प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाली इस बच्ची के प्रमाण-पत्र में तीन ‘पिताओं’ के नाम दर्ज है? व्यवस्था के ठेकेदारों की समझ पर तरस खाने से तो तकदीर नहीं बदल सकती। इन पिताओं की महानता यह है कि इन पर बच्ची की मां का बलात्कार का आरोप था। 8 साल पहले ठेकेदार के यहां काम करने वाली डिंडोरी के निगवानी गांव की 15 साल की लड़की के गर्भ के लक्षणों से पता चला कि उसका बलात्कार हुआ था, जिसको वह डर से बता नहीं पाई। पीड़िता के पिता ने जिन तीन लोगों का नाम लिया, ठेकेदार- मल्लेसिंह, ओमप्रकाश और बसंत दास। मुकदमे के दौरान ही लड़की आरोपों से मुकर गई, क्योंकि परिवार झंझट में नहीं पड़ना चाहता था। पिताओं की महान परंपरा और पौरुषेय उद्दंडता का इससे असंवेदनशील वाकया सुना है क्या? बेटी बचाने का आह्वान करने वाले विज्ञापनों और होर्डिगों से किस क्रांति की कल्पना की जा रही है, यह तो प्रदेश का मुखिया ही बता सकता है। समूचे देश में ही औरतों की ऐसी दुर्दशा है तो किसी खास पर टेसू क्या गिरायें! बलात्कार के आरोपियों को बाप बनने का प्रमाण देने वाली मानसिकता किस घिनौनेपन और नैराश्य से निकली होगी, इसकी सड़ांध को महसूसिए। यूं सुगंधित और सजीले कमरों के गद्देदार सोफों पर धसक कर मन मत मसोसिए। कानून ने तो बच्चे को मां के नाम से जानने की स्वीकृति दे दी पर इसको जन- जन तक पहुंचाया कैसे जाए, यह भी तो जरूरी है। कानूनी अधिकारों के बारे में अभी कितनी औरतें जानती हैं? महापुरुषों और पूर्व प्रधानमंत्रियों की यादों में बड़े-बड़े विज्ञापन छपवाने वाली राज्य व केन्द्र सरकारें तो औरतों की इतनी हमदर्द हैं भी नहीं कि वे विषमता हटाने वाले अधिकारों से औरतों को वाकिफ करें। ये तो वही लोग हैं, जो पुलिसिया डंडों से सड़क पर पिटती औरत को टीवी स्क्रीन पर देखकर बस दिखावे के लिए जांच का आदेश सुनाते हैं। माफ करें पर जिन राज्यों की मुखिया स्त्रियां हैं, वहां भी औरतें उसी तरह सताई जा रही हैं, जैसे बाकी देश में। क्योंकि सत्ता में आते ही, इनके भीतर का स्त्री-तत्व काफूर हो जाता है। उसको मर्दवाद अपने कब्जे में ले लेता है। पुरुष सिर्फ देह की ही परिभाषा नहीं है। यह समझने वाली बात है कि मर्दाना सोच और नियमावली विचार है, जिसका कोई भी शिकार हो सकता है। अपने शब्दों में कहूं तो यह संक्रमण है, खतरनाक किस्म का, जो औरत के समूल नाश को प्रतिबद्ध घात लगाये फिर रहा है जिससे बचाव के लिए मन से तैयार होना होगा। यह कन्या पूजन का पवित्र हफ्ता है, रस्म अदायगी के तौर पर नन्हीं बच्चियों के पांव धो माथे पर तिलक लगा कर भगवती के नाम पर उनकी स्तुति करने वाले धन्य है, जो इन्हीं देवी तुल्य बच्चियों पर अपने पौरुष का प्रहार करने से बाज नहीं आते। परिचित, पड़ोसी, दोस्त या रिश्तेदार ही बलात्कारी होता है, सुनने में थोड़ा नहीं- बहुत बुरा सा लगता है पर असलियत यही है। 58 एफआईआर/चिकित्सा रिपोटरे के अध्ययन के बाद पाया गया कि 22 मामलों में आरोपी पड़ोसी थे, 5 रिश्तेदार, जबकि 10 दोस्त। बच्चियां/औरतें कहां और कितनी सुरक्षित हैं, अब तो यह सवाल भी नहीं रहा। हम जिस समाज में जीने को मजबूर हैं, वहां औरतों के लिए कोई कोना सुरक्षित नहीं। घर, दफ्तर, सड़क, सार्वजनिक वाहन- हर जगह दरिन्दों का बोलबाला है। उधर, सरकार की नैतिक पुलिस के अनुसार लाइफस्टाइल वाले एक चैनल के बीच (समुद्र किनारे) वाले कार्यक्रम में औरतों के नितंब, कूल्हे, देह के पिछले हिस्से का उघड़ापन देख कर हैरान है। सूचना प्रसारण मंत्रालय को वक्ष की नग्नता कुछ दृश्यों में इतनी खटकी कि उसे यह स्त्री को अपमानित करने वाली लगी, जिसके खिलाफ वे गंभीर कदम उठाने की उतावली में हैं। उनको बच्ची के प्रमाण पत्र पर चस्पा तीन बाप नहीं दिख सकते, इनके नामों से किसी को जलालत नहीं होती। नग्नता को फूहड़ता से जोड़ कर शर्मिन्दगी जताने वालों के दिमागी दीवालियेपन पर कौन आंसू बहाएगा? यही है वह महान व्यवस्था जहां बेहूदी बातों के भरोसे क्रांति करने की नाटकबाजी होती रही है। औरतों की इस स्थिति को लेकर ना तो को ई धरना-प्रदर्शन होता है, ना ही कोई बहस। औरतों को भीड़ का वह हिस्सा बना दिया गया है, जिस पर हर मौसम में डिस्काउन्ट का टैग चस्पा रहता है। लाली-बिन्दी लगा लेने भर से जनानियों के घाव नहीं छिप सकते। ये घाव बहुत गहरे हो चुके हैं, इनके नासूर बनने का इंतजार करने वाले क्यों चाहेंगे कि इनका इलाज हो! औरत होना, अपने आप में जितनी गर्व की बात है, उतनी ही मुश्किल बना दी गयी हैं इसको जीने की राहें। अब भी अपनी कुल औरतों में से लगभग आधी को अक्षर ज्ञान भी नहीं है और इस तरफ अब किसी का ध्यान भी नहीं। सेंसेक्स और विकास दर पर नजरें अटकाये रखने वाले योजनाकारों और आर्थिक विशेषज्ञों के लिए ये मामूली बातें/दिक्कतें हैं। बेटियों को जन्म से पहले ही मार देना या ब्याह करके मरने के लिए छोड़ देना, रिवाज बन चुका है। जिसको अरेंज मैरिज कहते हैं, वह लड़कियों के लिए किसी जबरन ब्याह से कम नहीं होता। बेटियों को बोझ मानने वाली दकियानूस मानसिकता उनको ब्याह कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्ति से ज्यादा कुछ नहीं सोचती। मासूम बच्चियों को भी जिन स्थितियों में पाला जाता है, उसमें ब्याहने के लोभ से निकलना संभव नहीं होता। गरीबी या बन्धन इनको ना तो शिक्षा देते हैं, ना ही सुरक्षित भविष्य की कोई गारंटी ही। 2005 में ब्रिटिश सरकार के होम ऑफिस और फॉरेन ऑफिस ने संयुक्त रूप से जबरन ब्याह को अपराध के दायरे में लाया और 2010 में 1700 ऐसे मामले सुलझाये थे। जबरन विवाह से बचने के लिए घर से भागी जसविंदर ने 1993 में ही यूके में ‘कर्मनिर्वाण’ के नाम से चैरिटी शुरू की, जो जबरन ब्याह और इज्जत के नाम पर होने वाली हिंसा के खिलाफ था। 2008 में इनके पास 2,500 मामले आये, ये लड़कियां स्कूलों से अचानक नदारद हो गई थीं लेकिन यहां हम अपनी बच्चियों को जबरन ब्याह के नाम पर ना सिर्फ धकेल रहे हैं, बल्कि इस पर कोई बात करने से भी हिचकते हैं। एक बार शादी हो जाए तो मायके वाले पलट कर भी नहीं देखना चाहते। अभी यहीं दिल्ली के डॉक्टर ने अपनी पत्नी की हत्या कर उसका शव इलाहाबाद ले जाकर फेंका, क्योंकि उसको वह पसंद नहीं थी। विवाह के दबाव को ऐसा दमघोंटू बनाये रखने का यह ढोंग कब तक औरतों की जान लेता रहेगा? डॉक्टर को इंजीनियर पत्नी से जो भी दिक्कत रही हो, उसकी कीमत ‘जीवन’ तो नहीं हो सकती। यह अविसनीय लग सकता है पर सच है कि ‘द गार्डियन’ के अनुसार पुलिस को विास है कि यूके में साल भर में 12 ऑनर किलिंग हुइर्ं। देश भर में हुए ताजा अध्ययन में पाया कि दो साल के भीतर तीन हजार जबरन ब्याह के मामले सामने आये। ये कारनामे उन्हीं एशियाई परिवारों के हैं, जो धरोहर के नाम पर यह गंदगी अपने साथ ले जाते हैं। विकसित देश से कुछ भी ढंग का ना सीखने वाले इन स्त्री विरोधियों को ठीक करने के लिए वहां की सरकारें तो मुस्तैद हैं, पर अपने यहां अब तक यह साफ नहीं है कि परिवार की मर्जी से होने वाले संबंध और जबरन शादी करने के बीच कै से फर्क किया जाए? पढ़े-लिखे, समझदार भी इसी तरह अपनी मर्जी बच्चों पर थोपने की कला में माहिर हैं, जिसका खामियाजा सिर्फ लड़कियां चुकाती हैं।
Thursday, September 29, 2011
मातृत्व अवकाश का सवाल
हाल में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने यह स्वीकार किया कि विश्वविद्यालय से जुडे़ सभी कॉलेजों में महिला शिक्षक अब अपने चाइल्ड केयर लीव का उपयोग आसानी से कर पाएंगी। दरअसल विकल्प के अभाव में कई कॉलेजों की महिला शिक्षक बच्चों की देखभाल वाली छुट्टियां नहीं ले पा रही थीं। यूजीसी के स्पष्टीकरण के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा है कि चाइल्ड केयर लीव पर जाने वाली शिक्षिकाओं की जगह तदर्थ तथा गेस्ट लेक्चरर की नियुक्ति की जाएगी। यह सही है कि छात्रों के लिए वैकल्पिक इंतजाम जरूरी हैं ताकि उनकी पढ़ाई बाधित न हो, लेकिन यूजीसी से यह अवश्य पूछा जाना चाहिए कि वह चाइल्ड केयर की सुविधा सिर्फ महिलाओं को किन वजहों से दे रहा है? वैसे तो यह नियम केंद्र सरकार ने बनाया है और उससे भी यह पूछना चाहिए कि बच्चों की देखभाल बच्चों के पिता क्यों नहीं करेंगे? मातृत्व अवकाश तो महिलाओं को ही मिलना चाहिए और यह सही है कि उसे तीन महीने से बढ़ाकर छह माह किया गया है। इस समय मांओं को स्वास्थ्य लाभ के साथ नवजात शिशु को स्तनपान भी कराना होता है इसलिए यदि मातृत्व अवकाश को जरूरत पड़ने पर कुछ माह और बढ़ा दिया जाए तो वह वाजिब होगा, लेकिन चाइल्ड केयर लीव की सुविधा तो बच्चे की शुरुआती उम्र से लेकर 18 वर्ष के होने तक कभी भी ली जा सकती है। बच्चों की जरूरतें ऐसी होती हैं, जिसमें माता-पिता को छुट्टी लेनी पड़ती है और नौकरी के दौरान कर्मचारी को ऐसा मौका अवश्य मिलना चाहिए कि वह अपने बच्चे की परवरिश ठीक से कर पाए। याद रहे कि जब गृह मंत्रालय ने महिलाओं के लिए ढाई साल के देखभाल अवकाश को मंजूरी दी तो मीडिया ने उसे महिलापक्षी कदम बताया था। लोगों ने कहा और लिखा कि आजकल के एकल परिवारों में जहां पति-पत्नी दोनों नौकरी पर जाते हों वहां बच्चे बेचारे उपेक्षित रह जाते हैं। साथ ही सरकार ने यह कहा कि ऐसी सुविधा वह इसलिए दे रही है ताकि महिलाएं बच्चों की जिम्मेदारी के कारण अपनी नौकरी न छोड़ें और समाज उनके अनुभव का लाभ उठा सके। हो सकता है इन बातों में कुछ सच्चाई भी हो, लेकिन यदि किसी साधारण समझ के इंसान से भी हम समझना चाहें तो जान सकते हैं कि आज के उदारवाद और निजीकरण के जमाने में जहां परफार्मेस ही नौकरी में बने रहने का मूल तत्व हो और प्रतियोगी माहौल सर्वत्र व्याप्त हो तो उसमें ढाई साल तक भले टुकड़े टुकड़े में ही छुट्टी ली गई हो वह अपने कार्यक्षेत्र से बाहर रहेगी तो क्या वह लौटने पर अच्छा नतीजा दे पाएगी? यहां प्रमुख मुद्दा यह है कि जो काम माता-पिता में से कोई भी कर सकता है उसके लिए विकल्प खुला क्यों नहीं रखा जाता ताकि माता-पिता स्वयं तय करें कि वह जिम्मेदारी कौन निभाए? आज के समय में यह सुविधा सिर्फ महिलाओं को देना लिंगभेद के दृष्टिकोण का परिचायक है, क्योंकि एक तो यह जिम्म्ेादारी उठाने के लिए बाध्य करेगा दूसरी बात आज के समय में परफॉर्मेस एक महत्वपूर्ण कारक है। उल्लेखनीय है कि यह छुट्टी दो बच्चों के 18 साल का होने तक कभी भी ढाई-ढाई साल की ली जा सकती है। यानी सभी छुट्टी जोड़ लें तो कुल छह साल तक वह नौकरी पर रहते हुए घर में बिता सकती है। इसे सिर्फ सहूलियत के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि वह एक कर्मचारी और सेवाप्रदाता भी है जिसे सरकारी और सामूहिक खजाने से वेतन मिलता है। बराबर काम के लिए बराबर दाम के साथ बराबर की जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। यह सही है कि बच्चे की जिम्मेदारी उठाकर वह दूसरे रूप में समाज की जिम्मेदारी उठाती है, लेकिन यह जिम्म्ेादारी का बोध पुरुषों में भी डालना जरूरी है। दरअसल, आज के समय में किसी न किसी रूप में यह मुद्दा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में एजेंडा पर आया है कि जब महिलाएं सार्वजनिक दायरे की जिम्मेदारी बराबरी से निभा रही हैं तो निजी दायरा सिर्फ उन्हीं के हिस्से में क्यों माना जाए? शहरी मध्यवर्ग के परिवार इसका एक सतही समाधान निकाल लेता है कि जो काम पहले सिर्फ औरत करती थी, उसके लिए मेड रख ली जाती हैं, लेकिन घर में चाहे जितनी मदद करने वाले रख लिए जाएं, घर मेहनत की मांग करता है और इसीलिए घर के अंदर के काम में साझेदारी एक मुद्दा है। भले ही इसके प्रति असहजता रहे। यही कारण है कि सरकारें भी महिलाओं द्वारा बिना आंदोलन चलाए स्वत: ही यह अधिकार उनकी झोली में डालने के लिए आगे बढ़ी हैं। हालांकि महिलाएं कब से मांग कर रही हैं कि कार्यस्थल को सुरक्षित करने के लिए कानून बने। असंगठित क्षेत्र में आज भी बराबर काम की बराबर मजदूरी का मसला सुनिश्चित नहीं हो पाया है। जिन नौकरियों में महिलाओं की संख्या कम है, वहां उनकी भागीदारी बढ़ाने का खासतौर से उच्च पदों पर कोई विशेष उपाय किए जाएं। इन पर सरकार चिंतित नहीं है, लेकिन परंपरागत रूप से चूंकि घर के अंदर की जिम्मेदारी जिसमें बच्चे भी शामिल हैं महिलाएं ही संभालती आई हैं और समाज में अभी भी यह जिम्मेदारी परिवार के पुरुष सदस्य संभालने को तैयार नहीं हैं। इस कारण सरकार ने भी इस मानसिकता पर अपनी मुहर लगा दी है। जहां तक सहयोग का मसला है उसकी जरूरत पहले भी होती थी किंतु अब यह ज्यादा जरूरी हो गया है, क्योंकि एक तो महिलाओं के काम का दायरा बढ़ गया है तथा दूसरे पूरा पारिवारिक ढांचा बदल गया है। आमतौर पर घर के अंदर काम की जिम्मेदारी औरत के पास तथा बाहर के काम की जिम्मेदारी पुरुष के पास होती थी। गैर बराबरी के खिलाफ जंग में औरत ने बाहर के काम पर दावा ठोंका और जहां-जहां अवसर हासिल होता गया वह साबित करती गई कि वह उस काम को कर सकती है। अब स्वाभाविक ही है कि घर के अंदर के काम में पुरुष के हिस्सेदारी की मांग बनेगी और देर-सबेर पुरुष को यह काम करना होगा अन्यथा यह परिवार में तनाव का कारण भी बनेगा। इस मुद्दे के एक दूसरे पहलू पर भी विचार किया जाना चाहिए। चाइल्ड केयर लीव सिर्फ स्थायी सरकारी कर्मचारी के लिए है। यदि विश्विद्यालय के संदर्भ में इसे देखें तो जिन शिक्षिकाओं की छुट्टी के दौरान तदर्थ या गेस्ट लेक्चरर की नियुक्ति होगी उसमें भी महिला टीचर होगी। चाइल्ड केयर लीव तो उन्हें नहीं ही मिलेगी, क्योंकि वे स्थायी नहीं हैं, लेकिन विश्वविद्यालय के पास उनके मातृत्व अवकाश के लिए भी कोई स्पष्ट नीति नहीं है। ज्ञात हो कि ये नियुक्तियां कुछ-कुछ महीनों के लिए ही होती हैं। जो टीचर कई कई वर्षो से तदर्थ तौर पर पढ़ा रही है उनका सर्विस भी ब्रेक करके नियमानुसार पुनर्नियुक्ति दी जाती है। लिहाजा, वे मातृत्व अवकाश का कानूनी हकदार नहीं बन पाती हैं। महिलाओं का यह उत्पीड़न शिक्षण संस्थाओं में बदस्तूर जारी है। यद्यपि 15 दिन के लिए पिताओं को भी पितृत्व अवकाश का कानूनी प्रावधान है, किंतु आमतौर पर इसके प्रति जागरूकता की कमी है। पिता ऐसी छुट्टी मांगने से संकोच करते हैं और प्राइवेट कंपनियां छुट्टी देती भी नहीं हैं। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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