Showing posts with label दिल्ली. Show all posts
Showing posts with label दिल्ली. Show all posts

Wednesday, June 1, 2011

माताओं के स्वास्थ्य की अनदेखी


तीव्र आर्थिक विकास के बावजूद भारत में माताओं की स्थिति अच्छी नहीं है। माताओं की स्थिति पर तैयार की गई 79 अल्प विकसित देशों की रैंकिंग में भारत का स्थान 75वां है। हालत यह है कि भारतीय माताओं की स्थिति बोत्सवाना, कांगो और कैमरून जैसे पिछड़े दक्षिण एशियाई देशों से भी बुरी है। हमारे नीति-निर्माता ऊंची विकास दर का हवाला देकर देश के तेजी से तरक्की करने का विश्वास दिलाते रहते हैं, लेकिन यह दावा समूची आबादी के संदर्भ में लागू नहीं होता। संयुक्त राष्ट्र के अध्ययन के मुताबिक भारत में हर साल अड़सठ हजार महिलाएं गर्भावस्था से जुड़ी दिक्कतों या प्रसव के दौरान दम तोड़ देती हैं। गौरतलब है कि पिछले साल भारत इस मामले में 73वें पायदान पर था जबकि इस बार दो स्थान और नीचे खिसक गया है। जाहिर है, देश की प्राथमिकताओं में महिलाओं का स्वास्थ्य शामिल नहीं है। भारत में मातृ मृत्यु दर प्रति एक लाख जीवित जन्म पर 254 है। भारत का स्थान हिंसाग्रस्त अफ्रीकी देशों केन्या और कांगो से भी नीचे है। भारत उन देशों में शामिल है जहां स्वास्थ्य संबंधी देखभाल में भारत में अंतरराष्ट्रीय मापदंडों को लागू करने में परेशानी आती है। एचआरडब्ल्यू की यह रिपोर्ट भारत में मातृ स्वास्थ्य के प्रति बरती जाने वाली लापरवाही की ओर संकेत कर रही है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वाच के मुताबिक, सरकार स्वास्थ्य क्लीनिकों और अस्पतालों में होने वाले प्रसूति आंकड़े रखती है, लेकिन ये अस्पताल अक्सर संसाधनों की भारी कमी से जूझ रहे होते हैं। बहुत सी महिलाएं प्रसूति के बाद या तो मर जाती हैं या गंभीर रूप से बीमार हो जाती हैं। संगठन की रिपोर्ट कहती है कि भारत सरकार इस बात की निगरानी नहीं करती कि प्रसूति के बाद इन महिलाओं के साथ क्या हुआ? इस जानकारी के बिना सरकार उन महिलाओं को नहीं बचा सकती जो घर जाने के बाद दम तोड़ देती हैं या फिर दीर्घकालिक अस्वस्थता से ग्रसित हो जाती हैं। एचआरडब्ल्यू के मुताबिक अगर भारत मांओं को स्वस्थ रखना चाहता है तो इसके लिए आवश्यक है कि वह यह सुनिश्चित करे कि गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं से पीड़ित महिलाएं वास्तव में जरूरी उपचार हासिल कर पा रही हैं या नही या प्रसूति के बाद भी वे जिंदा रहती हैं या नहीं। यूनिसेफ ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में मां बनने वाली एक लाख महिलाओं में दो सौ तीस की मौत हो जाती है। देश में पैंसठ प्रतिशत प्रसव अब भी घरों में या अप्रशिक्षित दाइयों की देख-रेख में होते हैं। यह अफसोसजनक स्थिति जननी सुरक्षा जैसी कई योजनाओं के बावजूद बनी हुई है। ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत गांवों के लिए बजट में बढ़ोतरी की गई है, लेकिन आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र चिकित्सकों की कमी से जूझ रहे हैं। देश में अधिकतर अस्पतालों में स्त्री रोग विशेषज्ञों के पद खाली हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 74,500 मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (एक्रिडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट) की और 21,066 आग्जिलरी नर्स मिडवाइफ्स (एएनएम) की कमी है। सरकारी मानदंडों के अनुसार मैदानी इलाकों में 1000 की आबादी पर एक स्वास्थ्य कार्यकत्र्ता और 5000 की आबादी पर एक एएनएम होनी चाहिए। बकौल सेव द चिल्ड्रन की डायरेक्टर ऑफ एडवोकेसी महिलाओं के स्वास्थ्य का संबंध उनकी शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति से है। भारत में हर साल हजारों महिलाएं केवल इसलिए मौत के मुंह में समा जाती हैं क्योंकि उनकी पहुंच मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाओं तक नहीं हो पाती।
भारतीय महिलाओं में साक्षरता एवं जागरूकता की कमी के चलते वे बच्चों तथा स्वयं की समस्याओं को समझने में भी असमर्थ हैं जो मातृ एवं बाल मृत्यु को बढ़ावा देने का प्रमुख कारण है। परिवार और समाज में दोयम दज्रे की नागरिकता के चलते गर्भावस्था काल में महिलाओं की सेहत की फिक्र परिवार के सदस्यों को नहीं होती। भारत की गिनती विश्व के उन देशों में होती है जहां स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च सबसे कम होता है जिसका खमियाजा आर्थिक तौर पर कमजोर परिवार को भुगतान पड़ता है। भारत में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च जीडीपी के एक प्रतिशत के आसपास है जबकि श्रीलंका, चीन और ब्राजील में इसका लगभग तीन गुना है। इसलिए आवश्यकता है कि स्वास्थ्य मद में इजाफा हो, साथ ही ऐसी नीतियों का निर्माण किया जाए जिससे देश की जननियों का जीवन सुरक्षित हो सके।

Monday, March 7, 2011

अलग हैं इंडिया और भारत के महिला सशक्तीकरण


महिला सशक्तिकरण के तमाम दावों के बावजूद आज भी महिलाओं को व्यावहारिक स्तर पर कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। आज हर क्षेत्र में महिलाओं की मौजूदगी पुरुषों को टक्कर दे रही हैं। पिछले कुछ सालों में कामकाजी महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है। इसके बावजूद पुरुष मानसिकता अब भी इस बदलाव को पूरी तरह पचा नहीं पा रही है। दरअसल, अस्मिता और सामाजिक सरोकार का संघर्ष हमेशा से चलता आया है। संक्रमण के इस दौर में नारी दोराहे पर खड़ी है। वह अस्मिता और सामाजिक सरोकार के संघर्ष में उन्हें संतुलन बिठाते हुए आगे बढ़ना है। वहीं महिला सशक्तीकरण के तमाम नारों के बावजूद सामाजिक संतुलन में पुरुष विमर्श हावी रहा है। जब महिला परिधि से केंद्र की ओर आएगी तो पुरुषों का गुस्सा स्वाभाविक है। महिलाओं को व्यावहारिक जीवन में जिन दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, वह इस गुस्से की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। इन सबके बावजूद मेरा मानना है कि स्थितियां बदलेंगी। थोड़ा वक्त लगेगा। हमें यह भी याद रखना होगा अच्छे-बुरे की परिभाषाएं स्थितियों के सापेक्ष बदलती रहती हैं। यानी यह निश्चित नहीं है कि आज का सत्तावान कल भी उसी रूप में रहे। आज अगर पुरुष केंद्र में हैं और महिलाएं परिधि पर, तो ऐसा सम्भव नहीं है कि यही स्थिति हमेशा बरकरार रहे। अब सवाल उठता है कि जो महिलाओं के पक्ष में जो बदलाव हो रहा है, वह कितना सही है? सशक्तीकरण के साथ खुलापन बढ़ रहा है और एक तरह से सांस्कृतिक असंतुलन कायम हो रहा है। यह देश मुख्य तौर पर दो भागों में बंटा हुआ है। एक तरफ महानगरों में रहने वाला और हर तरह से सम्पन्न इंडिया है। वहीं दूसरी तरफ गांवों में रहने वाले और बुनियादी जरूरतों को भी पूरा करने के संघर्ष में शामिल भारत है। भारत का मतलब अब भी थोड़ी धीमी चाल है। यहां अब भी रूढ़ियों और संस्कारों के आधार पर सम्बंधों का निर्वाह हो रहा है। वहीं इंडिया के मापदंड अलग हैं। ऐसे में महिलाओं की स्थिति में दोनों वगरें में बदलाव की स्थितियां भी स्वाभाविक तौर पर अलग हैं। इस दशा में बढ़ते खुलेपन व सांस्कृतिक असंतुलन को लेकर भी स्थितियां अलग- अलग हैं। पर इन दोनों वर्ग के बीच भी भारत में एक वर्ग उभर रहा है। इसे बौद्धिक वर्ग का नाम दिया जा सकता है। यह समाज और दुनिया में हो रहे बदलावों पर आलोचनात्मक रुख अपनाते हुए बातचीत करता है। कई स्तर पर हो रहे बदलावों की स्वीकारता भी है तो गलत लगने पर यह वर्ग किसी बदलाव को खारिज करने में भी पीछे नहीं हटता है। सही मायने में महिलाओं का सशक्तीकरण इसी वर्ग में हो रहा है और यही वर्ग वास्तविक सशक्तीकरण को गति देने का काम कर रहा है और आगे भी करेगा। जिस वर्ग में तथाकथित सशक्तीकरण के नाम पर खुलापन या सांस्कृतिक असंतुलन बढ़ने की बात हो रही है, वह इंडिया का वर्ग है और यह वर्ग उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण से संचालित हो रहा है। इन तीनों शब्दों के अंग्रेजी प्रतिरूप के पहले अक्षर को लें तो शब्द बनता है एलपीजी। अगर आप एलपीजी का इस्तेमाल सही ढंग से रसोई में करते हैं तो इससे खाना पकता है पर अगर आप इसका गलत इस्तेमाल करें तो इसमें विस्फोट भी हो सकता है। ऐसे में इंडिया में सशक्तीकरण के नाम पर जिस तरह की सतही जिंदगी लोग जी रहे हैं, वह तो किसी भी वक्त खतरनाक साबित हो सकता है। यह वर्ग ऐसा है जो वर्चुअल दुनिया में जी रहा है। ऐसी स्थिति में सशक्तीकरण का मतलब अनुकरण हो जाता है और फिल्मों-टीवी पर दिखने वाली अभिनेत्रियां आदर्श बन जाती हैं। सही मायने में सशक्तीकरण की स्थिति तो वह है जब अस्मिता से ज्ञान पैदा हो। सशक्तीकरण भेड़चाल नहीं है। यह तब होता है जब अपने समाज से आलोचनात्मक दृष्टि के साथ जुड़ते हैं। देखा जाए तो महिला सशक्तीकरण के मामले में हम नारे से खेल रहे हैं। इसमें तत्व नहीं है। सशक्तीकरण विचार स्तर पर तो है लेकिन व्यवहार में नहीं। (लेखिका प्रख्यात समाजशास्त्री हैं)


Wednesday, March 2, 2011

स्त्री विरोधी वक्तव्य


सभ्य समाज में यह कल्पना नहीं की जा सकती कि कोई भद्र व्यक्ति किसी महिला पायलट को यह कह कर अपमानित करेगा कि इनसे घर तो संभाला नहीं जाता, ये हवाई जहाज क्या उड़ाएंगी? दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर एक निजी एयरलाइंस से मुम्बई जा रहे प्रमोद नाम के यात्री ने यह सुनते ही हड़कम्प मचा दिया कि फ्लाइट की पायलट महिला है। कोई आदमी इतनी छोटी और दकियानूस सोच के साथ आज के समाज में कैसे रह सकता है जिसके अनुसार महिलाओं का काम केवल घर संभालना ही है? दुनिया भर के सरकारी और कारपोरेट्स में जिस तेजी के साथ औरतें अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन कर रही हैं, उन्हें देखते हुए तो यह कहना गलत नहीं लगता कि आने वाला समय औरतों का ही है। एक ऐसा पुरुष जो घरेलू यात्रा के लिए भी हवाई मार्ग चुनता है, उसे अपढ़ तो नहीं माना जा सकता, फिर उसको महिलाओं की सफलता को लेकर कोई संदेह क्यों होता है? तय रूप से हवाई जहाज उड़ाना कोई साधारण ड्राइविंग सरीखा काम नहीं है, न ही एयर पायलट ब्लू लाइन बसों के कोई ड्राइवर होते हैं जो अपने नौसिखिएपन और उपद्रवी स्वभाव का प्रदर्शन सड़कों पर करते हुए दो-चार को कुचलकर मारने को स्वतंत्र होते हैं। प्रखर मेधा, कड़े अनुभवों और जटिल परीक्षा तथा परीक्षणों के बाद ही कोई पायलट या को-पायलट होता है। इसलिए उस यात्री का यह वक्तव्य दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं, स्त्री विरोधी भी है, जो उनको घर संभालने में उलझाए रखने की नीयत से बोला गया। दूसरे, महिला पायलट की क्षमता को कमतर आंकने और उसका सार्वजनिक उपहास करने के खिलाफ भी उस यात्री पर कार्रवाई होनी चाहिए। महिला आयोग की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह तमाम प्रोफेशनल महिलाओं के सम्मान की रक्षा में, इस व्यक्ति पर मानहानि का मामला दायर करे। पता नहीं क्या सोच कर निजी एयरलाइंस के कम्पनी प्रबंधन ने ऐसी अभद्र टिप्पणी करने वाले के खिलाफ शिकायत तक नहीं दर्ज करायी? यह कहना जायज नहीं लगता कि काफी समझाने-बुझाने के बाद उसने माफी मांग ली थी। उसकी यह सोच काफी खतरनाक और स्त्री विरोधी है। खतरा इसी नकारात्मक और रूढ़िग्रस्त सोच से है। लिहाजा, इसको जड़ से उखाड़ फेंकने और सकारात्मक रूप से इसका इलाज किये जाने की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में इस तरह की विचारधारा वालों को बिना किसी चेतावनी के छोड़ना संक्रमण को लगातार पनपते रहने की गुंजाइश देना ही है। ऐसा जरूर है कि पुरुषों में कहीं न कहीं स्त्रियों को प्रतिस्पद्र्धी के तौर पर देखने की प्रवृत्ति नजर आती है परंतु प्रतिस्पर्धा काम और क्षमताओं को लेकर हो तो उत्पादकता के लिए बेहतर साबित हो सकती है।


Saturday, February 5, 2011

जननी सुरक्षा योजना भी नहीं सुरक्षित


पि छले दिनों एक घटना में मध्यप्रदेश के बरमानी जिला सरकारी अस्पताल के बाहर वेपारी बाई की मौत पर आदिवासी इकट्ठे हुए। उन्होंने सरकार के खिलाफ अपना रोष प्रगट करने के लिए यह स्थान इसलिए चुना क्योंकि उनका आरोप था कि 22 वर्षीय गर्भवती बेपारी की मौत सरकारी मेडिकल अधिकारियों की संवेदनहीनता और लापरवाही के कारण हुई। आठ माह की गर्भवती वेपारी बाई का अचानक रक्तचाप बढ़ा और उसकी जान खतरे में नजर आने लगा। उसके गांव बान से नजदीकी प्राइमरी हेल्थ सेंटर करीब दस किलोमीटर की दूरी पर था। रिश्तेदार उसको वहां ले गए पर वहां बताया गया कि इस सेंटर में वे उपकरण नहीं हैं जो उसके इलाज के लिए होने चाहिए। लिहाजा बेपारी को एक एंबुलेंस में वहां से कम्युनिटी हेल्थ सेंटर भेज दिया गया। वहां भी इलाज करने की बजाए मेडिकल कर्मियों द्वारा उसे जिला सरकारी अस्पताल ले जाने के लिए कहा गया और जिला अस्पताल में भी उसके इलाज में लापरवाही बरती गई। अल्ट्रासांउड बाहर से कराने के लिए कहा गया जबकि यह सुविधा सरकारी अस्पताल में भी उपलब्ध थी। बाद में डाक्टरों ने परिजनों से वेपारी बाई को इंदौर ले जाने को कहा। परिजनों के ऐसा करने से इंकार करने पर अस्पताल ने स्पष्ट कर दिया कि कुछ भी बुरा घटने पर उसके लिए अस्पताल नहीं बल्कि परिजन जिम्मेदार होंगे। कुछ घंटों के बाद वेपारी बाई ने दम तोड़ दिया। जरूरी नहीं कि हर ऐसी घटना पर लोग सरकारी अस्पतालों के बाहर धरने के लिए इकट्ठे हों। यह भी जरूरी नहीं कि हर ऐसी घटना सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हो व मीडिया में आए। लेकिन ऐसी संवेदनहीन और लापरवाही की अनगिनत घटनाएं रोजाना अपने देश में होती रहती हैं। गाहे-बगाहे रिपोर्टें व स्वास्थ्य कार्यकर्ता ऐसी असलियत से हमें रूबरू कराते रहते हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की चार महीने पहले जारी रिपोर्ट के अनुसार मातृत्व मृत्यु दर प्रति लाख 254 है लेकिन गैर- सरकारी संस्थाओं के अनुसार असल में यह आंकड़ा ज्यादा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार भारत में एक लाख शिशुओं के जन्म के पीछे 300 माताओं की मौत हो जाती है। यह मातृत्व मृत्यु दर चिंताजनक है। सरकार की कोशिश प्रसव के दौरान होने वाली मातृ मृत्यु दर को तीन चौथाई घटाना है। यह लक्ष्य सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य के तहत 2015 तक पूरा करना है। सवाल है कि क्या भारत इस लक्ष्य को तय अवधि में हासिल कर लेगा? क्योंकि जननी सुरक्षा योजना के अपेक्षित नतीजे सामने नहीं आ रहे हैं। सनद रहे कि केंद्र सरकार ने संस्थागत प्रसव कराने के लिए महिलाओं को प्रोत्साहित करने व मातृत्व मृत्यु दर पर नियंतण्ररखने और मातृत्व स्वास्थ्य में सुधार जैसे व्यापक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए देश में जननी सुरक्षा योजना शुरू की थी। इस योजना के अंतर्गत शिशुओं को जन्म देने के लिए महिलाओं को नकदी प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है। लेकिन इस योजना पर कारगर तरीके से अमल नहीं हो रहा। कई राज्यों में 19 साल से कम उम्र की गर्भवती व दो बच्चों की माओं को इस योजना में शामिल नहीं किया गया है। मध्यप्रदेश में वर्ण-व्यवस्था भी इसकी राह में रोड़ा साबित हो रही है। यहां एएनएम व आशा कार्यकर्ता जिनका काम सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों को गरीब जनता तक पहुंचाना है, ही अक्सर गर्भवती दलित महिलाओं के साथ भेदभाव करती हैं। वे कभी-कभार ही दलित बस्तियों का दौरा करती हैं। दलित महिलाएं जननी सुरक्षा योजना से मिलने वाली रकम का एक बहुत बड़ा हिस्सा एएनएम व डाक्टरों को रिश्वत देने में खर्च कर देती हैं। प्रसंगवश हरियाणा के एक गांव के दलितों ने बताया कि सरकारी कल्याणकारी कार्यक्रम चाहे वे जननीतियों से जुड़े हों या उनके मवेशियों के बावत- कोई सरकारी सूचना, उन तक पहुंचती ही नहीं। कारण उनके टोले (मोहल्ले) गांवों में पीछे की ओर होते हैं और ऐसी योजनाओं की मुनादी करने वाला वहां नहीं आता। ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में भी जननी सुरक्षा योजना के वांंिछत नतीजे नजर नहीं आते। दरअसल इस राज्य में जिला स्तर के बाद ऐसी मौतों की जानकारी मिलना भी एक समस्या है। यहां न तो कोई शिकायत तंत्र है और न ही दुरुस्त आपातकालीन व्यवस्था। स्थितियां इतनी खराब हैं कि संस्थागत प्रसव होने के बाद फॉलो-अप करने की कोशिश तक नहीं की जाती। महिला को किस तरह की देखभाल उपलब्ध कराई जा रही है, इस बाबत भी कोई सूचना उपलब्ध नहीं हैं। राज्य में माओं की मृत्यु संबंधी विस्तृत दस्तावेज नहीं हैं। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को गर्भावस्था से सीधे संबंध रखने वाली या प्रसव से जुड़ी और प्रसव के 6 से 8 घंटे के भीतर हुई मौतों का रिकार्ड रखने को कहा जाता है। नवम्बर 2008 से अगस्त 2009 के दरम्यान इस राज्य में किये गये गई शोध के मुताबिक देश के सबसे बड़े इस राज्य में आबादी के अनुपात में सामुदायिक स्वास्थ्य केद्रों की संख्या कम है। इन केद्रों में एक तिहाई के पास पूर्णकालिक प्रसव कराने वाले विशेषज्ञ या स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं। प्रसव संबधी फस्ट एड के लिए दवाइयों की कमी अक्सर बनी रहती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार द्वारा गर्भवती महिलाओं को दी जाने वाली चिकित्सीय सेवाओं के बीच गहरा फासला है। सही समय पर चिकित्सीय सहायता न मिलने से कई तरह की जटिलताएं बढ़ती हैं। उत्तम संस्थागत प्रसूति व्यवस्था एक गर्भवती महिला को तब तक नहीं बचा सकती जब तक शिशु को जन्म देने के फौरन बाद अर्थात 24-72 घंटों के दौरान उसकी समुचित देखभाल न की जाए। जटिल मामलों का फॉलो-अप भी जरूरी है,जो वास्तव में बहुत कम मामलों में होता है। संस्थागत प्रसव कराने का मकसद मातृत्व मृत्यु दर में कमी लाना था लेकिन राष्ट्रीय स्वास्थ्य सव्रेक्षण 3 के अनुसार सबसे गरीब महिलाओं में से सिर्फ 13 प्रतिशत और 18 प्रतिशत अनपढ़ अथवा अनुसूचित आदिवासी महिलाएं प्रसव के लिए संस्थागत सेवा का इस्तेमाल करती हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन 2005 में शुरू किया गया और इस मिशन के दिशा-निर्देशों के अनुसार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और जिला अस्पताल के बीच स्थित प्रत्येक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव सेवा की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके अलावा अन्य आपातकालीन सेवाएं भी उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व हैं। पर कहीं आधी-अधूरी सेवा उपलब्ध है तो कहीं मरीज का इलाज करने वाले असंवेदनशील और लापरवाह। औरतों की सेहत के प्रति सामाजिक नजरिए की हमेशा आलोचना हुई है तो सरकारी नजरिए में भी खोट है। एक तरफ सरकारी अस्पतालों की यह हालत तो दूसरी तरफ महंगी चिकित्सा सेवा की मार गरीब तबके की महिलाओं पर खास असर छोड़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि भारी मेडिकल बिलों को न चुकाने के कारण लोग घोर गरीबी की ओर बढ़ रहे हैं। यह चिंतनीय पहलू है जो गरीबी औरतों की जिंदगी पर अलग तरह का प्रतिकूल प्रभाव छोड़ती है। वह अपने पर खर्च होने वाली रकम में कटौती कर परिवार पर खर्च करना अपना धर्म समझती है और निभाती भी है। परिवार के ढांचे में उसके इस धर्म की खूब तारीफ होती है। और सरकार क्या करती है? योजनाओं का शुभारम्भ और उसके बाद सुस्त पड़ना उसके स्वभाव का एक हिस्सा बन गया है। दरकार इस मोर्चे पर सरकार की तरफ से दीर्घकालिक रणनीति अपनाने व सख्ती से उस पर अमल करने की है।


Sunday, January 23, 2011

क्यों न हो अपनी पहचान की चिंता


जापान की 75 वर्षीय महिला क्योको तुकोमोतो कहती हैं कि उनका अपने पति के प्रति प्रेम कम नहीं हुआ है और ही उनका उनसे कोई विरोध है लेकिन उन्हें अपने नाम के साथ अपने पति का उपनाम जोड़ने का कोई तुक समझ में नहीं आता है। इसलिए वह अब पचास साल बाद इसका विरोध कर रही हैं। गौरतलब है कि जापान में हर विवाहित महिला को अपने नाम के साथ पति का उपनाम जोड़ना कानूनन अनिवार्य है। तुकोमोतो ने इसके विरोध की पहल की और इस अभियान में आज अन्य महिलाएं भी उनसे जुड़ने लगी हैं। उनकी फरवरी में इस कानून के खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर करने की योजना है। तुकोमातो कहती हैं कि यह मामला सिर्फ पसन्दगी का नहीं है बल्कि आत्मसम्मान के साथ भी जुड़ा है। उनकी ख्वाहिश है कि बस मरने से पहले उनके नाम से पति का उपनाम हट जाए। याद रहे 1850 के दशक में शुरू हुए स्त्रियों के मताधिकार आन्दोलन की प्रणोता रही ल्यूसी स्टोन ने उस समय महिलाओं से अपील की थी कि महिलाएं शादी के बाद अपना पुराने नाम बनाये रखें। ये छोटी छोटी लगनेवाली बातें आन्दोलन के एजेंडा पर यूं ही नहीं आयी हैं बल्कि इसका रिश्ता औरत के लिए बनाये जानेवाली उसकी स्वतंत्र पहचान तथा अस्तित्व से जुड़ा होता है। किसी भी तबके के दोयम दज्रे की स्थिति कई छोटी छोटी चीजों को मिला कर बनती है जो धीरे-धीरे सोच, परम्परा और संस्कृति का हिस्सा बन जाती है। जापान की तरह हमारे यहां हालांकि पति का नाम साथ में जोड़ना कानूनन अनिवार्य नहीं है लेकिन रवायत यही है कि शादी के बाद महिलाओं के नाम के आगे पति का उपनाम जुड़ जाता है। अब कुछ शहरों में अपने- अपने स्तरों से महिलाएं इसका प्रतिरोध करना शुरू कर रही हैं। कई सिर्फ अपना ही नाम रखती हैं तो कुछ पति के साथ अपने पिता का उपमान भी इस्तेमाल करती हैं। एक मित्र कहती हैं कि सारे सरनेम तो पुरुष के ही हैं। चाहे पिता का हो या पति का। यदि नाम के साथ उपनाम लगाना ही हो तो जिसे बचपन से जानते हैं, उसी का दावा अधिक बनता है। इसी तरह नाम के शुरू में शादी के बाद श्रीमती जुड़ जाता है। महिलाओं के लिए शादी की पहचान श्रीमती और उपनाम के अलावा अन्य प्रतीकों जैसे सिन्दूर, मंगलसूत्र आदि के माध्यम से भी होती है। जबकि पुरुष की पहचान अपने जीवनभर के लिए स्थायी या शाश्वत होती है। यह स्थायित्व तथा अपनी पहचान स्व की अनुभूति कराते हैं जिसमें सम्मान के साथ खुद पर भरोसे की भी बात होती है। पता नहीं क्यों पश्चिम के देशों में भी जो ज्यादा विकसित माने जाते हैं तथा जहां महिला आन्दोलन पहले शुरू हुआ, वहां भी महिलाएं आज तक इस मानसिकता से मुक्त नहीं हो पायी हैं। बड़ी शख्सियतें भी अपने पतियों के उपनाम से पहचानी जाती है जैसे मिशेल ओबामा, हिलेरी क्लिन्टन इत्यादि। उन्हें भी मानो अपनी पहचान खोने का कोई गम नहीं है और पति की पहचान में समा जाने को ही वह आदर्श मान लेती हैं। हमारे एक भारतीय परिचित ने जब एक जर्मन महिला से शादी की तो वह अपने बदले हुए नाम के साथ ही हमें पहली बार मिलीं। जिस तरह अधिकतर समाज अपने यहां औरत के लिए पूर्ण बराबरी का समाज नहीं बना पाए है, उसी का प्रतिबिम्बन इसमें दिखता है। औरत की मानसिक बनावट और सोच भी इसी समाज की उपज है। कुछ समय पहले यह प्रश्न सुर्खियों में था, जब ब्रिटेन के मशहूर टैबलॉयड अखबारसनकी सम्पादक तथा एक अन्तरराष्ट्रीय मीडिया कम्पनी की चीफ एक्जिक्यूटिव होने वाली रेबेका वाड ने अपनी शादी के बाद अपने पति का सरनेम अपनाने का फैसला लिया था। मालूम हो कि पिछले दिनों सुश्री रेबेका ने दूसरी शादी की और वह रेबेका ब्रुक्स बन गयीं। उनके वर्तमान पति का नाम चार्ल्स ब्रुक्स है। उन्होंने अपने ईमेल के जरिए लोगों को अपने बदले नाम की सूचना भी दी तथा सम्बधित लोगों के लिए बाकायदा अपने मैरिज सर्टिफिकेट की कापी भी भेजी है। जाहिर है कि रेबेका का यह नामान्तरण नारी स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत रही तमाम महिलाओं के लिए एक झटके के रूप में ही सामने आया। हमारे देश में भी अस्सी के दशक में उभरा नारी स्वातंत्र्य आन्दोलन जिसे नारी आन्दोलन का सेकेंड वेव भी कहते हैं, ने औरत की सामाजिक स्थिति को बदलने के लिए जबरदस्त संघर्ष किया। इस दौर में वह औरत के खिलाफ घटनेवाली घटनाओं के विरोध में तो वे सड़कों पर उतरी हीं, धरना, प्रदर्शन आदि किया ही लेकिन औरत की स्वतंत्र पहचान बनाने का प्रयास भी किया। ऐसा नहीं था कि सिर्फ स्त्री आन्दोलन से जुड़ी ताकतों ने ही यह लड़ाई लड़ी। वामपंथी शक्तियां भी इसमें पूरी तरह सक्रिय रहीं। इसके तहत इन प्रगतिशील ताकतों ने औरत की स्थिति में बदलाव के लिए अनेक परम्पराओं को भी चुनौती दी, मसलन शादीशुदा महिलाओं ने शादी के प्रतीक जैसे सिन्दूर, लाल-हरी चूडियां आदि नहीं पहनने, दहेज का लेन-देन करने पर जोर दिया। ऐसे व्रत-त्योहारों को मनाना छोड़ दिया जो स्त्री की गुलामी का महिमामंडन करते हों। परदा प्रथा का त्याग किया, आदि। आज कई बार यह देखने को मिलता है कि जिन महिलाओं ने यह लड़ाइयां लड़ीं, उन्होंने सिर्फ अपना स्वतंत्र अस्तित्व और पहचान बनायी बल्कि पूरी औरत जमात को यह सन्देश दिया कि वे भी अपने जीवन में न्याय और बराबरी के लिए प्रयास करें। लेकिन आज उन्हीं की सन्तानें या नई पीढ़ी की अनेक लड़कियां उस परम्परावादी जीवन शैली को अपनाने से परहेज भी नहीं रखती हैं जिससे उबरने के लिए एक पीढ़ी आज भी संघर्षरत है। नारी आन्दोलन में लम्बे समय से सक्रिय एक मित्र की बेटी ने बिना किसी संकोच गृहिणी बनने की इच्छा जाहिर की। आजकल इस तरह के किसी भी मामले को आसानी से चॉइस यानी अपनी इच्छानुसार चुनाव का मामला बना दिया जाता है। बहरहाल इसे नयी पीढ़ी का स्मृतिलोप कहें या कुछ और, लेकिन इस पीढ़ी को शायद यह एहसास नहीं दिखता कि औरत ने सार्वजनिक दायरे में आने के लिए दशकों तक संघर्ष किया है। क्योंकि एक दौर में उसके लिए बाहर की दुनिया में जगह बनाने के लिए तो उनका परिवार तैयार था, ही समाज और ही सरकारों ने अपनी नीतियों में कोई ऐसी पहल की जिससे औरत को बाहर निकलने के लिए प्रोत्साहन मिले। सरकारों ने तो तभी कुछ दिया जब महिलाओं ने उन पर दबाव बनाया। परिवार के अन्दर कमानेवाली सदस्य की हैसियत हासिल करना तथा साथ में समाज में भी यह सन्देश देना कि वह हर काम करने में सक्षम है। बिना बराबर के योगदान के बराबर की हैसियत किसी को नहीं मिलती। यद्यपि घर के अन्दर का काम उन्हीं के हिस्से होता था, लेकिन यह सत्य है कि जिस काम के बदले कोई पैसा नहीं मिलता है उसकी गिनती काम में नहीं होती है। इन बिना पैसेवाले कामों का मूल्य हम सिर्फ अपनी चाहत से नहीं बढ़ा सकते बल्कि इसके लिए अन्दर और बाहर दोनों कामों का स्त्री-पुरूष के बीच बंटवारा करना होगा। इसीलिए महिलाओं ने जब तक स्थिति नहीं बदलती तब तक दोहरा बोझ उठाना स्वीकार किया। लेकिन आज की पीढ़ी, जिसे तुलनात्मक रूप से आसानी से पढ़ना-लिखना तथा खुद को विकसित करने का अवसर मिल पाया है, वह अपने परिश्रम तथा व्यवहार से अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए तत्पर नजर नहीं रही है। यदि सब कुछ सामान्य हो गया होता, औरत अपने हालात में संकटों की दहलीज पार कर गयी होती यानी समाज स्त्रीद्रोही नहीं होता और समानता कायम हो चुकी होती तो पीछे जाना उतना चिन्तनीय नहीं होता। लेकिन अभी तो शायद दशकों और लगेंगे पथ-प्रशस्त होने में।