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Wednesday, June 1, 2011

माताओं के स्वास्थ्य की अनदेखी


तीव्र आर्थिक विकास के बावजूद भारत में माताओं की स्थिति अच्छी नहीं है। माताओं की स्थिति पर तैयार की गई 79 अल्प विकसित देशों की रैंकिंग में भारत का स्थान 75वां है। हालत यह है कि भारतीय माताओं की स्थिति बोत्सवाना, कांगो और कैमरून जैसे पिछड़े दक्षिण एशियाई देशों से भी बुरी है। हमारे नीति-निर्माता ऊंची विकास दर का हवाला देकर देश के तेजी से तरक्की करने का विश्वास दिलाते रहते हैं, लेकिन यह दावा समूची आबादी के संदर्भ में लागू नहीं होता। संयुक्त राष्ट्र के अध्ययन के मुताबिक भारत में हर साल अड़सठ हजार महिलाएं गर्भावस्था से जुड़ी दिक्कतों या प्रसव के दौरान दम तोड़ देती हैं। गौरतलब है कि पिछले साल भारत इस मामले में 73वें पायदान पर था जबकि इस बार दो स्थान और नीचे खिसक गया है। जाहिर है, देश की प्राथमिकताओं में महिलाओं का स्वास्थ्य शामिल नहीं है। भारत में मातृ मृत्यु दर प्रति एक लाख जीवित जन्म पर 254 है। भारत का स्थान हिंसाग्रस्त अफ्रीकी देशों केन्या और कांगो से भी नीचे है। भारत उन देशों में शामिल है जहां स्वास्थ्य संबंधी देखभाल में भारत में अंतरराष्ट्रीय मापदंडों को लागू करने में परेशानी आती है। एचआरडब्ल्यू की यह रिपोर्ट भारत में मातृ स्वास्थ्य के प्रति बरती जाने वाली लापरवाही की ओर संकेत कर रही है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वाच के मुताबिक, सरकार स्वास्थ्य क्लीनिकों और अस्पतालों में होने वाले प्रसूति आंकड़े रखती है, लेकिन ये अस्पताल अक्सर संसाधनों की भारी कमी से जूझ रहे होते हैं। बहुत सी महिलाएं प्रसूति के बाद या तो मर जाती हैं या गंभीर रूप से बीमार हो जाती हैं। संगठन की रिपोर्ट कहती है कि भारत सरकार इस बात की निगरानी नहीं करती कि प्रसूति के बाद इन महिलाओं के साथ क्या हुआ? इस जानकारी के बिना सरकार उन महिलाओं को नहीं बचा सकती जो घर जाने के बाद दम तोड़ देती हैं या फिर दीर्घकालिक अस्वस्थता से ग्रसित हो जाती हैं। एचआरडब्ल्यू के मुताबिक अगर भारत मांओं को स्वस्थ रखना चाहता है तो इसके लिए आवश्यक है कि वह यह सुनिश्चित करे कि गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं से पीड़ित महिलाएं वास्तव में जरूरी उपचार हासिल कर पा रही हैं या नही या प्रसूति के बाद भी वे जिंदा रहती हैं या नहीं। यूनिसेफ ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में मां बनने वाली एक लाख महिलाओं में दो सौ तीस की मौत हो जाती है। देश में पैंसठ प्रतिशत प्रसव अब भी घरों में या अप्रशिक्षित दाइयों की देख-रेख में होते हैं। यह अफसोसजनक स्थिति जननी सुरक्षा जैसी कई योजनाओं के बावजूद बनी हुई है। ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत गांवों के लिए बजट में बढ़ोतरी की गई है, लेकिन आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र चिकित्सकों की कमी से जूझ रहे हैं। देश में अधिकतर अस्पतालों में स्त्री रोग विशेषज्ञों के पद खाली हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 74,500 मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (एक्रिडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट) की और 21,066 आग्जिलरी नर्स मिडवाइफ्स (एएनएम) की कमी है। सरकारी मानदंडों के अनुसार मैदानी इलाकों में 1000 की आबादी पर एक स्वास्थ्य कार्यकत्र्ता और 5000 की आबादी पर एक एएनएम होनी चाहिए। बकौल सेव द चिल्ड्रन की डायरेक्टर ऑफ एडवोकेसी महिलाओं के स्वास्थ्य का संबंध उनकी शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति से है। भारत में हर साल हजारों महिलाएं केवल इसलिए मौत के मुंह में समा जाती हैं क्योंकि उनकी पहुंच मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाओं तक नहीं हो पाती।
भारतीय महिलाओं में साक्षरता एवं जागरूकता की कमी के चलते वे बच्चों तथा स्वयं की समस्याओं को समझने में भी असमर्थ हैं जो मातृ एवं बाल मृत्यु को बढ़ावा देने का प्रमुख कारण है। परिवार और समाज में दोयम दज्रे की नागरिकता के चलते गर्भावस्था काल में महिलाओं की सेहत की फिक्र परिवार के सदस्यों को नहीं होती। भारत की गिनती विश्व के उन देशों में होती है जहां स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च सबसे कम होता है जिसका खमियाजा आर्थिक तौर पर कमजोर परिवार को भुगतान पड़ता है। भारत में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च जीडीपी के एक प्रतिशत के आसपास है जबकि श्रीलंका, चीन और ब्राजील में इसका लगभग तीन गुना है। इसलिए आवश्यकता है कि स्वास्थ्य मद में इजाफा हो, साथ ही ऐसी नीतियों का निर्माण किया जाए जिससे देश की जननियों का जीवन सुरक्षित हो सके।

Wednesday, March 2, 2011

स्त्री विरोधी वक्तव्य


सभ्य समाज में यह कल्पना नहीं की जा सकती कि कोई भद्र व्यक्ति किसी महिला पायलट को यह कह कर अपमानित करेगा कि इनसे घर तो संभाला नहीं जाता, ये हवाई जहाज क्या उड़ाएंगी? दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर एक निजी एयरलाइंस से मुम्बई जा रहे प्रमोद नाम के यात्री ने यह सुनते ही हड़कम्प मचा दिया कि फ्लाइट की पायलट महिला है। कोई आदमी इतनी छोटी और दकियानूस सोच के साथ आज के समाज में कैसे रह सकता है जिसके अनुसार महिलाओं का काम केवल घर संभालना ही है? दुनिया भर के सरकारी और कारपोरेट्स में जिस तेजी के साथ औरतें अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन कर रही हैं, उन्हें देखते हुए तो यह कहना गलत नहीं लगता कि आने वाला समय औरतों का ही है। एक ऐसा पुरुष जो घरेलू यात्रा के लिए भी हवाई मार्ग चुनता है, उसे अपढ़ तो नहीं माना जा सकता, फिर उसको महिलाओं की सफलता को लेकर कोई संदेह क्यों होता है? तय रूप से हवाई जहाज उड़ाना कोई साधारण ड्राइविंग सरीखा काम नहीं है, न ही एयर पायलट ब्लू लाइन बसों के कोई ड्राइवर होते हैं जो अपने नौसिखिएपन और उपद्रवी स्वभाव का प्रदर्शन सड़कों पर करते हुए दो-चार को कुचलकर मारने को स्वतंत्र होते हैं। प्रखर मेधा, कड़े अनुभवों और जटिल परीक्षा तथा परीक्षणों के बाद ही कोई पायलट या को-पायलट होता है। इसलिए उस यात्री का यह वक्तव्य दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं, स्त्री विरोधी भी है, जो उनको घर संभालने में उलझाए रखने की नीयत से बोला गया। दूसरे, महिला पायलट की क्षमता को कमतर आंकने और उसका सार्वजनिक उपहास करने के खिलाफ भी उस यात्री पर कार्रवाई होनी चाहिए। महिला आयोग की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह तमाम प्रोफेशनल महिलाओं के सम्मान की रक्षा में, इस व्यक्ति पर मानहानि का मामला दायर करे। पता नहीं क्या सोच कर निजी एयरलाइंस के कम्पनी प्रबंधन ने ऐसी अभद्र टिप्पणी करने वाले के खिलाफ शिकायत तक नहीं दर्ज करायी? यह कहना जायज नहीं लगता कि काफी समझाने-बुझाने के बाद उसने माफी मांग ली थी। उसकी यह सोच काफी खतरनाक और स्त्री विरोधी है। खतरा इसी नकारात्मक और रूढ़िग्रस्त सोच से है। लिहाजा, इसको जड़ से उखाड़ फेंकने और सकारात्मक रूप से इसका इलाज किये जाने की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में इस तरह की विचारधारा वालों को बिना किसी चेतावनी के छोड़ना संक्रमण को लगातार पनपते रहने की गुंजाइश देना ही है। ऐसा जरूर है कि पुरुषों में कहीं न कहीं स्त्रियों को प्रतिस्पद्र्धी के तौर पर देखने की प्रवृत्ति नजर आती है परंतु प्रतिस्पर्धा काम और क्षमताओं को लेकर हो तो उत्पादकता के लिए बेहतर साबित हो सकती है।


Saturday, February 5, 2011

जननी सुरक्षा योजना भी नहीं सुरक्षित


पि छले दिनों एक घटना में मध्यप्रदेश के बरमानी जिला सरकारी अस्पताल के बाहर वेपारी बाई की मौत पर आदिवासी इकट्ठे हुए। उन्होंने सरकार के खिलाफ अपना रोष प्रगट करने के लिए यह स्थान इसलिए चुना क्योंकि उनका आरोप था कि 22 वर्षीय गर्भवती बेपारी की मौत सरकारी मेडिकल अधिकारियों की संवेदनहीनता और लापरवाही के कारण हुई। आठ माह की गर्भवती वेपारी बाई का अचानक रक्तचाप बढ़ा और उसकी जान खतरे में नजर आने लगा। उसके गांव बान से नजदीकी प्राइमरी हेल्थ सेंटर करीब दस किलोमीटर की दूरी पर था। रिश्तेदार उसको वहां ले गए पर वहां बताया गया कि इस सेंटर में वे उपकरण नहीं हैं जो उसके इलाज के लिए होने चाहिए। लिहाजा बेपारी को एक एंबुलेंस में वहां से कम्युनिटी हेल्थ सेंटर भेज दिया गया। वहां भी इलाज करने की बजाए मेडिकल कर्मियों द्वारा उसे जिला सरकारी अस्पताल ले जाने के लिए कहा गया और जिला अस्पताल में भी उसके इलाज में लापरवाही बरती गई। अल्ट्रासांउड बाहर से कराने के लिए कहा गया जबकि यह सुविधा सरकारी अस्पताल में भी उपलब्ध थी। बाद में डाक्टरों ने परिजनों से वेपारी बाई को इंदौर ले जाने को कहा। परिजनों के ऐसा करने से इंकार करने पर अस्पताल ने स्पष्ट कर दिया कि कुछ भी बुरा घटने पर उसके लिए अस्पताल नहीं बल्कि परिजन जिम्मेदार होंगे। कुछ घंटों के बाद वेपारी बाई ने दम तोड़ दिया। जरूरी नहीं कि हर ऐसी घटना पर लोग सरकारी अस्पतालों के बाहर धरने के लिए इकट्ठे हों। यह भी जरूरी नहीं कि हर ऐसी घटना सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हो व मीडिया में आए। लेकिन ऐसी संवेदनहीन और लापरवाही की अनगिनत घटनाएं रोजाना अपने देश में होती रहती हैं। गाहे-बगाहे रिपोर्टें व स्वास्थ्य कार्यकर्ता ऐसी असलियत से हमें रूबरू कराते रहते हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की चार महीने पहले जारी रिपोर्ट के अनुसार मातृत्व मृत्यु दर प्रति लाख 254 है लेकिन गैर- सरकारी संस्थाओं के अनुसार असल में यह आंकड़ा ज्यादा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार भारत में एक लाख शिशुओं के जन्म के पीछे 300 माताओं की मौत हो जाती है। यह मातृत्व मृत्यु दर चिंताजनक है। सरकार की कोशिश प्रसव के दौरान होने वाली मातृ मृत्यु दर को तीन चौथाई घटाना है। यह लक्ष्य सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य के तहत 2015 तक पूरा करना है। सवाल है कि क्या भारत इस लक्ष्य को तय अवधि में हासिल कर लेगा? क्योंकि जननी सुरक्षा योजना के अपेक्षित नतीजे सामने नहीं आ रहे हैं। सनद रहे कि केंद्र सरकार ने संस्थागत प्रसव कराने के लिए महिलाओं को प्रोत्साहित करने व मातृत्व मृत्यु दर पर नियंतण्ररखने और मातृत्व स्वास्थ्य में सुधार जैसे व्यापक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए देश में जननी सुरक्षा योजना शुरू की थी। इस योजना के अंतर्गत शिशुओं को जन्म देने के लिए महिलाओं को नकदी प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है। लेकिन इस योजना पर कारगर तरीके से अमल नहीं हो रहा। कई राज्यों में 19 साल से कम उम्र की गर्भवती व दो बच्चों की माओं को इस योजना में शामिल नहीं किया गया है। मध्यप्रदेश में वर्ण-व्यवस्था भी इसकी राह में रोड़ा साबित हो रही है। यहां एएनएम व आशा कार्यकर्ता जिनका काम सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों को गरीब जनता तक पहुंचाना है, ही अक्सर गर्भवती दलित महिलाओं के साथ भेदभाव करती हैं। वे कभी-कभार ही दलित बस्तियों का दौरा करती हैं। दलित महिलाएं जननी सुरक्षा योजना से मिलने वाली रकम का एक बहुत बड़ा हिस्सा एएनएम व डाक्टरों को रिश्वत देने में खर्च कर देती हैं। प्रसंगवश हरियाणा के एक गांव के दलितों ने बताया कि सरकारी कल्याणकारी कार्यक्रम चाहे वे जननीतियों से जुड़े हों या उनके मवेशियों के बावत- कोई सरकारी सूचना, उन तक पहुंचती ही नहीं। कारण उनके टोले (मोहल्ले) गांवों में पीछे की ओर होते हैं और ऐसी योजनाओं की मुनादी करने वाला वहां नहीं आता। ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में भी जननी सुरक्षा योजना के वांंिछत नतीजे नजर नहीं आते। दरअसल इस राज्य में जिला स्तर के बाद ऐसी मौतों की जानकारी मिलना भी एक समस्या है। यहां न तो कोई शिकायत तंत्र है और न ही दुरुस्त आपातकालीन व्यवस्था। स्थितियां इतनी खराब हैं कि संस्थागत प्रसव होने के बाद फॉलो-अप करने की कोशिश तक नहीं की जाती। महिला को किस तरह की देखभाल उपलब्ध कराई जा रही है, इस बाबत भी कोई सूचना उपलब्ध नहीं हैं। राज्य में माओं की मृत्यु संबंधी विस्तृत दस्तावेज नहीं हैं। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को गर्भावस्था से सीधे संबंध रखने वाली या प्रसव से जुड़ी और प्रसव के 6 से 8 घंटे के भीतर हुई मौतों का रिकार्ड रखने को कहा जाता है। नवम्बर 2008 से अगस्त 2009 के दरम्यान इस राज्य में किये गये गई शोध के मुताबिक देश के सबसे बड़े इस राज्य में आबादी के अनुपात में सामुदायिक स्वास्थ्य केद्रों की संख्या कम है। इन केद्रों में एक तिहाई के पास पूर्णकालिक प्रसव कराने वाले विशेषज्ञ या स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं। प्रसव संबधी फस्ट एड के लिए दवाइयों की कमी अक्सर बनी रहती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार द्वारा गर्भवती महिलाओं को दी जाने वाली चिकित्सीय सेवाओं के बीच गहरा फासला है। सही समय पर चिकित्सीय सहायता न मिलने से कई तरह की जटिलताएं बढ़ती हैं। उत्तम संस्थागत प्रसूति व्यवस्था एक गर्भवती महिला को तब तक नहीं बचा सकती जब तक शिशु को जन्म देने के फौरन बाद अर्थात 24-72 घंटों के दौरान उसकी समुचित देखभाल न की जाए। जटिल मामलों का फॉलो-अप भी जरूरी है,जो वास्तव में बहुत कम मामलों में होता है। संस्थागत प्रसव कराने का मकसद मातृत्व मृत्यु दर में कमी लाना था लेकिन राष्ट्रीय स्वास्थ्य सव्रेक्षण 3 के अनुसार सबसे गरीब महिलाओं में से सिर्फ 13 प्रतिशत और 18 प्रतिशत अनपढ़ अथवा अनुसूचित आदिवासी महिलाएं प्रसव के लिए संस्थागत सेवा का इस्तेमाल करती हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन 2005 में शुरू किया गया और इस मिशन के दिशा-निर्देशों के अनुसार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और जिला अस्पताल के बीच स्थित प्रत्येक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव सेवा की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके अलावा अन्य आपातकालीन सेवाएं भी उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व हैं। पर कहीं आधी-अधूरी सेवा उपलब्ध है तो कहीं मरीज का इलाज करने वाले असंवेदनशील और लापरवाह। औरतों की सेहत के प्रति सामाजिक नजरिए की हमेशा आलोचना हुई है तो सरकारी नजरिए में भी खोट है। एक तरफ सरकारी अस्पतालों की यह हालत तो दूसरी तरफ महंगी चिकित्सा सेवा की मार गरीब तबके की महिलाओं पर खास असर छोड़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि भारी मेडिकल बिलों को न चुकाने के कारण लोग घोर गरीबी की ओर बढ़ रहे हैं। यह चिंतनीय पहलू है जो गरीबी औरतों की जिंदगी पर अलग तरह का प्रतिकूल प्रभाव छोड़ती है। वह अपने पर खर्च होने वाली रकम में कटौती कर परिवार पर खर्च करना अपना धर्म समझती है और निभाती भी है। परिवार के ढांचे में उसके इस धर्म की खूब तारीफ होती है। और सरकार क्या करती है? योजनाओं का शुभारम्भ और उसके बाद सुस्त पड़ना उसके स्वभाव का एक हिस्सा बन गया है। दरकार इस मोर्चे पर सरकार की तरफ से दीर्घकालिक रणनीति अपनाने व सख्ती से उस पर अमल करने की है।


Thursday, January 13, 2011

गुजारा भत्ते के प्रति अनिच्छुक महिलाएं

हाल ही में इकॉनॉमिक रिसर्च फाउंडेशन की तरफ से एक अध्ययन रिपोर्ट आयी है जिसके मुताबिक तलाकशुदा महिलाओं में से पचास फीसद यानी आधी ने ही गुजारा भत्ते की मांग अपने पतियों से की है। अध्ययन में यह बताने का प्रयास किया गया है कि कानून में कई खामियों तथा अकार्य क्षमता के बावजूद पचास फीसद महिलाएं गुजारा भत्ते के लिए कानूनी जंग लड़ती हैं जिसके चलते उन्हें बहुत थोड़ी राहत मिल पाती है। फिर भी चूंकि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होती हैं, इसलिए उन्हें यह लड़ाई लड़नी पड़ती है। लेकिन इसी अध्ययन का दूसरा पहलू यह भी है कि लगभग आधी तलाकशुदा महिलाओं ने गुजारा भत्ते की मांग नहीं की है। यद्यपि इसके कारण अलग हैं। जैसे कुछ को अपने इस अधिकार के बारे में पता ही नहीं होता या कुछ कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए धन नहीं जुटा सकती हैं लेकिन कुछ ने स्वेच्छा से यह चुनाव किया है कि वे अपने पूर्व पति पर निर्भर नहीं रहेगी। अध्ययन के लिए आधार बनायी गयी 405 महिलाओं में से 213 ने ही गुजारा भत्ते की मांग की। हालांकि जो महिलाएं गुजारा भत्ते पर निर्भर होती हैं, वे अपना पहले वाला जीवन स्तर नहीं बनाये रख पाती हैं। कोर्ट द्वारा तय राशि या तो कम होती है या समय बीतने के साथ उसका मूल्य कम होता जाता है। घर चूंकि पति का होता है इसलिए कई तरह की चल-अचल सम्पत्ति उसी के पास रह जाती है। और औरत या तो उस मायके में आसरा लेती है जो कभी उसका अपना घर माना नहीं गया था या वह स्वतन्त्र गृहस्थी बनाती है जिसमें यदि गुजारा भत्ता है तो थोड़ा राहत हो जाती है। गौरतलब है कि जो महिलाएं नौकरीशुदा हैं या जिनकी अपनी आय का स्रेत है, उन्हें कानूनन गुजारा भत्ता नहीं मिलता है। यानी गुजारे की मांग आत्मनिर्भर महिलाएं नहीं करती हैं, लेकिन कम संख्या में ही सही, अब ऐसी महिलाएं भी हैं, जो पहले पति पर निर्भर रही हैं लेकिन अलग होने के बाद स्वनिर्भर हो रही है। इसके कुछ और भी उदाहरण कुछ समय पहले देखने का मिले। मुंबई हाईकोर्ट के एक अध्ययन में, जो तलाक के मामलों पर किया गया था, पाया गया कि फैमिली कोर्ट में बीते जनवरी में तलाक के पांच मामले दायर हुए थे जिसमें एक भी महिला ने गुजारा भत्ता लेने में रुचि नहीं दिखायी। मुम्बई सहित कई अन्य बड़े शहरों में भी यह बात देखने में आयी है। कोर्ट की लम्बी चलने वाली प्रक्रिया के अलावा महिलाओं का आर्थिक रूप से सक्षम होना इसका सबसे बड़ा कारण बताया जाता है। मुंबई फैमिली कोर्ट बार एसोसिएशन की अध्यक्ष निलोफर अख्तर कहती हैं कि पांच साल पहले तक उनके सामने ऐसे मामले कभी नहीं आये। वे बताती हैं कि अब महिलाएं आर्थिक रूप से सक्षम हो रही हैं और उन्हें अपने पूर्व पतियों से आर्थिक मदद की जरूरत नहीं पड़ती है। मुम्बई की ही एक अन्य वकील मृणालिनी ने बताया कि अमूमन छह महीने से पांच साल तक से कम अवधि वाली शादियों के तलाक के मामलों में आम तौर पर महिलाओं ने गुजारा भत्ता लेने की इच्छा नहीं जतायी है। दिल्ली की एक जिला अदालत में घरेलूंिहंसा सुरक्षा अधिनियम के तहत दर्ज एक केस में जब वकील ने उसमें गुजारा भत्ते के लिए धारा 125 जोड़ा तो महिला ने साफ इनकार कर दिया कि वो (पति) क्या भत्ता देगा ? पूरे घर का खर्च तो वही उठाती रही है। उक्त महिला रोहिणी के कुछ घरों में साफ-सफाई और बर्तन धोने का काम करती है तथा जो भी कमा कर लाती है, उसे उसका पति शराब पीने के लिए छीन लेता है। यहां तक कि वह घर के बर्तन आदि भी बेच देता है तथा विरोध करने पर उसे मारता-पीटता है। महिला का कहना है कि कोर्ट से उसे सिर्फ प्रोटेक्शन ऑर्डर चाहिए। वैसे किसी की किसी पर निर्भरता (चाहे शादी बनी रहे या टूट जाए) अच्छी नहीं मानी जा सकती है। किसी को अपना जीवन यापन किसी दूसरे से मांग कर करना पड़े तो वह स्वाभिमान को काफी हद तक क्षति पहुंचाता है। जिन्हें इसका एहसास न हो, वे संभव है कि गुलाम मानसिकता की शिकार हों। लड़कियों में खासकर शुरू से ही आत्मनिर्भर बनने का प्रयास एक उच्च कोटि का गुण या आकांक्षा मानी जानी चाहिए। इस तर्क-वितर्क के बीच घर के काम का मूल्य और महत्व की बात आती है कि जितना बाहर के पैसे वाले काम की कीमत है उससे अधिक या बराबर घरवाले काम की लेकिन यदि ऐसा होता तो फिर अलग होने पर गुजारे के लिए मांग क्यों करनी पड़ती ? इसलिए दूरगामी तौर पर बराबरी के लिए केन्द्रीय मुद्दा आय के स्रेतों पर बराबरी का दावा तथा मालिकाना हक बराबर का हो, यही बन सकता है। इसके बिना गैर बराबरी बनी रहेगी तथा अन्याय की गुंजाइश भी होगी। दहेज जैसी लाइलाज सामाजिक समस्या से निपटने के लिए भी जरूरी है कि महिलाएं परिवार की कमाऊ सदस्य बनें तथा साथ में उन्हें कृपा या उपहार नहीं, बल्कि हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए। तभी चाहे वे पति के साथ रहें या अलग, शादी करें या न करें, उनके नागरिक अधिकार सुरक्षित रहेंगे।

Tuesday, December 28, 2010

महिला हिंसा के विरुद्ध अभियान

हाल के वष्रो में महिलाओं पर हो रही हिंसा के विरुद्ध कई सशक्त आवाजें उठी हैं। सरकार ने पहले से बेहतर कानून भी बनाया है, फिर भी सवाल बचा है कि दूर-दराज के गांवों में इस कानून का क्रियान्वयन कितना हो सकेगा। अनुभवी लोगो का मत है कि कानून कितने भी अच्छे बनें पर जब तक विभिन्न समुदायों में इसकी मान्यता नहीं बढ़ती है तब तक व्यापक व वास्तविक बदलाव की उम्मीद कम होती ही होती है। अत: जमीनी स्तर पर हिंसा के विरुद्ध कार्य करना व पूरे समुदाय में हिसा के विरुद्ध माहौल तैयार करना सबसे आवश्यक कार्य है। देहरादून के सहसपुर व विकासनगर प्रखंडों में हाल के वष्रो में दिशा संस्था महिला हिंसा के विरुद्ध उल्लेखनीय प्रयास कर रही है। इन गांवों में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के अनेक समाचार मिलते रहते थे। हालांकि ऐसे समाचार आज भी मिलते हैं पर निश्चित ही उनकी संख्या में कुछ कमी आई है। दूसरे महिला समुदाय में ऐसी घटनाओं के विरोध की हिम्मत बढ़ी है। अत्याचार के विरुद्ध समुचित कानूनी कार्रवाई होने से महिलाओं को न्याय मिलने की उम्मीद बढ़ी है। शुरू में दिशाने जब यहां कार्य आरंभ किया तो उसके कार्र्यकताओं के विरुद्ध काफी भला-बुरा कहा गया लेकिन उन्होंने इसकी परवाह किए बिना गांववासियों से बातचीत का सिलसिला जारी रखा। महिलाओं ही नहीं पुरुषों से भी इस विषय पर बातचीत चलाई गई कि महिलाओं पर हो रही हिंसा समाज के लिए कितना बड़ा कलंक है। स्कूलों-कॉलेजों में कार्यक्रम कर युवकों-किशोरों से पूछा गया कि क्या लड़कियों के साथ हो रहा ऐसे भेदभाव उचित है तो लड़कों ने घर में कहना आरंभ किया कि हमारी बहन को भी स्कूल भेजो। कई युवा तो दिशा के साथ मिलकर प्रचार-प्रसार भी करने लगे। इस मेहनत का परिणाम तब सामने आया जब इस प्रयास के आरंभ होने के दो-तीन र्वष के भीतर ही सहसपुर में आयोजित महिला हिंसा विरोधी सम्मेलन में चार से पांच हजार महिलाएं एकत्र हो गई। वे दूर-दराज के गांवों से अपने र्खच पर आईं। अनेक गांवों में सार्थक बदलाव की प्रक्रिया को, महिलाओं की समता और न्याय की आवाज को आगे ले जाने वाली चेंज मेकरतैयार होने लगीं। इस मुहिम के तहत लगभग 35 गांवों में महिला समितियों व किशोरी मंच का गठन हुआ। दिशा के कार्यक्षेत्र के गांवों में मुसलमानों व दलित परिवारों की संख्या अधिक है। विशेषकर मुसलमान किशोरियों में शिक्षा का अभाव अधिक देखा जाता है। दिशा ने उनके लिए विशेष शिक्षा कार्य चलाया जो कुछ समय तो काफी जोरशोर से चला पर अर्थाभाव के कारण इसे रोकना पड़ा। दिशा का प्रयास है कि कुछ साधन उपलब्ध होते ही इसे व्यापक स्तर पर फिर आरंभ किया जाएगा। दिशा की कार्र्यकताओं ने दूर-दराज के गांवों में जाकर दोनों पक्षों को संतुष्ट करते हुए ऐसे कई मामले मौके पर ही निबटाए जिनके कारण हिंसा की संभावना थी। जो मामले अधिक उलझे थे उनके लिए प्रतिमाह एक दिन अपने सहसपुर स्थित मुख्यालय में नारी अदालत का आयोजन आरंभ किया गया। कम समय में संस्था ने लोगों का विश्वास प्राप्त किया है और लोग इस अदालत में दूर-दूर से पहुंचते हैं। हाल में महिलाओं के प्रति अत्याचार-अन्याय के अनेक गंभीर मामले दिशा की सहायता से सुलझाये गए हैं जिसमें दोषियों को सजा दिलवाई गई। इनमें जहां बच्चियों या किशोरियों के साथ दुराचार के गंभीर मामले थे, वहीं बिरादरी पंचायतों द्वारा अन्यायपूर्ण फैसलों के मामले भी थे। यह ऐसे मामले थे जिन्हें सुलझाने में या दोषियों को सजा दिलवाने में दिशा की अपनी कार्र्यकता ही कई बार संकट से घिर गईं। पर अंत में प्राय: उन्हें सफलता मिली व जिन पर अत्याचार हुआ था उन्हें भी राहत मिली। बहुत कठिन परिस्थितियों में दिशा को यह सफलता मिलने की एक वजह यह है कि उसने स्थानीय समुदाय, मीडिया, और सरकारी मशीनरी की सहायता से अपने प्रयास को मजबूत बनाने की कोशिश की है। संस्था की एक कार्र्यकता ने बताया कि कई बार नीचे के पुलिस अधिकारियों ने सहयोग नहीं किया तो ऊपर के अधिकारियों से संर्पक कर राह निकाली गई। सफलता की दूसरी वजह यह है कि दिशा की अनेक कार्र्यकताओं ने अपने जीवन में भी अनेक कठिनाईयों का सामना किया है और इसी कारण उनकी संवेदनाएं और गहरी हुई हैं जिसके कारण वह मन से काम कर रही हैं। आबीदा खातून ने बताया कि कैसे दिशा में आने के बाद पहले वह स्वयं बुर्के से मुक्त हुई और उसके बाद अनेक महिलाओं की सहायता के लिए पहुंची। अनीशा को कम उम्र में ही परिवार की अधिक जिम्मेदारियां संभालनी पड़ी हैं पर वह इसके साथ अपनी सामाजिक जिम्मेदारी भी मजबूती से संभाल रही हैं। दिशा की छह-सात सदस्यों की टीम जहां महिला अधिकारों को बुलंद कर रही है, वहां इनकी सहयोगी एक अन्य टीम ने माइक्रो फाइनेंस या छोटे स्तर के र्कज से चलने वाले उद्यमों में उल्लेखनीय प्रगति की है। कमलेश ने बताया कि स्वयं सहायता समूहों का गठन भी किया गया तथा अलग से केवल र्कज प्राप्त करने के इच्छुक समूहों का भी। तमाम सावधानियां अपनाते हुए कमजोर र्वग के हितों को ध्यान में रखकर ही र्कज दिया जाता है।