Sunday, March 6, 2011

सबसे जरूरी है लड़कियों को शिक्षित करना


भारत में महिलाओं की ज्यादातर समस्याएं दूर हो सकती हैं। इनके लिए तीन अहम पहलुओं पर ध्यान देने की जरूरत है। कन्या भ्रूण हत्या को रोकना सबसे बड़ी चुनौती है। इसे लेकर बने कानून को सख्ती से लागू किए जाने की जरूरत है। समाज में लड़कियों को पढ़ायािलखाया जाए और देर से शादी की जाए। जल्दी शादी की मानसिकता से महिलाओं के लिए कई तरह की मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं। तीसरी अहम बात लड़कियों को हर हाल में शिक्षित करना चाहिए और उन्हें जागरूक करना चाहिए
एक ओर भारत दुनिया में तेजी से विकास कर रहे देश के तौर पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है, इसकी अर्थव्यवस्था की गिनती दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में की जा रही है, मिडिल क्लास में शामिल लोगों की तादाद बढ़ रही है, लेकिन दूसरी ओर मानव विकास सूचकांक के पैमाने पर अभी भी देश में काफी कुछ किया जाना बाकी है। मसलन, भारत दुनिया के सबसे कुपोषित देशों में एक है, यहां शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर भी अधिक है। दुनिया भर में हर साल प्रसव के दौरान 5 लाख महिलाओं की मौत होती है, इसमें एक चौथाई भारत में होती है। एक साल से कम उम्र के दौरान एक हजार में 53 बच्चों की मौत हो जाती है। साफ और सफाई के नहीं होने से फैलने वाले संक्रमण बीमारियों के लिहाज से भी स्तर में काफी सुधार की जरूरत है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में यह देश अभी भी विकासशील देशों की कतार में खड़ा है। भारतीय महिलाओं के लिए यहां समस्याएं कुछ ज्यादा ही हैं। यहां लड़कियां जन्म होने से पहले मार दी जाती हैं और जन्म होने के साथ उन्हें ताउम्र भेदभाव का सामना करना पड़ता है। घर में भाई को ज्यादा तरजीह मिलती है। कम उम्र में ही उनका यौन शोषण होता है, बाल विवाह और दहेज के लिए हत्या जैसी कुरीतियां भी बनी हुई हैं। दरअसल, भारत में महिलाओं की समस्याओं का वर्गीकरण कई तरह से हो सकता है। घर-परिवार से लेकर उन्हें कामकाजी क्षेत्र में हर वक्त चुनौतियों का सामना करना होता है। ज्यादातर समस्याएं दूर हो सकती हैं। इनके लिए तीन अहम पहलुओं पर ध्यान देने की जरूरत है। कन्या भ्रूण हत्या को रोकना सबसे बड़ी चुनौती है। इसको लेकर कानून बन चुका है लेकिन उसे सख्ती से लागू किए जाने की जरूरत है। समाज में परंपरागत तौर पर माना जाता है कि लड़कियां बोझ हैं। इस मान्यता को तमाम विकास के बाद भी बदला नहीं जा सका है। लड़कियों को पराया धन समझा जाता है। माना जाता है कि शादी के बाद यह दूसरे घर में चली जाएगी। इसी सोच के तहत उनके साथ हर कदम पर भेदभाव होता है। उन पर होने वाले खर्च को धन की बर्बादी माना जाता है। यूएन डेवलपमेंट प्रोग्राम की लैंगिक असमानता की सूची के 169 देशों में भारत 119वें स्थान पर है। समाज में लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई के बजाए जल्दी से उनकी शादी कर देने पर जोर दिया जाता है। इस एक मानसिकता से समाज में महिलाओं के लिए कई तरह की मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं। तीसरी अहम बात लड़कियों को हर हाल में शिक्षित करना होना चाहिए। वैसे तो भारत में 1929 से ही बाल विवाह पर कानून रोक है लेकिन आज के समय में भी 18 साल की उम्र में आधी लड़कियों का विवाह हो जाता है। वे कम उम्र में ही मां बन जाती हैं, इस दौरान वे अपने साथ अपने बच्चे के भविष्य को भी खतरे में डालती हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक भारत में 19 साल से कम उम्र में मां बनने के दौरान हर 6000 लड़कियों की मौत होती है। 20 साल से कम उम्र की मांओं के नवजात शिशुओं की मृत्यु की आशंका 20 साल से ज्यादा उम्र की मांओं के बनिस्बत 50 फीसद ज्यादा होती है। देश की ज्यादातर महिलाओं में पढ़ाई के अभाव के चलते जागरूकता की कमी होती है, लिहाजा वे स्वास्थ्य सम्बन्धी मुश्किलों का सामना बेहतर ढंग से नहीं कर पाती। यही वजह है कि प्रसव के दौरान मां और बच्चे की होने वाली मौत के मामले देश में ज्यादा देखने को मिलते हैं। ज्यादातर औरतें मां बनने के दौरान एनीमिया से पीड़ित होती हैं, जो जानलेवा साबित होता है। देश भर में कई तरह की स्वास्थ्य योजनाएं काम कर रही हैं लेकिन ज्यादातर लोग जागरूकता के अभाव में उस तक पहुंच ही नहीं पाते हैं। हालांकि व्यवस्थागत खामियां भी मौजूद हैं और सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार भी मौजूद है लेकिन असली समस्या जागरूकता से जुड़ी है, जब तक आम महिलाएं जागरूक नहीं होंगी, वे सरकारी योजनाओं का फायदा नहीं उठा सकतीं। बहरहाल, महिलाओं की मुश्किल काफी हद तक कम हो सकती है, लेकिन इसके लिए हमें उन्हें शिक्षित बनाने पर जोर देना होगा। यूनिसेफ ने दुनिया भर के बच्चों की स्थिति पर 2011 की रिपोर्ट हाल में ही जारी की है, इस रिपोर्ट में हमने पाया है कि अगर किशोरावस्था से लड़कियों की शिक्षा और जागरूकता का ध्यान रखा जाए तो हम कम से कम अगली पीढ़ी को ज्यादा स्वस्थ्य और सुरक्षित बना सकते हैं। देश की एक चौथाई आबादी की उम्र 10 से 19 साल के बीच है। अगर इस आबादी की लड़कियों को हम शिक्षित बनाएं तो निश्चित तौर पर उनका परिवार कहीं बेहतर स्थिति में होगा। इस दिशा में ‘सबको शिक्षा का अधिकार कानून’ एक अहम भूमिका अदा कर सकता है।

Wednesday, March 2, 2011

अपने ही घर में खतरों से घिरी बेटियां


बेटी से बलात्कार से खतरनाक कुछ नहीं हो सकता लेकिन ऐसे खुलासे लगातार बढ़ते जा रहे हैं। डरा-धमका कर उनका जीना मुश्किल करने वाला और कोई नहीं, उनको जन्म देने वाला बाप ही होता है। फैसलों में होने वाली दे री और महंगी कानूनी जंग किसी अबोध कन्या को कितना लाचार करती है, समझा ही जा सकता है। मानसिक रूप से दीवालिया ऐसे खौफनाक पिताओं के आतंक से मुक्ति पाने की लड़ाई की भारी कीमत चुकानी होती हैना
नाबालिग बेटियों-सौतेली बेटियों के साथ पिता द्वारा बलात्कार और यौन शोषण के मामले भारतीय समाज में भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं, जो बेहद चिंताजनक और शर्मनाक है। किशोरियों के विरुद्ध लगातार बढ़ रहे यौन हिंसा के कारणों की विस्तार से खोजबीन अनिवार्य है। एक तरफ मीडिया में बढ़ते यौन चित्रण, पारिवारिक विखंडन, लचर कानून और न्याय व्यवस्था, ज्यादातर अपराधियों का बाइज्जत बरी हो जाना अपराधियों को बेखौफ बनाती है, मगर फैसले होने में बरसों की देरी और महंगी कानूनी सेवा, चुप रहने को मजबूर पीड़ित युवा स्त्री विरोध-प्रतिरोध कर सकती है, इसलिए भी अबोध बच्चियों पर हिंसा बढ़ रही है, नाबालिग लड़कियां अपने ही पिता या संबंधियों के खिलाफ न्याय की लड़ाई लड़ने की हिम्मत भी करें तो आखिर किसके सहारे? रिश्तों की किसी भी छत के नीचे स्त्री, अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही। कुछ ही दिन पहले अखबारों में समाचार छपा था कि राजधानी दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में 14 वर्षीय सौतेली बेटी से बलात्कार करने के आरोप में, राजेश कुमार नाम के व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है। वह छह महीने से सौतेली बेटी का यौन उत्पीड़न कर रहा था।खबर रेखांकित करती है कि वह उसकी अपनी नहीं, ‘सौतेली बेटीथी। सौतेली बेटीसे बलात्कार, क्या बलात्कार नहीं है? या सौतेली बेटीसे बलात्कार, अपनी ही बेटी से बलात्कार से कमतर घिनौना अपराध है? अक्सर सौतेली बेटियां ही बलात्कार की अधिक शिकार होती हैं। उत्तर प्रदेश में शाहजहांपुर के कटरा इलाके में एक पिता ने अपनी बेटी को हवस का शिकार बना लिया और राज तब खुला, जब वह गर्भवती हो गयी। अमृतसर की एक कॉलेज छात्रा ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के स्थानीय नेता व अपने पिता के खिलाफ पिछले आठ बरसों से बलात्कार करने का आरोप लगाया। पुलिस के अनुसार, 20 वर्षीय कॉलेज छात्रा के अपने पिता पर पिछले आठ बरसों से यौन शोषण का आरोप लगाने के बाद अजनाला भाजपा इकाई के महासचिव अशोक तनेजा को पिछले बुधवार रात गिरफ्तार किया गया, मगर हृदय की परेशानी और असामान्य महसूस करने के कारण तनेजा को बृहस्पतिवार को अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। रिश्तों को कलुषित और कलंकित करने का यह पहला और अंतिम मामला नहीं है। फिल्लौर-जालंधर में रक्त-संबंधों की तमाम मर्या दाओं को धूल में मिला अपनी ही 13 वर्षीय बेटी के साथ बलात्कार करने वाले, एनआरआई पिता (दुबई में कार्यरत) को पंजाब पुलिस ने गिरफ्तार किया, मगर आरोपी पिता सुरिंदर सिंह का कहना है- वह बिल्कुल निर्दोष है और उसे पैसे के मामले में विवाद होने के कारण कुछ लोगों ने साजिश के तहत फंसाया है।हरियाणा के सोनीपत जिले के नीलोखेड़ी गांव से समाचार है कि एक व्यक्ति ने पिता-पुत्री के रिश्ते की पवित्रता को खंडित करते हुए, अपनी ही 14 वर्षीय नाबालिग बेटी के साथ डेढ़ साल तक बलात्कार और यौन उत्पीड़न करता रहा। ऊपर से धमकी यह कि अगर किसी से भी शिकायत की तो, उसे जान से मार डालेगा। किसी तरह लड़की घर से भाग निकली और अपने ताऊ के पास जाकर अपनी आपबीतीसुनाई तो ताऊ ने पुलिस थाने में जाकर मुकदमा दर्ज करवाया। लड़की की मां का कई साल पहले देहांत हो चुका है, एक भाई और एक बहन अनाथालय में रहते हैं। वह भी पहले अनाथालय में रहती थी, लेकिन डेढ़ साल पहले उसके पिता उसे वहां से ले आये और तब से आए दिन वह अपने पिता की हवस का शिकार होती रही। आरोपी पिता फरार है..। पीड़िता को मेडिकल चेकअप के लिए भेज दिया गया है और पुलिस बलात्कारी पिता की तलाश में इधर-उधर घूम रही है। लक्सर क्षेत्र के गांव केहड़ा में रहने वाले इंद्रेश (गुज्जर) का अपनी ही हमउम्र रितु (हरिजन) से प्रेम का सिलसिला पिछले दो वर्षो से चला आ रहा था। परिजनों को यह रिश्ता मंजूर न हुआ, सो एक दूसरे से मिलने पर पाबंदी लगा दी गयी। प्रेमी युगल ने बुलंदशहर जाकर कोर्ट मैरिज की और गाजियाबाद में नया जीवन जीना शुरू कर दिया। मगर समाज के तथाकथित ठेकेदारों ने पंचायत बुलाकर इंद्रेश के परिवार को गांव-बदर कर दिया और उनकी सारी संपत्ति पर कब्जा जमा लिया। रितु की मां की मौजूदगी में ही पहले उसकी बेटी के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और उसके बाद उसकी बेरहमी से हत्या कर शव उत्तराखंड-यूपी की सीमा से सटे खेत में फेंक दिया गया। थाना न्यू आगरा क्षेत्र में एक पिता पर अपनी 11 वर्षीय बेटी के साथ बलात्कार करने का आरोप है, मगर पिता घटना के बाद से फरार है और बेटी की मां डीआईजी ऑफिस के चक्कर काट रही है। 2008 में उड़ीसा के मलकानगिरी के कुडुमुलुगुमा गांव में रहने वाले 37 वर्षीय भागबान दाकु को अपनी 14 वर्षीय पुत्री के साथ बलात्कार करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। जब ग्रामीणों ने उसकी बड़ी लड़की को गर्भवती अवस्था में पाया तो भागबान की जमकर पिटाई की और उसे पुलिस के हवाले कर दिया। रांची से सौ किलोमीटर दूर हजारीबाग जिले में पुलिस ने अपनी किशोरी बेटी (साइंस की इंटर की छात्रा) से कई वर्षो से कथित रूप से बलात्कार कर रहे पिता (सरकारी डॉक्टर) को गिरफ्तार किया। पिता उसे बचपन से ही ब्लू फिल्में दिखाकर अपने साथ सेक्स करने के लिए उकसाता रहा, मगर इस बात की शिकायत करने पर मां ने भी मामले में चुप रहने की सलाह दी। पिता के कथित यौन उत्पीड़न से हालत गंभीर होने पर एक बार उसे रांची के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था, लेकिन वहां से घर वापस आने पर पिता उसके साथ बलात्कार करता रहा। गिरफ्तारी के बाद पिता ने कहा कि बेटी मानसिक रूप से बीमार है। इससे पूर्व मुंबई ट्रैफिक कांस्टेबल गणोश तुकाराम पर अपने ही सहयोगी पु लिसकर्मी की नाबालिग बेटी के साथ बलात्कार का आरोप लगा था। वह नवीं कक्षा में पढ़ने वाली लड़की को घुमाने के बहाने गणोश विरार के पाटिल रिसॉर्ट ले गया था। पुलिस ही बलात्कारी हो जाए और औरतों की अस्मत से खिलवाड़ करने लगे तो आम जनता की बहू-बेटियों की सुरक्षा कौन करेगा? मार्च 2009 में ऑस्ट्रिया के सांक्ट पोएल्टेन शहर की अदालत ने फ्रीत्ज्ल को अपनी बेटी को सेक्स गुलाम बनाने और 24 साल तक अपने घर के तहखाने में कैद कर उसके साथ व्यभिचार करने के अपराध में उम्रकैद और बाकी उम्र किसी पागलखाने में गुजारने की सजा सुनाई थी, क्योंकि मानसिक रोग विशेषज्ञ के अनुसार ‘73 साल का फ्रीत्ज्ल महसूस करता है कि उसका जन्म बलात्कार करने के लिए ही हुआ है।मार्च में ही मुंबई पुलिस ने 60 साल के व्यापारी को अपनी ही दो बेटियों के साथ बलात्कारके आरोप में गिरफ्तार किया। इस कुकृत्य में बाप ही नहीं, लड़कियों की मां भी शामिल थी और दोनों पति-पत्नी ऐसा इसलिए कर रहे थे क्योंकि तांत्रिक ने कहा था- ऐसा करने से उनके घर की उन्नति होगी।व्यापारी ने पहले अपनी बड़ी बेटी के साथ 11 साल की उम्र से ही बलात्कार करना शुरू किया और कुछ महीने पहले 15 साल की बेटी को भी अपनी हवस का शिकार बना डाला। ऑस्ट्रिया के जोसफ फ्रिट्जल के समान ही 2004 में एक मामला भोपाल में भी सामने आया था, जहां 13 साल की बेटी के साथ उसका पिता बलात्कार करता था। अप्रैल-2005 में ऐसा ही अपराध हैदराबाद में भी हुआ, जहां 14 साल की बेटी पिता द्वारा बलात्कार के कारण गर्भवती हो गई थी। अक्टूबर-2006 में 25 साल की एक महिला ने भी अपने पिता (कानपुर में एसडीएम) पर आरोप लगाया था कि वह करीब एक साल से ज्यादा समय से उसके साथ बलात्कार कर रहा था। जून-2010 में यह खबर छपी थी कि मेरठ में अपनी ही बेटीसे बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार, एक पिता (सूरज कुमार, उम्र 40 साल) ने हवालात में रोशनदान की खिड़की से अपनी कमीज बांध फांसी लगाकर खुदखुशी कर ली। यहां आत्महत्या अपनी ही बेटीसे बलात्कार के अपराध-बोध का परिणाम है या उम्रकैद की सजा और समाज में बदनामी का भय? (लेखक सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं)


विडंबना


अगर बेटियों का अस्तित्व ही दुनिया से खत्म होने लगेगा, तब तो धीरे-धीरे सृष्टि भी खत्म हो जाएगी। क्या हमने यह बात कभी नहीं सोची? अकेले बेटे से तो घर नहीं बसाया जा सकता, उसके लिए भी बेटियों का होना बहुत जरूरी है
कितनी बड़ी विडंबना है हमारे देश की, कि हम जिस बेटी को पैदा होते ही बोझ समझ बैठते हैं, उसी बोझ के साथ हम सारी जिंदगी भी बिताना चाहते हैं। बचपन से लेकर मरने तक वही लड़की अलग-अलग रूप लेकर हमारा साथ भी निभाती चलती है। जिसके बिना आदमी एक पल भी नहीं गुजार सकता और कुछ लोग उसी बेटी का अपने घर में आगमन करते ही कभी अपनी मुसीबत, कभी बोझ समझ कर जीते जी मार डालना चाहता है। कितने नासमझ हैं, वे इंसान जो इतनी बड़ी हकीकत को नहीं समझ पाते या फिर यह कहो कि समझना ही नहीं चाहते और उससे अपना पीछा छुडाना चाहते हैं। उनकी नकारात्मक सोच उसके दहेज को लेकर होने वाली परेशानी और समाज की अन्य कुरीतियों को लेकर उसके साथ जोड़कर सोचना, उसके कमजोर व्यक्तित्व का परिचय ही तो देती है। उसकी संगिनी उसके साथ हर हाल में रहकर भी ऐसा कभी नहीं सोचती। वह हिम्मत से उसका सामना करने को हमेशा तैयार रहती है पर उसे मारने को कभी नहीं कहती। आदमी क्या इतना कमजोर और आलसी भी हो सकता है कि जिंदगी में जो परेशानी बाद में आने वाली हो, उससे डरकर वो एक ऐ से मासूम का खून बहा दे, जिसने अभी दुनिया में कदम भी नहीं रखा है। यह भी तो हो सकता है कि नहीं, ऐसा हो भी रहा है कि वही बेटी आज मां-बाबा का सहारा बनी हुई है और उनकी परवरिश कर रही है। आज बेटियां बेटों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, उनमें इतनी ताकत है कि वे अपने साथ अपने पूरे परिवार को पाल सकने की हिम्मत रखती है। अब देखो न, बेटियां बचपन से ही अपने अहसास को किस कदर बनाये रखती हैं। कभी बहन बनकर भाई का साथ देती हैं तो कभी सुखदुख में मां-बाप की भावनाओं को समझती हैं। फिर शादी के बाद अपने पति के परिवार को भी वही खुशी देती है और जीवनभर उसका साथ भी निभाती है। फिर यह सब करके वह ऐसा कौन सा गुनाह करती हैं कि कुछ के दिलों तक उनकी ये भावनाएं पहुंच ही नहीं पातीं और उनके दिल में इनको मारने का ख्याल आ जाता है। तो यही लगता है कि जो भी इसकी हत्या के बारे में सोचता होगा या तो वह दिमागी तौर से ठीक नहीं होता होगा या फिर उसके दिल में उसके प्रति कोई भावना ही नहीं होती होगी। वरना जो इतनी बखूबी से अपना कर्तव्य निभाती हो, उसे जन्म लेते ही मार डालने का ख्याल उसके दिल में कभी नहीं आ सकता। हमें ही मिलकर इसके विरुद्ध आवाज उठानी होगी, नहीं तो ऐसी बहुत सी मासूम जानें जो जन्म से पहले ही कुचल दी जाती हैं, मरती रहेंगी, सिर्फ हमारी नकारात्मक सोच की वजह से ही। हमें अपनी सोच बदलनी होगी, जिससे उन पर होने वाले अत्याचारों को रोका जा सके। अगर बेटियों का अस्तित्व ही दुनिया से खत्म होने लगेगा, तब तो धीरे-धीरे सृष्टि का भी अंत हो जाएगा। क्या यह कभी नहीं सोचा हमने? क्यों कि अकेले बेटे से तो घर को नहीं बनाया जा सकता। उसके लिए बे टियों का होना बहुत जरूरी है, इसीलिए हमें सच्चाई को न झुठलाते हुए उसका सामना करना होगा और बेटियों को भी बेटों की तरह बराबर का सम्मान देना ही होगा। यह कहने में उस वक्त भी गलत नहीं थी, जब बेटियों को ना के बराबर समझा जाता था कि उसका अधिकार तब भी उतना ही था, जितना उसने आज अपने हक से हासिल किया है। यदि हम यह कहें कि अगर आदमी शरीर है तो औरत उसकी आत्मा। फिर उनको अलग कैसे कम आंका जा सकता है? मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि दोनों की तुलना बराबर ही होनी चाहिए। जितना हक बेटे का, उतना ही बेटी का भी हो और अगर इनके अनुपात में ऐसे ही अंतर आता गया तो वह दिन दूर नहीं, जब इस सृष्टि का ही अंत हो जाएगा। इसलिए उसके एहसास को समझो और उसे भरपू र प्यार दो, जिससे उसके दिल से प्यारशब्द ही खत्म न हो जाये। इसके लिए हमें उसे और उसके प्यार और बलिदान को समझना होगा और एक सकारात्मक सोच रखनी ही होगी, जिससे वह सबके साथ अपना यह प्यार इसी तरह बनाये रखने की हिम्मत न खो दे! बाकी आप खुद ही समझदार हैं दोस्त।

स्त्री विरोधी वक्तव्य


सभ्य समाज में यह कल्पना नहीं की जा सकती कि कोई भद्र व्यक्ति किसी महिला पायलट को यह कह कर अपमानित करेगा कि इनसे घर तो संभाला नहीं जाता, ये हवाई जहाज क्या उड़ाएंगी? दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर एक निजी एयरलाइंस से मुम्बई जा रहे प्रमोद नाम के यात्री ने यह सुनते ही हड़कम्प मचा दिया कि फ्लाइट की पायलट महिला है। कोई आदमी इतनी छोटी और दकियानूस सोच के साथ आज के समाज में कैसे रह सकता है जिसके अनुसार महिलाओं का काम केवल घर संभालना ही है? दुनिया भर के सरकारी और कारपोरेट्स में जिस तेजी के साथ औरतें अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन कर रही हैं, उन्हें देखते हुए तो यह कहना गलत नहीं लगता कि आने वाला समय औरतों का ही है। एक ऐसा पुरुष जो घरेलू यात्रा के लिए भी हवाई मार्ग चुनता है, उसे अपढ़ तो नहीं माना जा सकता, फिर उसको महिलाओं की सफलता को लेकर कोई संदेह क्यों होता है? तय रूप से हवाई जहाज उड़ाना कोई साधारण ड्राइविंग सरीखा काम नहीं है, न ही एयर पायलट ब्लू लाइन बसों के कोई ड्राइवर होते हैं जो अपने नौसिखिएपन और उपद्रवी स्वभाव का प्रदर्शन सड़कों पर करते हुए दो-चार को कुचलकर मारने को स्वतंत्र होते हैं। प्रखर मेधा, कड़े अनुभवों और जटिल परीक्षा तथा परीक्षणों के बाद ही कोई पायलट या को-पायलट होता है। इसलिए उस यात्री का यह वक्तव्य दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं, स्त्री विरोधी भी है, जो उनको घर संभालने में उलझाए रखने की नीयत से बोला गया। दूसरे, महिला पायलट की क्षमता को कमतर आंकने और उसका सार्वजनिक उपहास करने के खिलाफ भी उस यात्री पर कार्रवाई होनी चाहिए। महिला आयोग की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह तमाम प्रोफेशनल महिलाओं के सम्मान की रक्षा में, इस व्यक्ति पर मानहानि का मामला दायर करे। पता नहीं क्या सोच कर निजी एयरलाइंस के कम्पनी प्रबंधन ने ऐसी अभद्र टिप्पणी करने वाले के खिलाफ शिकायत तक नहीं दर्ज करायी? यह कहना जायज नहीं लगता कि काफी समझाने-बुझाने के बाद उसने माफी मांग ली थी। उसकी यह सोच काफी खतरनाक और स्त्री विरोधी है। खतरा इसी नकारात्मक और रूढ़िग्रस्त सोच से है। लिहाजा, इसको जड़ से उखाड़ फेंकने और सकारात्मक रूप से इसका इलाज किये जाने की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में इस तरह की विचारधारा वालों को बिना किसी चेतावनी के छोड़ना संक्रमण को लगातार पनपते रहने की गुंजाइश देना ही है। ऐसा जरूर है कि पुरुषों में कहीं न कहीं स्त्रियों को प्रतिस्पद्र्धी के तौर पर देखने की प्रवृत्ति नजर आती है परंतु प्रतिस्पर्धा काम और क्षमताओं को लेकर हो तो उत्पादकता के लिए बेहतर साबित हो सकती है।