Thursday, February 17, 2011
पति से न्याय पाने आयोग पहुंचीं महिलाएं
हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले की विमला (काल्पनिक नाम) ने अंतत: पति की क्रूरता को बयान करने का साहस जुटा ही लिया। वह अपने पेट में पल रहे कान्हा को बचाने के लिए हाड़ कंपा देने वाली ठंड में महिला आयोग की शिमला स्थित अदालत पहुंच गई। उसका आरोप है पति द्वारा शराब पीकर पीटे जाने से अब तक आठ बार उसका गर्भपात हो चुका है, लिहाजा वह इस नवीं औलाद को पति के घर में जन्म नहीं देगी। वह अपने कान्हा में अपने उस भविष्य को टटोल रही है जिस पर उसके पिता की छाया न हो और जो उसे सुकून व शांति देने वाला हो। हालांकि यह तो समय ही बताएगा कि वह कान्हा की मां बनेगी या कान्हा की बहन की। हिमाचल में महिला अधिकारों को लेकर हो रहे त्वरित फैसलों के बाद आयोग की कोर्ट में विमला जैसी दर्जनों महिलाएं अपनी दास्तां सुनाती हैं और जब उनके पतियों को आयोग की फटकार लगती है तो आधा इंसाफ उसी वक्त हो जाता है। शिमला में दो दिनों तक महिला आयोग की सुनवाई बैठकों में करीब 70 फीसदी मामले केवल महिलाओं से घरेलू हिंसा व पति द्वारा शराब पीकर पीटने के आए। मंगलवार को महिला आयोग में विमला के पति को कानूनी सबक भी सिखाया गया और पत्नी को किसी भी तरह से परेशान करने के मामले में पुलिस को निगाह रखने की हिदायत भी दी गई है। एक अन्य मामले में युवती प्रियंका की मनोस्थिति पर भी आयोग की अध्यक्षा अंबिका सूद ने कड़ा रुख अपनाया। भरवाईं की रहने वाली प्रियंका की सगाई एक वर्ष पहले हुई थी, इस एक साल में लड़के व लड़की वाले मिलते रहे। समाज में शादी का संदेश गया लेकिन शादी की शहनाई गूंजने से पहले ही लड़के वालों ने यह कहकर मना कर दिया कि उनके विचार नहीं मिलते। अब वधू पक्ष सदमे में है और लड़की भी। आयोग ने इस मुद्दे पर गहराई से पड़ताल की और जबरन शादी के बजाय अब खर्च का हिसाब देने के निर्देश दोनों पक्षों को दिए। इस तरह की हालत उन मां-बाप की भी है जिन्होंने अपनी लाड़ली की बड़े चाव से परवरिश की और बड़ा किया लेकिन जब उसने लव मैरिज कर ली तो बुजुर्ग मां-बाप उसे देखने के लिए तरस गए। इस तरह के मां-बाप ने महिला आयोग जाकर गुहार लगाई है कि हमें अपनी बेटी से मिलने व देखने का मौका मिले। हालांकि बेटी कहती है कि वह अपने घर में खुश है अत: उसके माता-पिता को उसी में खुश रहना चाहिए। एक दिन में करीब 31 में 29 मामलों में स्त्री का हर दर्द, हर संवेदना व हर जरूरत, किसी न किसी रूप में सामने आया, जिसका वीभत्स रूप हमारे समाज ने ही खड़ा किया है। अब इसी कुव्यवस्था को पटरी पर लाने का प्रयास राज्य महिला आयोग कर रहा है। एक दिन में करीब 40 फीसदी ऐसे मामलों को मौके पर ही बातचीत से हल किया जा रहा है। बताते हैं कि कई मर्तबा अलग-अलग गाडि़यों से आयोग पहुंचे दो पक्ष, आयोग की सलाह के बाद एक ही साथ वापस गए हैं। 365 दिन में जोड़े 377 परिवार : अंबिका महिला आयोग की अध्यक्ष अंबिका सूद कहती हैं कि एक वर्ष में 377 परिवार जोड़े हैं। अब जिलों में जाकर कोर्ट बैठ रहा है ताकि महिलाओं को अपनी बात कहने के लिए मीलों दूर चल कर न आना पड़े। उन्होंने बताया कि महिलाएं इसलिए भी ज्यादा आवेदन कर रही हैं क्योंकि वे जागरूक हो रहीं हैं। अब अगली कोर्ट 22 फरवरी को मंडी में लगेगी और फिर धर्मशाला में। आयोग ने यह भी हिदायतें जारी की हैं कि सुनवाई के लिए बुजुर्गो व 65 वर्ष से ऊपर की आयु के लोगों को कोर्ट में नहीं बुलाया जाएगा।
Tuesday, February 15, 2011
इसरो से आ रही घोटाले की बू
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की कहानी अभी चल ही रही थी कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो का एस बैंड का नया घोटाला सामने आ गया है। अंतरिक्ष विभाग सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अधीन है, इसलिए वह अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते हैं। यदि वह घोटाले में सीधे शामिल नहीं हैं तो भी उनके राज चलाने पर सवाल खडे़ हो गए हैं। प्रतियोगी नीलामी के बिना बहुमूल्य एस बैंड स्पेक्ट्रम निजी कंपनी को देने के एंट्रिक्स समझौते पर उनकी सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। इसरो द्वारा समझौता रद करने से यह प्रकरण समाप्त नहीं होगा, क्योंकि जितने जवाब होंगे उससे ज्यादा सवाल खडे़ होंगे। संगठन का दावा है कि स्पेस कमीशन ने जुलाई 2010 में समझौता रद करने की पहल की, पर वह यह नहीं बता पाया कि इस प्रक्रिया में 6 महीने क्यों लगे। इसके साथ ही 2005 में हुए समझौत के बाद इसरो को यह समझने में पांच साल लगे कि देवास के साथ समझौता देश के हित में नहीं था। सरकार को देर से आई समझ की बात मान ली भी जाए तो भी चीजें ठीक करने के लिए इसकी जांच करवानी चाहिए थी कि विवादास्पद समझौते पर हस्ताक्षर कैसे हुए? पर एक विवादास्पद समझौता समाप्त करने के बाद होने वाली सरकारी प्रतिक्रिया से ऐसा कदापि नहीं लगता कि वह मामले की तह तक पहुंचना चाहती है। हालांकि केंद्रीय एजेंसी की कंपनी एंट्रिक्स द्वारा किया यह गलत समझौता लागू होने पर सरकारी खजाने को लगभग 2 लाख करोड़ का नुकसान होता, इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि समझौते के बारे में कैबिनेट को अंधेरे में रखा गया। यदि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान के पूर्व अध्यक्ष राधा कृष्णन की बात मानी जाए तो ऐसे मामले में कैबिनेट को कम से कम समझौते के बारे मे सूचित किया जाना चाहिए था। आश्चर्य है कि प्रशासन में मौजूद परिपक्व नौकरशाहों और वैज्ञानिकों ने ऐसा क्यों नहीं किया। स्पष्ट है कि समझौते पर हस्ताक्षर न केवल जल्दबाजी में, बल्कि छुपाकर किए गए। इससे एक अन्य मुद्दा उठता है। चूंकि स्पेस कमीशन तथा अन्य स्पेस एजेंसियां भारत के प्रधानमंत्री के प्रत्यक्ष नियंत्रण में आती हैं, इसलिए प्रधानमंत्री कार्यालय की संलिप्तता खारिज नहीं की जा सकती है। यदि कैबिनेट को दायरे से बाहर रखा गया हो तो भी समझौते पर प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा गौर किया जाना चाहिए था। इसलिए प्रधानमंत्री इससे अब तक अनजान कैसे रह सकते हैं। एस बैंड स्पेक्ट्रम प्लेट में रखकर देवास मल्टीमीडिया को पेश करने के साथ ही देवास मल्टीमीडिया की अचानक तरक्की भी महत्वपूर्ण है। 2004 में इसकी स्थापना इसरो संगठन के पूर्व वैज्ञानिक सचिव एमजी चंद्रशेखर द्वारा हुई थी और एक साल के भीतर ही यह ऐसा समझौता करने में सफल हो गई, जिसके लिए स्थापित संगठन कुछ भी खर्च कर सकते थे। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान तथा देवास मल्टीमीडिया ने जोर दिया है कि स्पेक्ट्रम आवंटित न होने के कारण किसी भी तरह का वित्तीय नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन यह तकनीकी मामले उठाकर मामला दबाने का प्रयास किया जा रहा है। तथ्य यह है कि प्राइवेट फर्म को दो संचार उपग्रह छोड़ने के बाद एक बार ट्रांसपांडर प्रयोग करने का मौका मिल जाता तो इसके बाद एस बैंड स्पेक्ट्रम मिल जाता। ऐसा तब और प्रासंगिक हो जाता है, जब दोनों उपग्रहों को देवास की आवश्यकतानुसार बनाया जाना था, जिसका उद्देश्य देश भर में और भारतीय रेलवे जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को उपग्रह आधारित ब्रॉडबैंड सेवाएं उपलब्ध कराना था। यदि भारत के लेखा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी ने समझौते को लाल झंडी न दिखाई होती तो देवास कंपनी परम प्रसन्न होती और जमकर फायदा उठाती। केंद्र सरकार को इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गनाइजेशन, देवास मल्टीमीडिया प्राइवेट लिमिटेड समझौते के बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उसे अपनी बची-खुची छवि बचाने के लिए ऐसा करना चाहिए, जिसे अनेक घोटालों और स्कैंडलों खासकर 2जी स्टेक्ट्रम की भयंकर डकैती से जबर्दस्त नुकसान पहुंचा है। भारतीय अंतरिक्ष विभाग जिस तरह एंट्रिक्स कॉरपोरेशन को एक स्वतंत्र वाणिज्यिक कंपनी बताकर पूरे मामले से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहा है, उससे उसकी नियत पर शक और गहरा रहा। इसका गठन 1992 में अंतरिक्ष विभाग और इसरो ने किया था। इसी कंपनी ने 2007 में अपनी पंद्रहवीं सालगिरह पर न केवल अंतरिक्ष विभाग, बल्कि इसरो, विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर, नेशनल रिमोट सेंसिंग एजेंसी, इसरो सैटेलाइट ट्रैकिंग सेंटर, मास्टर कंट्रोल फैसिलिटी के कर्मचारियों को भी सोने के सिक्कों से नवाजा था। तब कंपनी का मुनाफा 56 करोड़ रुपये था, जिसमें सात करोड़ रुपये से ऊपर की रकम इन तोहफों पर खर्च हुई जब मामला कैग की निगाह में भी आया तो कंपनी ने जवाब दिया था कि वह अंतरिक्ष विभाग और इसरो के कर्मचारियों का धन्यवाद देना चाहती थी। कैग ने इन तोहफों पर विपरीत टिप्पणी की थी। एंट्रिक्स से सोने के सिक्कों की बौछार का यह मामला इसरो की व्यवस्था के भी विपरीत था, क्योंकि यहां हर उपग्रह की सफल लांचिंग पर कर्मचारियों को नकद प्रोत्साहन दिया जाता है। कुल मिलाकर अंतरिक्ष विभाग और एंट्रिक्स कॉरपोरेशन का कामकाज इस कदर अपारदर्शी है कि वहां घोटालों की कतार छिपी हो सकती है। सरकार पिछले कई वर्ष से अंतरिक्ष विभाग में तरह-तरह की अपारदर्शिताओं पर पर्दा डालती रही है। पिछले दो-तीन वर्ष में कैग सहित विभिन्न संस्थाओं ने अंतरिक्ष विभाग और इसकी वाणिज्यिक कंपनी एंट्रिक्स में अनियमितता के कई मामले पकड़े हैं, मगर सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के मातहत यह विभाग हर तरह की कारवाई से ऊपर रहा है। देवास का मामला तो 2005 का है, मगर अंतरिक्ष विभाग को कर्मचारियों को सोने के सिक्कों से नवाजे जाने का मामला सिर्फ तीन साल पहले का है। एंट्रिक्स कॉरपोरेशन शायद देश की अनोखी सरकारी कंपनी होगी, जिसने अपने प्रशासनिक विभाग और सहयोगी एजेंसियों को इतनी बड़ी संख्या में इतने महंगे तोहफे बांटे। इस उदारता की सूचना तब सरकार तक पहुंची भी थी, लेकिन अंतरिक्ष विभाग का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सका। केंद्रीय सतर्कता आयोग कर्मचारियों को तोहफे देने पर रोक लगा चुका है। इसरो और देवास मल्टीमीडिया के बीच हुए करार को रद करने की तैयारियां कर रही सरकार ने अब इसकी समीक्षा के लिए समिति गठित कर दी है। योजना आयोग के सदस्य और पूर्व कैबिनेट सचिव बीके चतुर्वेदी की अध्यक्षता में गठित समिति को एक महीने के भीतर रिपोर्ट देने को कहा गया है, लेकिन इसी दौरान करार रद होने की खबरें बाहर आने के बाद ही देवास मल्टीमीडिया दावा कर रही है कि अंतरिक्ष के साथ हुए इस करार को खुद सरकार मंजूरी दे चुकी है। यह कानूनन बाध्यकारी है। ऐसे में अब सरकार अपने करार से कैसे मुकर सकती है। वैसे जुलाई 2010 में ही कानून मंत्रालय ने अंतरिक्ष विभाग को दी अपनी कानूनी राय में सरकार से करार को रद करने की सिफारिश की थी, जिस पर सरकार सात-आठ महीने बाद भी फैसला नहीं ले पाई है। एक ओर कांगे्रस समीक्षा समिति की आड़ में बचने का रास्ता ढूंढ़ रही है, जबकि भाजपा ने इस समिति पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी प्रवक्ता निर्मला सीतारमण के अनुसार समझौते को मंजूरी देने वालों में शामिल चतुर्वेदी मामले की जांच कैसे कर सकते हैं? बहरहाल, एस बैंड घोटाले को लेकर एंट्रिक्स और देवास फंसी हुई है, वही इसरो की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह विपक्ष के निशाने पर है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
घरेलू औरतें गैर-कामगार क्यों
अपने देश में घरेलू महिलाओं को आर्थिक गतिविधि वाले पेशे में शमिल किया जाए या नहीं, इस मुद्दे पर गहरा विरोधाभास है। भारतीय समाज आज भी नारी को जिस रूप में देखता है, उस पर कई सवाल उठ रहे हैं। एक प्रमुख सवाल है कि क्या घरेलू महिलाओं को गैर आर्थिक श्रेणी में रखना उचित है। इसको लेकर इन दिनों राज्य की आलोचना हो रही है। यों तो जनगणना 2011 के फॉर्म में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। मसलन, पहली मर्तबा ट्रांस जेंडर लोगों के लिए अलग श्रेणी बनाई गई है। वेश्याओं को 2001 की जनगणना में गैर-कामगार श्रेणी में रखा गया था, लेकिन इस बार उन्हें इस श्रेणी से बाहर निकालकर, उनके लिए दूसरे नाम से एक अलग कॉलम बनाया गया है। मगर घरेलू महिलाएं इस बार भी हमेशा की तरह गैर-कामगार श्रेणी में ही हैं। उनकी गिनती कैदियों व भिखारियों के समकक्ष होगी, जो गैर आर्थिक गतिविधि वाले पेशे में शुमार किए जाते हैं।
गौरतलब है कि 2001 में भी घरेलू महिलाओं को कैदियों, भिखारियों व वेश्याओं के समकक्ष मानते हुए उन्हें गैर-कामगार श्रेणी के दायरे में ही रखा गया था। रजिस्ट्रार जनरल ऑफ सेंसॅस के मुताबिक, वे आर्थिक रूप से उत्पादक कार्य नहीं करती हैं। जबकि इस सरकारी सोच को इवेंजेलिकल सोशल एक्शन फोरम और हेल्थ ब्रिज नामक संस्था द्वारा कराया गया अध्ययन झुठलाता है। इस अघ्ययन में देश में करीब 36 करोड़ घरेलू महिलाओं के कार्यों की सालाना कीमत 612 अरब आंकी गई है। घरेलू काम को ‘केयर इकोनामी’ के दायरे से बाहर रखने की प्रवृत्ति के चलते घरेलू महिलाओं के घर चलाने में किए गए परोक्ष आर्थिक योगदान को न तो कभी खुले दिल से सराहा गया और न ही कभी उसकी कीमत सरकारी व्यवस्था ने समझी। घरेलू महिलाएं भोजन बनाती हैं, बच्चे पालती हैं, उन्हें पढ़ाती हैं, बुजुर्गों की सेवा करती हैं, बाजार से सामान खरीदती हैं। महंगाई के दौर में सीमित बजट में घर चलाने से लेकर परिवार को एक साथ बांधे रखने का दायित्व भी उन्हीं के कंधों पर होता है। मगर अनगिनत कार्यों की सूची के बावजूद समाज व राज्य की नजर में उनके श्रम की कोई कीमत नहीं है। राज्य की नजर में ऐसे घरेलू काम करनेवाली महिलाएं खांटी घरेलू औरत है, जिनके कठिन श्रम की आर्थिक कीमत आंकने की जरूरत नहीं समझा जाता। राज्य का मानना है कि यह सब करना तो उसका पारिवारिक दायित्व है।
परिवार नामक संस्था के कट्टर समर्थकों की राय में अमेरिका, इंगलैंड, कनाडा, जर्मनी, डेनमार्क जैसे मुल्कों में परिवार नामक संस्था मोटे तौर पर टूट चुकी है, मगर अपने देश में आज भी यह संस्था महत्वपूर्ण है। भारतीय समाज का केंद्र बिंदु परिवार ही है और उसकी धुरी औरत है। समाज उसके घरेलू कामकाज को उसके दायित्व के दायरे में बांधकर उसका आर्थिक मूल्यांकन नहीं करता, तो जनगणना विभाग भी इस संदर्भ में घरेलू महिलाओं के साथ भेदभाव का रवैया ही अपनाता है। सही है कि पत्नी और मां एक कर्मचारी की तरह घर में निश्चित घंटों के लिए काम नहीं करती हैं, लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि उन्हें भिखारियों और कैदियों वाली गैर-कामगार श्रेणी में रख दिया जाए।
घरेलू महिलाओं के वित्तीय योगदान के प्रति संकीर्ण नजरिया हमारे समाज की पुरानी परंपरा रही है। आर्थिक विकास की तुलना में स्त्रियों के प्रति सामाजिक पूर्वाग्रहों के बदलने की रफ्तार बहुत धीमी है। पिछले दिनों दिल्ली की एक अदालत में जज स्वर्ण कांता शर्मा ने एक मामले की सुनवाई के दौरान जो कहा, उसका जिक्र यहां प्रासंगिक है-‘अकसर एक परिवार में आर्थिक योगदान में औरत के हिस्से को उसके जिंदा रहते पहचानने से इनकार कर दिया जाता है, लेकिन अपने फैसले में मैं ऐसा नहीं करूंगी।’
ऐसे में सबसे ज्यादा जरूरी राज्य के घरेलू महिलाओं के प्रति नजरिये में बदलाव लाना है। घरेलू औरतों के श्रम की कीमत लगाने और उन्हें आर्थिक गतिविधि वाले पेशे में शमिल करने का मतलब राज्य द्वारा परिवार और समाज में उनको आर्थिक स्वीकृति देना होगा, जिसकी वे हकदार हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने 2009 जनगणना विभाग को घरेलू महिलाओं को गैर-कामगार की श्रेणी में रखने के मुद्दे पर फटकार भी लगाई थी। मगर जनगणना विभाग ने इस बार भी गैर कामगार श्रेणी में रखकर देश की लगभग 36 करोड़ महिलाओं को निराश ही किया है।
घरेलू औरतें गैर-कामगार क्यों
अपने देश में घरेलू महिलाओं को आर्थिक गतिविधि वाले पेशे में शमिल किया जाए या नहीं, इस मुद्दे पर गहरा विरोधाभास है। भारतीय समाज आज भी नारी को जिस रूप में देखता है, उस पर कई सवाल उठ रहे हैं। एक प्रमुख सवाल है कि क्या घरेलू महिलाओं को गैर आर्थिक श्रेणी में रखना उचित है। इसको लेकर इन दिनों राज्य की आलोचना हो रही है। यों तो जनगणना 2011 के फॉर्म में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। मसलन, पहली मर्तबा ट्रांस जेंडर लोगों के लिए अलग श्रेणी बनाई गई है। वेश्याओं को 2001 की जनगणना में गैर-कामगार श्रेणी में रखा गया था, लेकिन इस बार उन्हें इस श्रेणी से बाहर निकालकर, उनके लिए दूसरे नाम से एक अलग कॉलम बनाया गया है। मगर घरेलू महिलाएं इस बार भी हमेशा की तरह गैर-कामगार श्रेणी में ही हैं। उनकी गिनती कैदियों व भिखारियों के समकक्ष होगी, जो गैर आर्थिक गतिविधि वाले पेशे में शुमार किए जाते हैं।
गौरतलब है कि 2001 में भी घरेलू महिलाओं को कैदियों, भिखारियों व वेश्याओं के समकक्ष मानते हुए उन्हें गैर-कामगार श्रेणी के दायरे में ही रखा गया था। रजिस्ट्रार जनरल ऑफ सेंसॅस के मुताबिक, वे आर्थिक रूप से उत्पादक कार्य नहीं करती हैं। जबकि इस सरकारी सोच को इवेंजेलिकल सोशल एक्शन फोरम और हेल्थ ब्रिज नामक संस्था द्वारा कराया गया अध्ययन झुठलाता है। इस अघ्ययन में देश में करीब 36 करोड़ घरेलू महिलाओं के कार्यों की सालाना कीमत 612 अरब आंकी गई है। घरेलू काम को ‘केयर इकोनामी’ के दायरे से बाहर रखने की प्रवृत्ति के चलते घरेलू महिलाओं के घर चलाने में किए गए परोक्ष आर्थिक योगदान को न तो कभी खुले दिल से सराहा गया और न ही कभी उसकी कीमत सरकारी व्यवस्था ने समझी। घरेलू महिलाएं भोजन बनाती हैं, बच्चे पालती हैं, उन्हें पढ़ाती हैं, बुजुर्गों की सेवा करती हैं, बाजार से सामान खरीदती हैं। महंगाई के दौर में सीमित बजट में घर चलाने से लेकर परिवार को एक साथ बांधे रखने का दायित्व भी उन्हीं के कंधों पर होता है। मगर अनगिनत कार्यों की सूची के बावजूद समाज व राज्य की नजर में उनके श्रम की कोई कीमत नहीं है। राज्य की नजर में ऐसे घरेलू काम करनेवाली महिलाएं खांटी घरेलू औरत है, जिनके कठिन श्रम की आर्थिक कीमत आंकने की जरूरत नहीं समझा जाता। राज्य का मानना है कि यह सब करना तो उसका पारिवारिक दायित्व है।
परिवार नामक संस्था के कट्टर समर्थकों की राय में अमेरिका, इंगलैंड, कनाडा, जर्मनी, डेनमार्क जैसे मुल्कों में परिवार नामक संस्था मोटे तौर पर टूट चुकी है, मगर अपने देश में आज भी यह संस्था महत्वपूर्ण है। भारतीय समाज का केंद्र बिंदु परिवार ही है और उसकी धुरी औरत है। समाज उसके घरेलू कामकाज को उसके दायित्व के दायरे में बांधकर उसका आर्थिक मूल्यांकन नहीं करता, तो जनगणना विभाग भी इस संदर्भ में घरेलू महिलाओं के साथ भेदभाव का रवैया ही अपनाता है। सही है कि पत्नी और मां एक कर्मचारी की तरह घर में निश्चित घंटों के लिए काम नहीं करती हैं, लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि उन्हें भिखारियों और कैदियों वाली गैर-कामगार श्रेणी में रख दिया जाए।
घरेलू महिलाओं के वित्तीय योगदान के प्रति संकीर्ण नजरिया हमारे समाज की पुरानी परंपरा रही है। आर्थिक विकास की तुलना में स्त्रियों के प्रति सामाजिक पूर्वाग्रहों के बदलने की रफ्तार बहुत धीमी है। पिछले दिनों दिल्ली की एक अदालत में जज स्वर्ण कांता शर्मा ने एक मामले की सुनवाई के दौरान जो कहा, उसका जिक्र यहां प्रासंगिक है-‘अकसर एक परिवार में आर्थिक योगदान में औरत के हिस्से को उसके जिंदा रहते पहचानने से इनकार कर दिया जाता है, लेकिन अपने फैसले में मैं ऐसा नहीं करूंगी।’
ऐसे में सबसे ज्यादा जरूरी राज्य के घरेलू महिलाओं के प्रति नजरिये में बदलाव लाना है। घरेलू औरतों के श्रम की कीमत लगाने और उन्हें आर्थिक गतिविधि वाले पेशे में शमिल करने का मतलब राज्य द्वारा परिवार और समाज में उनको आर्थिक स्वीकृति देना होगा, जिसकी वे हकदार हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने 2009 जनगणना विभाग को घरेलू महिलाओं को गैर-कामगार की श्रेणी में रखने के मुद्दे पर फटकार भी लगाई थी। मगर जनगणना विभाग ने इस बार भी गैर कामगार श्रेणी में रखकर देश की लगभग 36 करोड़ महिलाओं को निराश ही किया है।
Saturday, February 12, 2011
नजीर बनतीं मिस्र की महिलाएं
मिस्र में हालात अब तेजी से बदल रहे हैं। बीते एक पखवाड़े से काहिरा का तहरीर चौक लगातार अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छाया हुआ है। तहरीर चौक पर राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के खिलाफ इकट्ठे हुए प्रदर्शनकारियों में इस मुल्क की आधी आबादी यानी महिलाओं ने अपनी उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। हाल में एक अखबार के पहले पन्ने पर तहरीर चौक पर थकी-मांदी सो रही एक बच्ची की तस्वीर छपी, जिसके माथे पर अरबी में लिखा हुआ था मेरी आत्मा, मेरा दिल मिस्र है। वास्तविक लोकतंत्र को हासिल करने के इस अहिंसक संघर्ष में हर उम्र की महिलाओं का कारवां आगे बढ़ता नजर आया। इस संक्रमण दौर में उनकी भूमिका आगे की ओर बढ़ते हुए कदम हैं, ये मिस्र के इन ऐतिहासिक पलों की अत्यंत महत्वपूर्ण पात्र हैं। महिलाओं के ये बयान पढ़ने-सुनने को भी मिले कि वे मिस्र में बदलाव लाने के लिए पुरुषों के साथ मिलकर काम कर रही हैं। अलेक्जेंडर ब्लैकमैन जो काहिरा में सेंटर फॉर अरबी स्टडी एबोर्ड में फेलो हैं, लिखती हैं कि पुरुषों की तरह ही विरोध करने वाली महिलाएं मिस्र के सभी सामाजिक-आर्थिक वर्गो, धर्मो व पीढि़यों से तहरीर चौक पर नजर आती हैं। किसी ने नकाब तो किसी ने पूरा चेहरा ढका हुआ है तो कोई डिजायनर जींस पहनी हुए हैं। धूप के चश्मे पहनी युवा लड़कियों, महिलाओं के हाथों में लोकतंत्र के पोस्टर दिखाई दिए। वह पुलिस का सामना करने में भी पीछे नहीं रहीं। संगठित होकर रणनीति अपनाई और अपने अपने काम बांट लिए। कुछ ने होस्नी मुबारक के खिलाफ व लोकतंत्र के पक्ष में नारे लगाने का जिम्मा लिया तो कुछ ने सुरक्षा का काम संभाला। दरअसल राजनैतिक हकों वाले इस संघर्ष में उन्होंने आगे की कतार में खड़े होकर पुलिस विरोध का मुकाबला किया और हजारों की भीड़ के सामने नारेबाजी का नेतृत्व करने में भी पीछे नजर नहीं आई। मिस्र के इतिहास पर नजर डालें तो 1919 व 1922 में वहां ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ जो राजनैतिक विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ, उसमें छात्र, सिविल अधिकारी, व्यापारी यूनियन, पुरुषों व महिलाओं ने भी शिरकत की। उच्च मध्य वर्ग की महिलाएं राष्ट्रवादी नेताओं से प्रभावित होकर विरोध प्रदर्शन के लिए बाहर निकलीं तो गरीब महिलाएं भी पीछे न रहीं। बीसवीं सदी के दूसरे दशक में मिस्र की महिलाओं ने राजनैतिक संघर्ष में जो भूमिका निभाई वह आगे चलकर विस्तृत होती गई। बेशक 1919 की मिस्र क्रांति महिलाओं के शमिल होने व उनके राष्ट्रीय मुद्दों से जुड़ने पर रोशनी डालती है, मगर इतिहास यह भी बताता है कि चार साल बाद जो संविधान लिखा गया, उसमें महिलाओं को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा गया यानी वे पुरुषों की तरह न तो वोट डाल सकतीं थी और न ही चुनाव लड़ सकती थीं। यहां अगर उनकी भारतीय महिलाओं से तुलना करें तो उन्हें अपने राजनैतिक अधिकार हासिल करने के लिए अधिक संघर्ष करना पड़ा। भारतीय महिलाओं को आजादी के बाद पुरुषों के समान ही चुनाव लड़ने व वोट डालने का अधिकार मिल गया था, जबकि मिस्र की महिलाओं को इसके लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। 1923 में नारीवादी आंदोलन की शुरुआत उस समय हुई, जब काहिरा के रेलवे स्टेशन पर महिलाओं ने नकाब उतारते हुए कहा कि यह अब अतीत की बात है। नारीवादी आंदोलन ने महिलाओं को उनके राजनैतिक अधिकार दिलाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने का काम किया। 1947 में मिस्र वीमेन एसोसिएट ने महिलाओं को मताधिकार देने के लिए चुनाव संबंधी कानून में संशोधन की मांग की। इस मांग में महिलाओं को पुरुषों के बराबर मत देने के अधिकार के साथ ही स्थानीय व प्रतिनिधित्व काउंसिल में पहुंचने का अधिकार भी शमिल था। 1952 में इस देश में फिर क्रांति हुई और 1956 में महिलाओं को पुरुषों के बराबर मत डालने का अधिकार मिल गया। 1962 में देश में पहली बार एक महिला को मंत्री बनाया गया। यह घटना वहां के मुस्लिम समाज में एक ऐतिहासिक लकीर बनी। दरअसल, जब महिलाओं को उनके राजनैतिक अधिकार दिए गए तो उस समय तक इस बात को स्वीकार लिया गया था कि महिलाओं को उनके अधिकार न देना लोकतंत्र के नियमों का विरोध करना है। ऐसे राजनैतिक अधिकार मिलने से अन्य क्षेत्रों में भी महिलाओं के अधिकार बढ़े व उनके आगे बढ़ने का मार्ग खुला है। इससे महिलाओं की भागीदारी विस्तृत हुई। उच्च पदों पर उनकी नियुक्ति का माहौल बनने लगा और पुरानी रुढि़वादी सोच को चुनौती मिलने लगी। आज मिस्र में महिलाएं चुनाव लड़ती हैं, वह सरकार में मंत्री भी बनती हैं। जज और राजदूत के पदों पर भी हैं। अपनी पंसद की पोशाक के साथ तहरीर चौक पर तानाशाही रवैये वाले राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के विरोध में हजारों की संख्या में नजर आती हैं और अंतरराष्ट्रीय मीडिया उनकी इस महत्वपूर्ण भूमिका का बार-बार जिक्र भी करता है। इस तहरीर चौक पर महिलाओं को इकट्ठा होने के आह्वान के साथ-साथ उन्हें कुछ हिदायतें भी उन तक पहुंचा दी गई थीं। मसलन, प्रदर्शनकारी युवतियों, महिलाओं से सुरक्षा बलों व ठगों के यौन हमलों से बचने के लिए बदन पर ड्रेस के दो जोड़े पहनकर आने को कहा गया। इसी तरह दो स्कॉर्फ के साथ आने को कहा गया। इसके पीछे उनकी चिंता यह थी कि अगर यौन हमले में उनके बदन पर पहनी पहली परत वाली ड्रेस फाड़ दी जाती है तो वे घबराएं नहीं। ऐसे में ड्रेस की दूसरी परत उनकी सुरक्षा कवच बनेगी। यौन हमलों का उद्देश्य इन महिलाओं को निशाना बनाकर उन्हें अपमानित करना हो सकता है। महिलाओं को इस बावत आगाह रहने के लिए तैयार रहने के पीछे वजह यह थी कि कुछ साल पहले होस्नी मुबारक के शासन काल में सुरक्षा बलों का इस्तेमाल महिलाओं पर यौन हमलों के लिए किया गया था। महिलाओं के अधिकारों की आवाज उठाने वाली इस देश की जानी-मानी नारीवादी नवल इल सादावी को राजनीतिक बंदी बनाया गया। फिर देश निकाला दिया गया। अब वह तहरीर चौक लौट आई हैं। अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि महिलाएं व लड़कियां, पुरुषों व लड़कों के साथ गलियों में खड़ी हैं। हम न्याय, आजादी, बराबरी व वास्तविक लोकतंत्र और एक ऐसे नए संविधान की मांग कर रहे हैं जिसमें महिलाओं व पुरुषों के बीच कोई भेदभाव न हो। मुस्लिम, ईसाई के बीच कोई भेदभाव न हो। हम व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे हैं ताकि वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना हो सके। राजनीतिक आंदोलनों में महिलाएं हिस्सा लेती रही हैं, पर इस भागीदारी, उनके जुड़ने वाली भूमिका व योगदान के बेहतर नतीजे नहीं आए। अपने देश की दिवंगत महिला नेता प्रोमिला दंडवते ने एक बार अफसोस जताते हुए कहा था कि जिस तरह आजादी की लड़ाई में भारतीय महिलाओं ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी, उस अनुपात में उन्हें देश आजाद होने के बाद उन्हें उनका हिस्सा नहीं मिला। कमोबेश ऐसे ही हालातों के कारण महिलाओं को और अधिक संघर्ष करने व राजनीति में उचित प्रतिनिधित्व के लिए दबाव बनाए रखने में अपनी ऊर्जा का एक बहुत बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। मिस्र की महिलाओं का भी मानना है कि इस संघर्ष, प्रतिरोध के खत्म होने के बाद भी उन्हें आजादी व बराबरी के लिए चौकस रहना होगा। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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