विश्वकप फुटबॉल मैचों से अधिक चर्चित हुई चीयरलीडर्स के साथ घटी वह घटना जो आइपीएल क्रिकेट के जरिए लोगों तक पहुंची है। कुछ समय पहले एक सांवली रंग की एक लड़की ने बताया कि किस तरह उसके साथ भेदभाव किया गया और उसे टीम से हटा दिया गया। अब ताजा विवाद चीयरलीडर्स की टीम में शामिल एक दक्षिण अफ्रीकी युवती के ब्लॉग के बहाने शुरू हुआ है। इस युवती ने अपने ब्लॉग में अपने आपबीती का बयान किया है। उसने लिखा है कि वह वही लिख रही है, जो उसने महसूस किया है। आइपीएल चीयरलीडर गैब्रिएला पास्कलोट्टो को खेल के दौरान इस घटना के तत्काल बाद दक्षिण अफ्रीका वापस भेज दिया गया। उसने खिलाडि़यों के अभद्र बर्ताव के बारे में विस्तार से बताया है कि चीयरलीडर्स को लोग पीस ऑफ मीट यानी मांस के लोथड़े की तरह देखते हैं और चलते-फिरते पोर्न की तरह इस्तेमाल करते हैं। मालूम हो कि आइपीएल यानी इंडियन प्रीमियर लीग के बहाने पिछले चार साल से कुछ अलग ढंग से क्रिकेट के नए फॉर्मेट वाले खेल का सिलसिला शुरू हुआ है। इसमें देश-विदेश के खिलाड़ी खेलते हैं और अलग-अलग खिलाडि़यों की महंगी बोली लगती है। इसी के साथ हम लोग क्रिकेट के मैदान पर चीयरलीडर्स से रू-ब-रू हुए हैं। खेल शुरू होने के पहले अलग ढंग से परिधान में सजी इन युवतियों की प्रस्तुतियां एक तरह से क्रिकेट के खेल की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए होता है। निश्चित ही यह कोई पहली घटना नहीं होगी और न ही मामला सिर्फ गैब्रिएला तक सीमित होगा। देखने और सुनने में जो आया है उसके मुताबिक खिलाड़ी, दर्शक तथा खेल से जुड़े अधिकारी और कर्मचारी भी चीयरलीडर्स के साथ छूट लेने में कतराते नहीं हैं, क्योंकि उनकी नियुक्ति ही उत्साहवर्धन और मनोरंजन के लिए होता है। इस चीयरलीडर के खुलासे ने परदे के पीछे ऑफ द पिच पार्टी की संस्कृति से पर्दा उठा दिया है। वीआइपी के रूप में एकत्र लोग कैसा आनंद उठाते हंै इसकी झलक इस आत्मकथा टाइप बयान में देखी जा सकती है। वह कहती है कि ये नशा करते हंै और उससे उन्हें आसानी से हासिल करने की इच्छा रखते हैं। इस बारे में आयोजकों का कहना है कि उन्हें उनके काम और भूमिका के बारे में स्पष्ट रूप से पहले ही बताया गया होता है और ताली एक हाथ से नहीं बजती। चीयरलीडर्स खुद भी मर्यादा तोड़ती हैं। संभव है कि इस बात में भी सच्चाई हो फिर भी मुद्दा अपनी जगह पर कायम है, जो वहां उपस्थित पुरुषों के नजरिये और कंुठित मानसिकता को कठघरे में खड़ा करता है। मूल प्रश्न यह है कि खेलों को लोकप्रिय बनाने के लिए चीयरलीडर्स की जरूरत ही क्यों पड़ी? जिसकी खेल में रुचि है वह खेल देखेगा इससे काम क्यों नहीं चला? इस पूरे घटनाक्रम पर सेलेब्रिटी लोग चुप हैं फिर चाहे वह शिल्पा शेट्टी हों, प्रीति जिंटा हों या नेस वाडिया। इस खेल महकमे से कुछ लोग मीडिया को बताते हंै कि वे लड़कियां भी वयस्क होती हंै और कांट्रैक्ट पर हस्ताक्षर करते समय उनको यहां के वातावरण के बारे में अच्छी तरह से सब कुछ पता होता है। भारत के कुछ खास शहरों में खासतौर पर उत्तर भारत में लड़कियों के साथ ऐसा अपमानजनक व्यवहार आम बात है। पिछले साल आइपीएल पार्टी में कुछ आम दर्शक भी घुस गए थे तथा जिसे लेकर काफी बवाल मचा। यह भी कहा जाता है कि जो विदेशी चीयरलीडर्स होती हैं उनसे लोग ज्यादा छूट लेते हैं, क्योंकि उनका पहनावा अलग होता है और भारतीय पुरुषों को वह ज्यादा आकर्षित करती हैं। पिछले साल एक मॉडल ने कहा कि रैंप का तख्त जानबूझकर ऊंचा रखा गया था ताकि दर्शक इन्हें ठीक से देख पाएं। इसे आयोजकों ने बकवास आरोप बताया था। एक चीयरलीडर ने व्यंग्य में इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार को बताया कि आप क्या सोचते हैं कि दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में मैच में लोग सिर्फ सीटी बजाते हैं। कहने का तात्पर्य यह था कि लोग तरह-तरह की अश्लील भंगिमाएं और कमेंट भी करते हैं। याद रहे कि दो साल पहले भारत-ऑस्ट्रेलिया के एकदिवसीय मैच में चीयरलीडर्स की तरह ड्रिंकगर्ल्स का जादू भी दर्शकों पर छा गया। ये लड़कियां इंटरवल के दौरान ड्रिंक्स की ट्रॉली लेकर मैदान में पहुंचती हैं, फिर खिलाड़ी के साथ दर्शक भी निहारते है इन्हें। उड़ीसा में कलिंगसेना के लोगों ने चेताया था कि कटक में होने वाले मैचों में चीयरगर्ल्स और ड्रिंकगर्ल्स तंग कपड़ों में नहीं, बल्कि साड़ी में आएं। पोशाक चाहे साड़ी हो या स्कर्ट, उससे औरत की पोजिशन या उसके सम्मान पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। कपड़ों के पीछे के शरीर के बारे में ही लोग सोचते-विचारते रहते हैं। किसी भी कपड़े में लिपटी इन लड़कियों की उम्र 18 से 20 वर्ष रखी जाती है यानी दर्शकों को कमनीयता भी चाहिए। अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ, जब बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन की तरफ से महिला खिलाडि़यों के लिए एक नया ड्रेस कोड का निर्देश जारी किया गया। इसके तहत अब उन्हें स्कर्ट में ही खेलना अनिवार्य होगा। ऐसा करने के पीछे फेडरेशन की तरफ से यही कारण बताया गया था कि वे बैडमिंटन के खेल को अधिक आकर्षक बनाना चाह रहे हैं। अगर अखबार में इस संबंध में जारी रिपोर्टो को देखें तो वह टेनिस के तर्ज पर इसे अधिक सेक्सी और ग्लेमरस बनाना चाह रहे हैं। इस पर गौर करने की बात थी कि आकर्षक खेल के लिए अच्छा खेल खेलना मायने रखता है या खिलाडि़यों द्वारा पहना जाने वाला पोशाक मायने रखती है। इस सवाल पर फेडरेशन का कहना था कि इसके द्वारा बैडमिंटन के प्रशंसकों और दर्शकों की संख्या बढ़ेगी तथा स्पॉन्सरशिप भी बढ़ेगा यानि शोहरत और आय के लिए खेल ही नहीं खिलाडि़यों के आकर्षण को भी बेचा जाना जरूरी है। वापस यदि हम चीयरलीडर्स की चर्चा पर लौटें तो यहां इन लड़कियों का ही नहीं, बल्कि उपभोक्तावादी संस्कृति का भी जलवा है। इसमें सब कुछ उपभोग के लिए होता है और पितृसत्ता भी उन्हें उपभोग की वस्तु ही मानती है। वह यदि औरतों को बराबरी और गरिमा का दर्जा देने लगे तो अपनी ही कब्र खोदेगी। अक्सर कई लोग इस भ्रम के शिकार होते हैं कि जो लोग औरत के भारतीय परिधान या भारतीय परंपरा व संस्कृति की बात कर रहे हैं वे शायद औरत को सम्मानित जगह दे रहे हैं। दरअसल, दोनों ही प्रकार के सोच वालों के लिए औरत का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। इनकी नजर में वो बराबरी की हकदार नहीं है। एक के लिए वह घर-परिवार में कैद निजी इस्तेमाल की वस्तु है तो दूसरा मुफ्त बाजार में परोसने की हिमायत करता है। औरत की असली मुक्ति तो वहीं होगी, जिसमें वह न देवी समान हो न दासी समान और न ही बिकाऊ माल के बराबर, बल्कि वह स्वतंत्र हैसियत वाली बराबर की इंसान हो, जिसमें स्त्रीसमुदाय का होने का कारण वह किसी प्रकार के सामाजिक गैर-बराबरी की शिकार न हो। ऐसा समाज निर्मित किया जाना बाकी है और जो इसी समाज में मौजूद सही विचार और सोच वाले स्त्री-पुरुष मिलकर बनाएंगे। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Thursday, May 19, 2011
Monday, May 16, 2011
Wednesday, May 11, 2011
कच्ची है कसौटी
पुरुष व्यवस्था की मारी हुई हमारी तथाकथित विवेकशील स्त्रियों में उन विचारों की बहुत कमी है, जो किसी औरत के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने या कि उसके लिए प्राणरक्षक की भूमिका में बेहतर सिद्ध हो सकते हैं। पंजाब महिला आयोग की टिप्पणी को प्रख्यात साहित्यकार कृष्णा सोबती पढ़कर हंस पड़ी होंगी या कि महिला आयोग पर अफसोस किया होगा? तस्लीमा जी भारतीय प्रबुद्ध महिलाओं के इस कदम को कैसे देखेंगी? कितनी चिंता है हमें विवाह संस्था के कुपोषण के लिए, परिवारों को क्षतिग्रस्त होने के लिए और कितना डर है? हमारे पुरुष वर्ग को अपने वर्चस्व को क्षीण होते जाने की आशंका का। हम मान रहे हैं कि अभी स्त्रियां पूरी तरह मजबूत नहीं हुई हैं, जबकि इन दिनों पुरुष-सत्ता में ले-दे मची हुई है। एक छोटी सी बातूनी डिबिया (मोबाइल फोन) औरत के हाथ में क्या आयी कि समाज में हाहाकार मच उठा, जैसे औरत ने एके-47 थाम ली हो। इसमें शक नहीं कि बहू हो या बेटी, जब मोबाइल के जरिये किसी से बात कर रही होती है, अभिभावकों का दिल र्थरा उठता है। पत्नी को फोन कान से लगाये और चटर-पटर बात करते हुए देखकर पति को अपने आसपास ही किसी खलनायक की बू आती है। सव्रे करके देख लिया जाए कि कितने परिवार अपनी कुंआरी बेटियों और जवान बहुओं के पास मोबाइल होने के पक्ष में है? हमारा दावा यह भी है कि प््राा इ व्ाे ट बतकही के लिए ज्यादातर परिवार या ससुराल पक्ष तैयार नहीं होंगे। हमने मान लिया है कि शासकों के सिंहासन डगमगाने लगे। बस, इसलिए ही मैं सभा-गोष्ठियों में और अखबार के पन्नों पर, टीवी चैनल के जरिये बरसों से मोबाइल फोन का धन्यवाद करती आ रही हूं, जिसने औरत की इच्छा- वरणी मूक पड़ी आवाज खोल दी। स्त्री अपनी ही आवाज पर आज चकित है जिसने स्वामी, मालिक और तथाकथित राजाओं के दिल दहला दिये। कितना अच्छा था, तब जब बेटियों के प्रेम-पत्र पकड़े जाते थे। सजा के रूप में शादी का फरमान तुरत-फुरत सुनाकर मेल- बेमेल, अधेड़-बूढ़ा, दे स- परदेस का वर ढूंढ़ दिया जाता था और कन्यादान करके मां-बाप गंगाजी नहा आते थे। कितना सुनहरा युग गुजरा है, जब बहुएं चुपचाप घर के आंगन में मजूरी करती रहती थीं। अपनी किसी व्यथा या पीड़ा को पी जाना ही हितकर समझती थीं- ‘दुखवा का से कहूं मो री माई’ का मजबूती से बंधा मजबूर सूत्र दुल्हन के मंगल-सूत्र की तरह गले में अदृश्य रूप में दिन-रात रहता था और नव-युवा बहू रो- रोकर अपना दर्द कभी पीपल के पेड़ को सुनाती थी, कभी नीम पर बैठे तोता और कागाओं को। मगर आज उस बेटी या उस बहू के हाथ में मोबाइल फोन है, दिल जरा सा भी दुखा, दर्द माता-पिता तक पहुंचा दिया। हमारे घर की मीरा बहू ने अपने दद्दा से धोती-साड़ी, पायल-बिछिया को दरकिनार करके मोबाइल फोन मांगा था और फोन आते ही ससुराल में भूचाल आ गया, जैसे मीरा का वार्तालाप हर हालत में बहुत होशियारी या दांवपेंच वाला हो सकता है। वह फोन के जरिये शतरंज जैसी चाल चल सकती है, जो आमने-सामने संभव नहीं है। बहुत सी उफनाती ध्वनियां उसके दिमाग में चलती रही हैं, जो चेहरा देखकर ही पहचानी जा सकती थीं मगर कुछ न कहने की मजबूरी, सिर झुकाकर सह जाने की बेबसी के चलते आखिर भीतर का प्रतिरोधी ज्वार थमने लगता। यह अलग बात है कि इस बदलाव के दौरान इंसाफ के लिए अराजकता ऐसी कि स्थिति दर्दनाक और विचलित कर देने वाली हो जाती। सीने में जो सुलगता, आंखों में धुआं-सा चुभता। लड़की का दुख छिपा रहे, वह कष्टों को झेलती चली जाए और ‘उफ’ तक न करें, यह ‘मूल्यवान नियम’ शील-स्त्री का निर्माण करता है। इसी नियम को पोसने की हिमायत में पंजाब का महिला आयोग उठा, तो समझिए कि हमारी महान परंपराओं को सुरक्षित कर रहा है। इसी से मर्दपरस्त संस्कृति उठान पर रहती है। अब ऐसे समाज को सामंती खूंखार या कुटिल न कहें तो क्या कहें जो स्त्री के मनुष्यगत हकों का हत्यारा है। इसी हत्यारी संस्कृति के आधार पर चलती है विवाह संस्था, तभी तो पुरुष वर्चस्व के भोंपू से बोलती हुई पंजाब महिला आयोग की अधिकारियों ने मोबाइल फोन के स्त्री-सहयोग को तलाक का कारण बताया है। तलाक यानी कि उस संबंध से छुटकारा, जिसके कारागार में तरह-तरह की सजाओं का प्रावधान है। घरेलू हिंसा से अग्नि-दहन तक और मर्दानगी की बलिष्ठता के बूते औरत के बहत्तर टुकड़े करके फ्रिज में रख देने तक, तंदूर में झोंक देने तक और सरेआम गोली मार देने तक, सभी के इस संहार को रोकने का उपाय क्या है? कितनों को फांसी हुई है उनके बर्बर कृत्यों पर? इस पर ध्यान देने की जरूरत भी क्या है? हमारे महान ग्रंथों में लिखा है कि सती होना स्त्री का परम धर्म है या उसे खत्म कर देने से कोई पाप नहीं लगता। तभी तो जब औरत सब तरफ से निराश-हताश होकर फैसला अपने हाथ में ले लेती है, तो कचेहरियों तक चिल्लाने लगती हैं कि औरत अगर पति पर वार करेगी तो विवाह संस्था का क्या होगा? शादी पर किसको िव्ा श् व्ाा स्ा रहे गा? पूछने का मन करता है कि स्त्री-हत्या की रोजाना की खबरें, भ्रूण-हत्या के नजारे और घरेलू-हिंसा की दर्दनाक कहानियां औरत की आस्था को कितनी बचा पाती हैं कि वह विवाह को बचाये। तलाक से डर लगने लगा है मदरे को, मदरे के पैरोकार परिवारों को। तभी तो हमारा समाज तकनीकी योग्यता और तमाम हलकों में देश की मजबू ती पर ताल ठोकते हुए चोर निगाहों से औरत की तरक्की देखकर बौखला जाता है। जैसे औरत का सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्तर उसके अपने इरादों के मुताबिक ऊंचा हो, तो मर्दाने समाज की तौहीन होती है। मोबाइल फोन ही क्यों, स्त्री की वेशभूषा उसकी शिक्षा-दीक्षा के साथ योग्यता और क्षमता दहशत पैदा कर रही है, नहीं तो दिनदहाड़े बलात्कार और कत्ल के रास्ते औरत को ठिकाने क्यों लगाया जाता? वही कि अब वह आंखें नीची करके, कंधे झुकाकर चलने वाली लड़की से ऊपर उठकर आपकी आशनाई, कामुकता और मालिकाना अंदाज का जवाब अपनी इच्छा और अपने फैसले के हिसाब से दे रही है, जो आपको कड़ी चुनौती लगती है तो फिर छीनो मोबाइल, बैन कर दो इंटरनेट और प्रतिबंध लगा दो जींस और टॉप पर। घाघरा लूगड़ी या बुर्के घूंघट में बन्द कर दो उसका मनुष्यगत व्यवहार कि उसकी ज्ञानेन्द्रियां सुन्न हो जाएं और वह फिर से मूक के रूप में, कोल्हू के बैल के अभ्यास में उतर जाए। मगर अब ऐसा कुछ किसी के बस का नहीं क्योंकि आदि-ग्रंथों की अत्याचार-संहिता को स्त्री ने सिरे से नकार दिया है, ऋषियों और गुरुओं का कहा-सुना सब धोखे का सौदा है, क्योंकि आदि- ग्रंथों का सच हैं जाबालाएं और एकलव्य, सूर्पनखा और सीता। जाहिर है, जिन विधानों ने इन स्त्रियों और शिष्यों को अपने युग में जगह दी तो वह जगह दोजख ही कहलाएगी। वे भी बड़े ईमानदार थे, पहले ही घोषणा कर दी- स्त्री और दलित को स्वर्ग भोगने का अधिकार नहीं। मगर आज औरत जान गयी है कि न स्वर्ग किसी देवता के चमत्कार से बनता, न कोई वहां रहने का पट्टा दे सकता। स्वर्गन रक अपने हाथों ही बनते हैं, अपने साहस और बुजदिली से, अपने ज्ञान और अज्ञान से। सच में, हमारे यहां की पुरुष-व्यवस्था अज्ञानी है। नहीं जानती कि औरत अपनी यात्रा में कहां से कहां पहुंच गयी और पुरुष-सत्ता अभी पांसे फेंक रही है, दांव खेल रही है। महिला आयोग के विचारों पर अफसोस किया जा सकता है। गौर करने की बेवकूफी कौन सी औरत करेगी? जरा बुद्धि-विचार तो देख लीजिए कि उनका तर्क है- बहू अपने मायके वालों से एक-एक बात कहती है जिससे मायके के लोग पति-पत्नी के संबंध में हस्तक्षेप करते हैं। इस कारण परिवार टूटते हैं। हस्तक्षेप न करें तो क्या करें? कहें कि हमारी बेटी को जमकर यातना मिले। या आंखें मूंद लें? पहले माता-पिताओं की तरह कहें- डोली यहां से उठी है, अर्थी पति के घर से उठे। यानी कि अब मरने-जीने के लिए तुम वहां अकेली हो, जहां तुमको बैल की तरह दिन-रात जोता जाना ही आदर्श नियम है। अभी तक जो हत्याएं हो रही हैं, वे ज्यादातर इसलिए ही हो रही हैं कि लड़की के माता-पिता उदासीन रहते हैं। पति-पत्नी या बेटी की ससुराल के बीच में आना ‘अशोभनीय’ बताया गया है तो अब यह नयी बात भी जान लेनी चाहिए कि जो कुछ पुराने वक्तों में बताया गया है, वह सारा कुछ सही नहीं है। वह बहुत कुछ बहू-बेटियों के खिलाफ बनाया गया है इसलिए गलत नियमावली में तब्दीली की सख्त जरूरत है। क्या यहां मदरे से भी मोबाइल छीनने का फरमान जारी हो सकता है? क्या वे मोबाइल या ऐसे ही तेज गति के साधनों से सारे काम विवाह संस्था के हित में करते हैं? आपकी कसौटी बड़ी कच्ची है और आप घिसने लगते हैं उस पर स्त्री को, जो अपने इरादों में काफी मजबूत हो चली है।
Thursday, May 5, 2011
मजबूरी आज्ञा पालन की
सबसे बड़ी शादी से औरतों के पक्ष में जो सबसे बड़ी बात निकली, जिसकी किसी ने र्चचा भी नहीं की, वह है ‘ओबे’ (आज्ञा पालन) ना करने की जिद। नयी लड़की का नया आत्मविश्वास है यह। जिसके भीतर उस सामंती, खांटी कट्टरवादी राज-परिवार का हिस्सा बनने का गुरूर हो ना हो, पर इतना है कि उसने अपनी मनवा ली। डायना ने प्रिंस चार्ल्स से कितना ही स्वीकारा हो कि वह उनकी आज्ञा आजीवन मानेगी पर उसने भी चुनौतियां दीं, जबर्दस्त तरीके से दीं और खूब खुल कर दीं। चार्ल्स की दूसरी स्त्रियों में अतिरिक्त रुचि और डायना का अति भावुक स्वभाव इस ‘आज्ञाकारिता’ की सरहदें लांघता हुआ बहुत दूर निकलता गया। संवेदनाओं को समझने के लिए किसी का राजशाही में पैदा होना जरूरी नहीं, संवेदनाएं स्वाभाविक/प्राकृतिक गुण होते हुए भी अनूठी होती हैं, जिनको समझ पाना हंसी-खेल नहीं। ये ज्वार-भाटा की तरह उठती हैं, कभी भी, कहीं भी। किसी शेड्यूल या समय-सीमा में इनको नहीं बांधा जा सकता। कोई ’आज्ञा’ इन पर लगाम नहीं लगा सकती। शुष्क हाव-भाव वाले चेहरे-मोहरे की तरह ही चार्ल्स का व्यवहार भी रूखा ही रहा। नतीजतन, डायना ‘ओबे’ के वायदे पर बंधी ना रह सकी और धीरे-धीरे इसको रौंदती हुई बहुत आगे चली गई। राजपरिवारों में जो चोरी-चुपके होता रहा था, वह सब डायना ने बेहद उन्मादी रूप में करने का जोखिम उठाया। जो डायना कर रही थी, वह सब महारानियां खानसामों और मुनीमों के साथ खूब करती रही थी, पर जो कदम डायना ने उठाया, वह बिंदास था। भय-मुक्त और चुनौती देने वाला। भले ही यह सौम्य प्रतिरोध नयी दुल्हन के स्त्रीवादी वर्चस्व के झंडे गाड़ने में सफल नहीं हो पाया, पर उसका आनंद लेने वाली उसकी मरहूम सास के आत्म-विश्वास को लेकर हमेशा मीडिया नतमस्तक रहा। पुरुष के पदचिन्हों पर चलने वाली कसमें और पति परमेश्वर की आज्ञा को शिरोधार्य करने वाले वायदों से औरतों की ‘मानसिक गुलामी को लगातार सींचा’ जाता है। विवाह के दौरान ’आज्ञा‘ मानने की यह कसम कुछ वैसे ही है, जैसे हिन्दू वैदिक परंपरा में पति की हर बात को मौन- स्वीकृति देने की रीति। हर कदम पर उसका साथ देने का वायदा। कुतर्की कहेंगे, यह दुतरफा होता है पर व्यावहारिक तौर पर तो औरत को वही करना/मानना है जो पति की आज्ञा होती है। आम आदमी से गुलामों की तरह पेश आने को अपनी शान समझने वाले राजशाही परिवार के आगे आज्ञा ना मानने की चुनौती देने की हिम्मत करने वाली यह लड़की शक्ति का प्रतीक है। यह सिर्फ बहू ही नहीं, क्रांति- गाथा लिखने का साहस रखने वाली नयी सोच भी साबित हो सकती है। जरा ठहरिए, समाज को नियमों-कानूनों पर चलाये रखने के लिए आज्ञा-पालन जरूरी है, पर मेरा प्रतिरोध तो पुरुषों की आज्ञा को लेकर है क्योंकि यह भी सामंती सोच ही है। जहां पुरुष मान कर चलता है कि वह श्रेष्ठ है और परिवार की डोर उसके भरोसे ही है। आज्ञा मानना, फॉलो करना, छाया बन जाना तो तभी संभव है, जब परस्परता अपने चरम पर हो। जीवन में यह भाव ठूंसने से काम नहीं कर सकता। शतरे पर जीवन नहीं चलता, भले ही वह वैवाहिक नियमों की ही क्यों ना हों। किसी भी संबंध में जब समर्पणभाव होगा, तब वह स्वाभाविक रूप से आज्ञा पालन करने लगेगा, वरना तो ऐसे ही होगा कि अभिभावकों की तरह भय से आज्ञा मनवाने की परंपरा चलती रहेगी। सम्मान और समर्पण का तो नामोनिशान नहीं रह जाएगा। रिश्तों में समर्पण का भाव बहुत महत्वपूर्ण है, पर यह समर्पण दोनों तरफ से बराबर होगा तो स्वाभाविक रूप से आज्ञा दोनों देंगे और दोनों ही पालन भी करेंगे। जिस आत्मविश्वास के भरोसे केट ’ओबे‘ शब्द को हटवाने की बात भी जुबान पर ला पायी, वह बताता है कि उसको अपने दस बरसों के प्रेम पर कितना विश्वास होगा!
अपने यहां वैवाहिक रस्मों में ‘कन्यादान’ की परंपरा को चुनौती देने का साहस कितनी लड़कियां कर सकी हैं, यह तो अध्ययन का विषय है। कन्यादान को अपने यहां महादान प्रचारित किया गया है। लोगों की मान्यता है कि इसके बिना तो परलोक ही नहीं सुधर सकता। एक तरफ लड़कियों को दुत्कारते हैं, दूसरी तरफ महादान का लोभ भी है! यही है पारंपरिक सोच की असलियत। यही परंपराएं बताती हैं कि स्त्री और धन में कोई भेद नहीं। गौदान की तरह कन्यादान की महिमा-बखान से शास्त्र भरे पड़े हैं। पुत्र-मोह से बचने की बात करने वाले हमारे महाविद्वानों ने पुत्री-मोह की र्चचा ना करके यह पहले ही जता दिया है कि बेटी से मोह का सवाल ही नहीं उठता। वह तो दान-दक्षिणा की चीज है। आज यहां, कल वहां। यहां पिता की इज्जत, वहां पति की। उसकी अपनी ना तो कोई इज्जत है और ना ही कोई स्वाभिमान। वह तो गाय है। दान कर दी। इस खूंटे से उस खूंटे में बांध दिया। बांझ हो गई तो सड़क पर छोड़ दिया। दुधारू रही तब तक खूंटे से बांधे रखा। फिर लौटते हैं, इस आज्ञापालनकर्ता की तरफ। अंग्रेजी में मुहावरा है- आइदर रूल ऑर फॉलो (शासन करो या पालन)। पुरुषों ने बेहद चतुराई से इसको अपने अनुसार ढाल लिया- वी विल रूल एंड यू विल फॉलो। यानी हम शासन करेंगे, तुम पालन करो। जहां पुरुष शासक नहीं भी है, वहां यह भ्रम बनाये रहना चाहता है। वह गुलाम नहीं नजर आना चाहता। गुलामी उसके पौरुष को चुटहिल करती है। पौरुष को उसने ताकत से जोड़ लिया है। पावर मतलब पौरुष। शासनहीनता उसके पौरुष को चुटहिल करती है। वह शर्मसार सा महसूसता है। गुलाम पुरुष भी अपनी औरत पर वैसे ही हेकड़ी जमाता है, जैसे सामंती मानसिकता। जो पुरुष मन से जितना बड़ा गुलाम है, वह उतनी ही अपनी ताकत का प्रदर्शन करना चाहेगा। भीतर से कमजोर पुरुष के लिए पहली शिकार होती है उसकी औरत। जिसको गुलाम बनाये रखने के लिए उसने बेहद चतुराई से उसकी आर्थिक रूप से कमजोर बना डाला। स्थायित्व ना रहने पाये, इसलिए उसको विवाह की आड़ में विस्थापित किया जाता रहा, जो बाद में परंपरा बन गई। विस्थापन का भय, स्थायी रहने का लोभ, उसको भीतर से भुरभुरा ही बनाये रहा। फिर आयी भावनात्मक कमजोरी की बात। अपने यहां औरतों का पालन-पोषण ही ऐसे होता है कि उनका कॉन्फिडेंस लेवल जड़ से तबाह कर दिया जाता है। उनको क्षण-क्षण बताया जाता है कि वे ‘कमजोर’ हैं। उनको सहारे की जबरदस्त जरूरत है। किसी पुरुष की मदद के बगैर वे एक भी कदम नहीं उठा सकती। ‘आज्ञाशीलता’ को उनकी सबसे बड़ी धरोहर बताया जाता है। बच्चों और परिवार को बचाये रखने के लोभ में वह हर पल अपने स्वाभिमान को रौंदे जाते हुए देखने को लाचार बना दी जाती है। स्वाभिमान जितना टूटेगा, गुलामी की प्रवृत्ति उतनी ही हावी होती जाएगी। गुलाम औरतों के पुरुष दीवाने होते हैं। वे शेखी बघारते हैं कि कैसे उन्होंने औरतों का स्वाभिमान चुटहिल किया? कमजोर की आज्ञा कौन मानता है? वह तो जन्मता ही है, पालन करने के लिए। आज की औरत इस कमजोरी के खांचे को तोड़ रही है। आत्म-विश्वास और सम्मान को बढ़ाने के लिए वह हर कीमत चुकाने को तैयार हो चुकी है। आज्ञा पालन का ढोंग करने के नाम पर होने वाली कुंठा को ढोते रहने से उकता चुकी है वह। अपनी जिद पूरी करने और अपने होने का अहसास कराने में वह कोई कोताही नहीं बरतना चाह रही। हारे हुए सिपाही की तरह पीठ पर जख्म खाने की बजाय वह सीने पर चोट खाकर दर्द सहने की तैयारी में है ।
पंचायतों में महिलाओं का आधा राज
बिहार में वर्ष 2006 में जब पंचायतों में 50 फीसद आरक्षण के साथ विभिन्न पदों पर जीत कर आइर्ं तो चारों तरफ आरोपों के शोर थे-महिलाएं पंचायत नहीं चला सकती हैं। वह तो सिर्फ रबर स्टाम्प रहेंगी। काम तो उनके पति, बेटा, पिता, भाई या कोई पुरुष रिश्तेदार ही करेंगे। इन तानों को सुनते हुए भी महिला जनप्रतिनिधियों ने अपने हौसले नहीं खोए। तब द हंगर प्रोजेक्ट ने उस वक्त प्रदेश के चार जिलों के 1000 से अधिक महिला जनप्रतिनिधियों का क्षमतावर्धन करने तथा राजनीतिक गुर सिखाने का काम किया। आज यह अभियान बिहार के 17 जिले के 47 प्रखण्ड के 742 पंचायतों के 5000 संभावित महिला नेताओं के साथ सघन रूप से चलाया जा रहा है। इन प्रयासों के उत्साहवर्धक परिणाम मिले। फिर तो कई उदाहरण सामने आएं, जहां महिला जनप्रतिनिधियों ने अपने काम से पंचायत को नई दिशा दी। पांच साल की इस अवधि में उन्होंने पंचायतों में योजनाओं का क्रियान्वयन, निर्माण कार्य के साथ सामाजिक विकास के भी काम किए। महिला जनप्रतिनिधियों ने स्वशासन को सही संदभरें में समझने की कोशिश की। उन्होंने ग्राम सभा के साथ- साथ वार्ड सभा को भी तबज्जो दिया। लेकिन यह सच है कि बहुतेरी महिलाओं को न तो वास्तव में दायित्व के निर्वहण का अधिकार मिला और न ही निर्णय लेने की आजादी। पंचायतों में 50 फीसद आरक्षण ने सरकार, समाज एवं महिला नेतृत्व के पैरोकार के सामने नई बहस छेड़ दी है। बिहार पंचायती राज व्यवस्था में नित्य नई चुनौतियां बढ़ रही हैं। गौरतलब है कि जहां पहले दहेज में घर- परिवार के वैभव के सामान लिए जाते थे, अब वोट की खरीद के लिए महिलाओं पर दबाव बनाए जाते हैं। परिणामस्वरूप अब पंचायत में राजनीति करने की महत्त्वाकांक्षा रखने वाली महिलाओं के विरुद्ध हिंसा हो रही है। मुजफ्फरपुर जिले के पारू प्रखंड के जाफरपुर पंचायत की मुखिया प्रत्याशी प्रियंका अपनी जान गवां बैठी। कारण रहा-वोट खरीदने के लिए मायके से 2 लाख रुपए न ला पाना। इसी तरह की और भी कई घटनाएं हुईं जो साबित करती हैं कि महिलाओं के प्रति हिंसा के स्वरूप एवं कारणों में तब्दीली हुई है। यह एक नई चोट है-महिलाओं के राजनीतिक अधिकार पर। निस्संदेह बिहार के पंचायती राज व्यवस्था में महिला नेतृत्व की राहें बहुत मुश्किल हैं लेकिन बावजूद इसके वे पंचायत को अपना नेतृत्व देने के लिए उत्साहित हैं। 2011 के पंचायत चुनाव महिला नेतृत्व को बढ़ावा देने, समुदाय द्वारा उन्हें स्वीकार्य करने एवं सशक्त पंचायती राज हेतु स्वीप की तरफ से एक अभियान चलाया जा रहा है। यह पंचायत की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी का उद्देश्य को स्थापित करने के लिए है। महिला नेतृत्व को पंचायत चुनाव में स्वीप कर, पंचायत से सभी कमजोर पहलुओं को दुरुस्त करना और समानता पर आधारित विकसित समाज बनाने की पहल करना है। बिहार में वर्ष 2011 का पंचायत चुनाव के तीसरे चरण से गुजर चुका है। अभी 7 और चरण बाकी हैं, जहां के मतदाता अपने गांव में अपने राज की अवधारणा को सफल बनाने के लिए योग्य नेतृत्व का चयन करेंगे। बेशक महिलाएं राजनीति के सकारात्मक मायने समझ चुकी हैं और वे अपनी इस महत्त्वपूर्ण भूमिका को खुल कर निभाने में लगी हुई हैं। पंचायत चुनाव के दस्तक देने से पूर्व ही महिलाओं ने चुनाव की रणनीति बनानी शरू की। उन्होंने महिला मतदाताओं को राजनीति और इसमें उनकी अहम भूमिका से भी अवगत कराया। पूर्व की महिला जनप्रतिनिधि पुन: पंचायतों में चुनकर आने और पिछले पांच सालों में सीखी गई बातों को जमीन पर उतारने के लिए व्याकुल हैं। दूसरी तरफ घर के आंगन की महिलाएं भी पंचायत की पगडंडियों पर अपने सफर की शुरुआत के लिए उतावली हैं। वह नेतृत्व करना चाहती हैं। अपनी पंचायत का, अपने समुदाय का, समाज का -जहां अभी बहुत काम करना बाकी है। सशक्त महिला नेतृत्व के माध्यम से मजबूत पंचायती राज का सपना तभी साकार होगा जब महिला समुदाय की सक्रिय और सजग भागीदारी पंचायती राज व्यवस्था में होगी।
Wednesday, May 4, 2011
महिलाओं पर चुनावी छींटाकशी
पश्चिम बंगाल के भद्रमानुष अनिल बसु ने तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी पर हाल में जो टिप्पणी की, उससे कई सवाल सामने आ खड़े हुए हैं। सीपीएम के सांसद अनिल बसु ने टिप्पणी की थी कि जिस तरह सोनागाछी (कोलकाता की सेक्स वर्कर बस्ती) में सेक्स वर्कर्स बड़ा ग्राहक मिलने पर छोटे ग्राहक की ओर नहीं देखतीं, उसी तरह तृणमूल कांग्रेस को भी बड़ा ग्राहक मिल गया है। यहां बड़े ग्राहक से उनका अभिप्राय अमेरिका से था, क्योंकि कुछ दिन पहले मीडिया में यह खबर छपी थी कि अमेरिका ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनना देखना चाहता है और अपने हित साधने के लिए वह ममता बनर्जी की पार्टी को फंड भी दे रहा है। सातवीं बार सांसद चुने गए अनभुवी नेता ने ममता बनर्जी पर राजनीतिक हमला करने के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल किया उसे लेकर उनकी काफी आलोचना हुई। उनके इस बयान से पश्चिम बंगाल की महिला मतदाता काफी गुस्से में हैं और सोनागाछी की करीब दस हजार सेक्स वर्कर्स ने तो कोलकाता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक खुला पत्र भेजकर सांसद अनिल बसु के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है। इन महिलाओं ने आरोप लगाया है कि उनकी पहचान एक औरत होने के नाते है और सांसद अनिल बसु ने बयान देते वक्त उनके इस सम्मान को ठेस पहुंचाई है, जिससे साफ है कि उनके मन में महिलाओं के प्रति कोई आदर नहीं है। दरअसल पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य अनिल बसु की महिलाओं को अपमानित करने वाली ऐसी शब्दावली से मार्क्सवादी पार्टी, सरकार व विचारधारा को होने वाले नुकसान को भांपते हुए हरकत में आए और उन्होंने मगरमच्छ के नकली आंसू बहाते हुए माफी मांगी। पर इस भद्रलोक में जब भी वामपंथी महिलाओं को अपमानित करते हैं तो देश में उसकी तीखी प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक है। हालांकि वामपंथी पार्टियां खुद को दूसरी राजनीतिक पार्टियों से अलग व ज्यादा प्रगतिशील राजनीतिक दल होने का दावा करते हैं। संसद व विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण के प्रबल पैरोकार के रूप में अपनी छवि बनाने वाले भी राजनीति में महिलाओं को निशाना बनाते वक्त खुद को दूसरों से अलग नहीं रख पाए। एक तरफ इस राज्य में महिला मतदाता चुनावी जनसभाओं में उम्मीदवारों से विकास व रोजगार को लेकर सवाल कर रही हैं और उनसे पूछ रही हैं कि पश्चिम बंगाल में महिलाओं को टैक्सी चलाने, रिक्शा खींचने और दुकान चलाने में पुरुषों के बराबर हक मिलेगा या नहीं तो दूसरी तरफ अनिल बसु की यह टिप्पणी निराश करने वाली है। केंद्र शासित राज्य पुडुचरी में भी एक कांग्रेसी नेता ने कहा कि उनकी पार्टी महिलाओं को बच्चों को छोड़कर सब कुछ दे सकती है। दरअसल, चुनाव के दौरान राजनेता महिला उम्मीदवारों के औरतपन को खास निशाना बनाने लगे हैं। देश की आजादी के बाद के यदि चुनाव इतिहास को देखें तो पता चलता है कि वर्ष 1999 से पहले राजनीतिक दल स्ति्रयों की मर्यादा से जुड़े मुद्दों को चुनाव में उछालने से बचते थे। इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में भी विपक्षी नेताओं ने इंदिरा गांधी की निजी जिंदगी पर टिप्पणी करने की बजाय उनकी तानाशाहीपूर्ण कार्यशैली को ही निशाना बनाया था। जॉर्ज फर्नाडीज तक ने उस समय संयम बरता, लेकिन इस समाजवादी नेता का यह संयम उस समय टूट गया जब उन्होंने 1999 में कर्नाटक के वेल्लारी में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर एक चुनाव रैली में टिप्पणी की कि सोनिया गांधी का इस देश के प्रति क्या योगदान है, सिवाय इसके कि उन्होंने देश को दो बच्चे पैदा करके दिए। बदले में कांग्रेस पार्टी के एक नेता ने इस समाजवादी नेता की महिला मित्र पर निशाना साधा था। दक्षिण भारत में भी यह प्रवृत्ति दिखाई देती है। डीएमके नेता करुणानिधि ने कहा था कि यदि जयललिता अपनी राजनैतिक रैली में गाना गा सकती हैं तो अगली बार वह डांस करेंगी। 2004 के आम चुनाव में डीएमके ने अपने मुखपत्र में जयललिता के लिए तमिल शब्द मरलडी का प्रयोग किया था, जिसका मतलब बेऔलाद औरत है। इसे जयललिता की तौहीन समझ उनकी पार्टी के लोगों ने बदला लेने के लिए करुणानिधि के परिवार की एक औरत को ही निशाना बनाया। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी 2009 के आम चुनाव में उस समय खासतौर पर फोकस हुए, जब उन्होंने कांग्रेस के लिए कभी बुढि़या तो कभी गुडि़या शब्द का इस्तेमाल किया था। दरअसल, नरेंद्र मोदी जोश में यह भूल गए कि वह परोक्ष रूप से सोनिया गांधी पर वार करते हुए जिस शब्दावली का प्रयोग कर रहे हैं, उसे लेकर महिलाएं किस तरह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगी। ऐसा पुरुषवादी राजनीतिक विमर्श स्ति्रयों के लिए अपमानजनक और आपत्तिजनक है। राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष व पूर्व केंद्रीय रेलमंत्री लालू यादव ने तो भाजपा की नेता सुषमा स्वराज को पूतना तक कह डाला था। फिल्मी अदाकारा जयप्रदा पर भी निजी कमेंट किए गए। ऐसे लोगों की स्त्री विमर्श सीमा का दायरा बहुत ही संकीर्ण है, लिहाजा इनका बयान भी स्त्री बदन की आसपास ही टिका रहता है। यह लोग एक स्त्री से परे जाकर उसकी राजनीतिक क्षमता का ईमानदारी से आकलन नहीं करते। पुरुष नेताओं को लगता है कि आज भी महिलाओं को राजनीति से दूर रखने के लिए सबसे ज्यादा घातक व धारदार हथियार उसकी निजी जिंदगी ही हैं। मशहूर फिल्म आंधी में भी इस विषय को उठाया गया था। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव में महिला उम्मीदवारों को इस तरह अपमानित करना उसकी साख पर धब्बा लगाना ही है। एक तरफ चुनाव में मतदान करने वाली महिला मतदताओं की संख्या बढ़ी है तो दूसरी ओर महिला उम्मीदवारों की भी। अब महिलाएं राजनीति को कैरिअर के रूप में भी देख रहीं हैं। पंचायत व नगर निगम चुनावों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का संकेत है। संसद व विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग से भी माहौल बना है। 2004 में 45 महिलाएं चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंची थी जबकि 2009 में 59 महिला सांसदों ने जीत हासिल कर एक रिकॉर्ड बनाया। बिना किसी आरक्षण नीति के महिलाएं आगे बढ़ रही हैं तो उनकी हिम्मत बनाए रखने के लिए ऐसा माहौल बनाने की दरकार है, जो उन्हें आगे ले जाए। परिपक्व हो रहे भारतीय लोकतंत्र का यह एक दुखद पहलू ही है कि राजनीति करते समय पुरुष राजनेता उन्हें राजनीतिज्ञ न समझकर महज एक औरत समझ बैठते हैं। सीपीएम के अनिल बसु ने भी ऐसी ही अशिष्ट टिप्पणी कर भले ही सुर्खियां बटोरी हों मगर उनका नाम महिलाओं को अपमानित करने वाले राजनेता वाली सूची में जरूर दर्ज हो गया है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
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