Friday, April 22, 2011

जाति की जड़ें काटतीं औरतें


उस्मानाबाद जिले में अनुसूचित जाति की आबादी 15 प्रतिशत से भी ज्यादा है मगर 85 प्रतिशत से भी ज्यादा परिवार अपनी रोजी-रोटी के लिए या तो सवर्णो के खेतों में काम करते हैं या फिर चीनी की मिलों के वास्ते गन्ने काटने के लिए पलायन करते हैं
देश में कुल आबादी का एक-चौथाई हिस्सा दलितों और आदिवासियों का है मगर उनके पास खेतीलायक जमीन का महज 17.9 प्रतिशत हिस्सा है। इसी तरह, कुल आबादी में करीब आधी हिस्सेदारी औरतों की है, जो कुल मेहनत में बड़ी हिस्सेदारी निभाती हैं और उन्हें कुल आमदनी का 10वां हिस्सा मिलता है। ऐसे में दलित और उस पर भी एक औरत होने की स्थिति को आसानी से समझा जा सकता है। मगर मराठवाड़ा की दलित औरतें धीरे-धीरे जाति की जड़ों को काट और पथरीली जमीन से फसल उगाकर अपना दर्जा खुद तय कर रही हैं। उस्मानाबाद जिले में अनुसूचित जाति की आबादी 15 प्रतिशत से भी ज्यादा है मगर 85 प्रतिशत से भी ज्यादा परिवार अपनी रोजी-रोटी के लिए या तो सवर्णो के खेतों में काम करते हैं या फिर गन्ना मिलों के वास्ते गन्ने काटने के लिए पलायन करते हैं। स्थायी आजीविका न होने से उनके सामने जीने के कई सवाल खड़े रहते हैं। मराठवाड़ा में 'कुल कितनी जमीनों में से कितना अन्न उगाया है' के हिसाब से किसी आदमी की सामाजिक-आर्थिक स्थितियां बनती-बिगड़ती हैं। तारामती अपने तजुर्बे से ऐसी बातें अब खूब जानती हैं। 'लड़कियों का बेहिसाब घूमना या किसी गैर से खुलकर बतियाना, यह कोई अच्छे रंग-ढंग तो नहीं', बचपन से हमें यही तो सुनाया जाता है। लेकिन तारामती अब वैसी नहीं रही, जैसी वह पहले थी। नहीं तो बहुत पहले, किसी अजनबी आदमी को देखा नहीं कि जा छिपती थीं रिवाजों की ओट में। इस तरह यहां बाहरी मर्द से बतियाने का कोई सवाल ही नहीं उठता था। दलित परिवार की तारामती के सामने ऐसे कई सवाल कभी नहीं उठे थे। उसे तो अपने पति को पिटते हुए देखकर भी चुप रहना था। गांव के दबंग जाति वालों से पूरी मजूरी मांगने की हिम्मत न उसमें थी, न उसके पति में। ऐसा सुलूक तो शुरू से ही होता रहा है, सो यह कोई बड़ी बात भी नहीं लगती थी। इसके बावजूद, अगर कोई विरोध होता भी था तो मजाल है कि चारदीवारी से बाहर निकल सके। उस पर भी एक औरत की क्या बिसात कि वह ऐसी बातों पर खुसुर-फुसुर भी कर सके। '6 साल पहले यहां की औरतों को हमने ऐसी ही हालत में देखा- पाया था।' लोकहित समाज विकास संस्थान के बजरंग टाटे आगे बताते हैं, 'काम शुरू करने के बाद हम हर रोज यहां आते-जाते, मगर जो भी बातें निकलकर आतीं वे सिर्फ मर्दों की होतीं। हम औरतों के सोचने की आदत के बारे में भी जानना चाहते थे। तब स्वयं सहायता-समूह ने औरतों के विचारों को आपस में जोड़ने के लिए कड़ी का काम किया। इस समूह के जरिए धीरे-धीरे पता चला कि औरतों के भीतर गुस्सा कूट-कूटकर भरा है, वह बहुत कुछ बदल देना चाहती हैं, उन्हें अगर खुलेआम बोलने का मौका भी मिला तो काफी कुछ बदल जाएगा।' ग्राम धोकी, जिला उस्मानाबाद से तारामती जैसी दर्जनों औरतें धीरे-धीरे ही सही, मगर सबके भीतर भरे गुस्से से एक होती चली गई। लंबा वक्त गुजरा, एक रोज धोकी की औरतों ने र्चचा में पाया कि जब तक जमीनों से फसल नहीं लेंगे, तब तक रोज-रोज की मजूरी के भरोसे ही बैठे रहेंगे। अगले रोज सबके भरोसे में उन्होंने अपना-अपना भरोसा जताया और गांव से बाहर बंजर पड़ी अपनी जमीनों पर खेती करने की हिम्मत जुटायी। जैसी कि आशंका थी, गांव में दबंग जाति वालों के अत्याचार बढ़ गए। उन्होंने सोचा कि जो कल तक हमारे गुलाम थे, वे अगर मालिक बने तो उनके खेत कौन जोतेगा! हीरा बारेक उन दिनों को याद करती हैं, 'पंचायत चलाने वाले ऐसे बड़े लोगों ने मेरे परिवार को खूब धमकियां दीं। मगर अब हम अकेले नहीं थे, संगठन के कई लोग भी तो हमारे साथ थे। इसलिए सबके साथ मैंने आगे आकर ललकारा कि अगर तुम अपनी ताकत आजमाओगे, मेरे पति को मारोगे, तो हम भी दिखा देंगे कि हम क्या कर सकती हैं।'
एक बार दबंग जाति वालों ने कुछ दलित औरतों को जमीनों पर काम करते देखा तो उनके पतियों को बुलवाया। गांव में बंद करने जैसी धमकियां भी दीं। अगली सुबह तारामती और उनकी सहेलियों ने अपने- अपने घरों से निकलते हुए कहा कि मदरे को डर लगता है तो रहो इधर ही, हम तो काम पर जाते हैं। थोड़ी देर बाद, कई दलित मर्द जमीनों पर आए। कुल जमा 50 जनों ने वहीं बैठकर फैसला लिया कि वे गांव में भी समूह बनाकर रहेंगे और खेतों पर भी। और इसी के बाद 'स्वयं सहायता- समूह' की बैठक में औरतों के साथ पहली बार मर्द भी बैठे। इसके पहले तक तो औरतों का समूह अपनी रोजमर्रा की बातों पर ही बतियाता था, मगर इस बार यह समूह गांव के नल से पानी भरने जैसी बातों पर भी गंभीर हो गया। यहां की औरतों ने पानी में अपनी हिस्सेदारी के लिए लड़ने का मन बना लिया। खुद को ऊंची जाति का कहने वालों ने सार्वजनिक उपयोगों की जिन बातों पर रोक लगाई थी, वे एक-एक करके टूटने लगी थीं। यह सच था कि तारामती के समूह से जुड़ी औरतों के मुकाबले दूसरी जाति की औरतों में भिन्नताएं साफ-साफ दिखती थीं। फिर भी एक बात सारी औरतों को एक साथ जोड़ती थी कि परंपराओं के लिहाज से सबको मान-मर्यादा का ख्याल रखना ही है। ऐसे में, तारामती और उसके समूह के गांव से बाहर आने-जाने, बार-बार संगठन के दूसरे साथियों से मिलने-जुलने के ऐसे मतलब निकाले गए जो उनके चरित्र पर हमला करते थे। तारामती नहीं रुकी, एक कदम आगे जाकर उसने उप-सरपंच का चुनाव भी लड़ा। यह अलग बात है कि वह चुनाव हार गई। मगर जहां किसी दलित के चुनाव लड़ने को सामान्य खबर नहीं माना जाता, वहां एक दलित औरत के मैदान में कूदने की र्चचा तो गर्म होनी ही थी! तारामती, हीरा बारेक, संगीता कस्बे को तो और आगे जाना था, इसलिए यहां पहली बार मदरे के बराबर मजूरी की मांग उठी। इससे पहले इन्हें रोजाना 40 रुपये मजूरी मिलती थी, जो मदरे के मुकाबले आधी थी। विरोध के बाद उन्हें रोजाना 65 रुपये मजूरी मिलने लगी, जो मदरे से थोड़ी ही कम थी। तारामती के समूह की औरतें पंचायत में जगह से लेकर जायज मजूरी पाने की जद्दोजहद इसलिए कर सकीं, क्योंकि आजीविका के लिहाज से उन्हें अपने खेतों से फसल मिलने लगी थी। संगीता कस्बे बताती हैं, 'इससे पहले, वे (सवर्ण) हमें नाम की बजाय जाति से बुलाते थे। जाति न हो जैसे गाली हो। 'क्या रे ऐ मान', 'क्यों रे महार', ऐसे बोलते थे। अब वे इज्जत से बुलाते हैं, बतियाते हैं। 'आज तुम काम पर आ सकते हो या नहीं', ऐसे पूछते हैं। सबसे बढ़कर तो यह हुआ कि पंचायत से हमारे काम होने लगे। हम जानने लगे कि सही क्या है, हक क्या है? हर चीज केवल उनके हिसाब से तो नहीं चल सकती है ना।' हम जब तारामती के समूह से बतिया रहे थे, तो दूर के डोराला गांव से कुछ औरतें भी पहुंचीं। वह भी अपने यहां 'स्वयं सहायता समूह'
बनाना चाहती थीं। उसी समय जाना कि औरतों का समूह जरूरत पड़ने पर मदरे को भी कर्ज देता है। इस समूह में बच्चों की पढ़ाई और किसी अनहोनी से निपटने को वरीयता दी जाती है। पांडुरंग निवरूति ने बताया कि आसपास ऐसे 16 महिला घट बनाये गए हैं। हर घट में कम से कम 10 औरतें तो रहती ही हैं।'
तारामती कहती हैं, 'अगर हम ऐसे ही बैठे रहते तो जो थोड़ा-बहुत पाया है, वह भी हाथ नहीं लगता। ऐसा भी नहीं है कि हमारी हालत बहुत सुधर गई है, अब भी काफी कुछ करना है।'
यह सच है कि यहां काफी कुछ नहीं बदला है, फिर भी कम से कम इन औरतों की दुनिया बेबसी के परंपरागत चंगुलों और उनके बीच उलझी निर्भरताओं से किनारा पा चुकी है। ये अब अपने बच्चे को स्कूल भेजकर बेहतर सपना देख सकती हैं। माया शिंदे की यह कविता यहां की जिंदगियों में आ रहे बदलावों को बयान करने के लिए काफी है : 'मुझे अपना हक पता है/फिर कैसे किसी को अपना कुछ भी यूं ही निगलने दूं/हो जाल कितना भी घना/कितना भी शातिर हो बहेलिया। अंत तक लड़ता है चूहा भी/उड़ना नहीं भूलती है कोई चिड़िया कभी।'
चलते-चलते उस्मानाबाद जिले के 29 गांवों में जो वहां की जमीन पर खेती करने की मुहिम चलाई जा रही है, उसका नेतृत्व औरतों के हाथ में है। इसके तहत अब 702 परिवारों की औरतें अपनी जमीनों के रास्ते जात-पांत से लेकर सभी तरह के भेदभाव तो मिटा रही हैं। साथ ही पंचायत, स्कूल और बाकी जगहों पर भी अपने परिवार की उपस्थिति दर्ज करा रही हैं।


Friday, April 15, 2011

पंजाबी महिलाओं में पढ़ने की लगन अधिक


 साक्षरता के मामले में देश में 21वें स्थान पर बैठे पंजाब का सिर शर्म से भले ही झुका हुआ है, लेकिन वह इस बात पर गर्व कर सकता है कि उसके सूबे की महिलाओं में शिक्षा हासिल करने का रुझान पुरुषों के मुकाबले काफी बेहतर है। प्रदेश में पिछले दस वर्षो में पुरुषों में साक्षरता दर में 6.3 फीसदी सुधार हुआ है जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा 7.9 फीसदी रहा। दस साल पहले पुरुषों की साक्षरता दर 75.2 थी, जो अब 81.5 हो गई, जबकि महिलाओं में साक्षरता दर अब 71.3 फीसदी हो गई, जो दस साल पहले 63.4 थी। मालूम हो कि वर्ष 2001 में प्रदेश में औसत साक्षरता दर 69.7 फीसदी थी जो 2011 में बढ़कर 76.7 हो गई है। सबसे अनपढ़ जिले मानसा में वर्ष 2001 की जनगणना के दौरान साक्षरता दर मात्र 52.4 फीसदी थी, जो 10 फीसदी की बढ़ोतरी से जनगणना 2011 में 62.8 प्रतिशत पर पहुंच गई। दस साल पहले मानसा जिले की पुरुष साक्षरता दर 58.9 फीसदी थी, जो अब बढ़कर 68.4 फीसदी हो गई। यानी 9.5 फीसदी का सुधार। दस साल पहले इस जिले की महिलाओं में साक्षरता दर केवल 45.2 थी, जो जनगणना-2011 तक 11.2 फीसदी सुधार के साथ 56.4 फीसदी हो गई। होशियारपुर वर्तमान साक्षरता दर 85.4 फीसदी के साथ सभी जिलों में अव्वल है, जो पिछले एक दशक के दौरान 81 फीसदी थी। यानी 4.4 फीसदी का सुधार हुआ। इस जिले में पुरुष व महिला साक्षरता दर में क्रमश: 3.5 फीसदी और 5.5 फीसदी सुधार हुआ। बरनाला जिले में साक्षरता दर 60.3 फीसदी से बढ़कर 68.9 फीसदी हो गई, लेकिन इस बढ़ोतरी में महिलाओं का योगदान कहीं ज्यादा कहा जाएगा, क्योंकि पुरुषों में 5.7 फीसदी वृद्धि के साथ साक्षरता दर 73.1 हो गई। महिलाओं में 9.6 फीसदी की बढ़ोत्तरी के साथ साक्षरता दर इस बार 64.1 हो गई। इसी तरह साक्षरता में संगरूर जिले के पुरुषों में 8.2 फीसदी के मुकाबले महिलाओं में 9.9 फीसदी का सुधार हुआ। बठिंडा में पुरुषों में साक्षरता दर 7.5 फीसदी और महिलाओं में 9.2 फीसदी, गुरदासपुर में क्रमश: 6.1 8.6 फीसदी, जालंधर में क्रमश: 3.9 5.2 फीसदी का सुधार हुआ। यही रुझान अन्य सभी जिलों का है, जहां महिलाओं में साक्षरता सुधार दर पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा है|

Wednesday, April 13, 2011

एक सराहनीय शुरुआत


पंजाब में लड़कियों की संख्या बढ़ने पर लेखक की टिप्पणी
पंजाब के लिए यह सुखद समाचार है कि यहां नवजात लड़कियों की संख्या बढ़ी अथवा यूं कहिए कि कुछ लड़कियां मरने से बच गई। शुभ समाचार यह भी है कि एक सौ दस वर्ष बाद महिलाओं की संख्या पंजाब में एक हजार पुरुषों के मुकाबले 893 हुई। जिस पंजाब में सन 2001 में जीरो से छह वर्ष की आयु की लड़कियां प्रति हजार लड़कों की तुलना में केवल 798 रह गई थीं, अब 846 हो गई। इसके साथ ही पंजाब में नवजात बच्चों की मृत्यु दर कम हुई है। वर्ष 2007 तक पंजाब में पैदा हुए एक हजार बच्चों में से 43 बच्चे अपने जीवन का प्रथम वर्ष भी पूरा नहीं कर पाते थे अर्थात प्रति वर्ष बीस हजार से ज्यादा बच्चे मौत के मुंह में चले जाते थे। इसका कारण कभी निरक्षरता, कभी गरीबी कहा जाता, पर वास्तविकता यह थी कि कुछ लोग अंधविश्वास के कारण और कुछ अज्ञानता के कारण सरकारी अस्पतालों में प्रसव के लिए नहीं जाते थे। अब मेरे लिए विशेषकर यह हर्ष और गौरव का विषय है कि सन 2009 के आंकड़ों के अनुसार पंजाब में यह मृत्यु दर 38 रह गई है। पिछले चार वर्षो में पंजाब में अस्पतालों में प्रसव करवाने का चलन बढ़ा है। जहां 2007 में करीब 35 हजार माताएं ही अस्पताल में जाती थीं, सन 2010-11 में एक लाख बीस हजार से ज्यादा माताओं ने सरकारी अस्पतालों में बच्चों को जन्म दिया। सुरक्षित और प्रशिक्षित हाथों में जब मां बच्चे को जन्म देती है तो बहुत सी बीमारियों से मां-बच्चा सुरक्षित रहते हैं और यही कारण है कि बच्चों की मृत्यु दर कम हुई है। लड़कियों की संख्या बढ़ने का भी एक बड़ा कारण यह है कि नवजात शिशुओं की मृत्यु दर कम हुई है। जिस दिन से भारत सरकार ने जनगणना के आधार पर यह जानकारी दी है कि पंजाब में लिंगानुपात में सुधार हुआ है, उसी दिन से इसका श्रेय लेने वालों की सूची भी लंबी होती जा रही है। मेरा यह विश्वास है अगर हम सब निर्णय कर लें कि लड़कियों को नहीं मरने देना तो यह काम केवल एक वर्ष में पूरा हो सकता है। जिस देश में लोक हित की जगह परिवार हित भारी हो जाता है, वहां कभी सुधार हो ही नहीं सकते। सब जानते हैं कि डॉक्टर द्वारा मशीनी परीक्षण के बिना मां के गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग ज्ञात नहीं होता। कुछ डॉक्टर चांदी के चंद सिक्कों के लिए ये हत्याएं करवाते हैं और गर्भपात का काम भी तो चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति ही करते हैं। हम निश्चित ही ये हत्याएं बंद करवाने में कामयाब हो सकते हैं, अगर कुछ प्रभावी व्यक्ति उन्हें संरक्षण देना बंद कर दें जो ये गैरकानूनी, अमानवीय और घृणित कार्य करते हैं। पंजाब में और देश में ऐसी बहुत सी घटनाएं हो चुकी हैं जहां सत्य की आवाज उठाने वालों को हमेशा के लिए खामोश कर दिया जाता है। नाम अलग-अलग हैं, जैसे सोनवले, सत्येंद्र दुबे, षणमुगम आदि। पर सबका दोष एक ही था, सच के लिए आवाज उठाना। पंजाब में भी कभी अजन्मी बेटियों को मरवाने वालों के पक्ष में हो-हल्ला मचा, कभी खाद्य पदार्थो की शुद्धता की जांच करने गए अधिकारी पीटे गए, कभी नशीली दवाइयां बेचने वालों के समर्थकों ने भरे बाजार इंस्पेक्टर को अपमानित किया, उन्हें घायल किया और कभी किसी अल्ट्रासाउंड सेंटर को बंद करने वाले अधिकारी अवैध ढंग से बंद कर दिए गए। दुखद पक्ष यह कि कानून लागू करवाने वाले भी सुनना, बोलना और काम करना छोड़ गए। मेरा मानना है कि हम कामयाब हो सकते हैं, लड़कियां मरने से बचा सकते हैं, भोजन की शुद्धता की गारंटी कर सकते हैं, नशे और नशीली दवाइयों पर नकेल कस सकते हैं, अगर सारा समाज साथ दे; सही को सही कहने की हिम्मत जुटाए; वोट, रुपया और रिश्तेदारी के मोह के बंधन से कम से कम एक वर्ष के लिए मुक्त हो जाए और गांधीजी के तीन बंदरों ने जो संदेश दिया उसे केवल पारिवारिक शांति के लिए रख दें। सामाजिक बुराइयों, कुरीतियों को समाप्त करने के लिए हम सब देखें, बोलें और सुनें। इसके बाद सही निर्णय लेकर कर्म क्षेत्र में उतरें। (लेखिका पंजाब सरकार में मंत्री हैं).

Saturday, April 9, 2011

आरटीआइ की लाठी से व्यवस्था सुधार में जुटी महिलाएं


सूचना अधिकार कानून ने बिहार की महिलाओं को सशक्त बना दिया है। ग्राम पंचायतों में काबिज महिला जनप्रतिनिधि केंद्रीय योजनाओं को लागू कराने के लिए इस कानून का सहारा ले रही है। भत्ता मिलने में टालमटोल हो, वृद्धावस्था पेंशन या फिर इंदिरा आवास की जानकारी महिलाएं सूचना अधिकार कानून के तहत बाबुओं व अफसरों से अपनी बातें मनवा रहीं हैं। कर्तव्य की नाव को पार लगाने में इन प्रतिनिधियों के लिए आरटीआइ पतवार का काम कर रही है। सासाराम जिले के धौडाढ़ पंचायत प्रतिनिधियों को भत्ता नहीं मिल रहा था। मुखिया टालमटोल कर रहे थे। प्रखंड कार्यालय में भी कोई सीधे मुंह जवाब नहीं दे रहा था। सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़ीं इन महिलाओं को भत्ता न मिलने से पंचायत की बैठक निर्रथक लगने लगी। त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के सबसे निचले पायदान वाली वार्ड सदस्य रामामुनी देवी की अगुवाई में बीडीओ कार्यालय से आरटीआइ के तहत जानकारी मांगी गयी। जिसका तुरंत असर हुआ। जानकारी दी गई कि पंचायत सदस्यों को प्रति बैठक 100 रुपये तथा दलित पिछड़े सदस्यों को विशेष भत्ते के रूप में 100 रुपये दिए जा चुके हैं। इस मद में पंचायत को 22326 रुपये जारी होने की जानकारी दी गई।आरटीआइ के खुलासे पर बगले झांकते मुखिया ने मजबूरन सदस्यों को पैसा रिलीज किया। बेलाढ़ी पंचायत की वार्ड सदस्य गीता देवी ने वृद्धावस्था पेंशन के फार्म जमा किये। पर नाम सूची में नहीं थे। गीता ने आरटीआइ के तहत अपने वार्ड के पेंशनधारियों की सूची मांगी है। अमरी पंचायत की धर्मशीला देवी ने वार्ड के बीपीएल को इंदिरा आवास नहीं मिला तो आरटीआइ के तहत कार्यालय से जानकारी मांगी। कई महिला प्रतिनिधियों ने आंगनबाड़ी से संबंधित सूचनाएं मांगी हैं। राज्य में महिला जनप्रतिनिधियों के बीच कार्य कर रही हंगर प्रोजेक्ट की शाहिना परवीन कहती हैं कि पंचायती राज व्यवस्था में ग्रामीण महिलाओं के आगे आने से व्यवस्था में निश्चित रूप से परिवर्तन होगा। अब इनके कर्तव्य निर्वहन के लिए यह अधिकार एक पतवार के रूप में काम कर रहा है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने के साथ -साथ महिला जनप्रतिनिधियों के महत्व को भी स्थापित कर रहा है। लोग कहते हैं कि अब वह दिन दूर नहीं जब ये आरटीआइ वाली महिलाएं पंचायतों में महिला आरक्षण को सार्थकता प्रदान करेंगी।


Thursday, April 7, 2011

कन्याओं के लिए कहर बनी बढ़ती साक्षरता


लोगों ने अक्षर ज्ञान तो बढ़ा लिया, लेकिन रूढि़यों के चंगुल से मुक्त न हो सके। देश में पढ़े-लिखे लोग फैमिली प्लानिंग करने लगे हैं, मगर सिर्फ बेटों की। वर्ष 2011 की जनसंख्या के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि ऐसी जगह 6 साल तक की उम्र वाली बेटियों की संख्या कम हुई है जहां साक्षरता दर तेज गति से बढ़ी है। दूसरी ओर ऐसे जिले जहां साक्षरता में तो खास इजाफा नहीं हुआ पर बच्चियों की औसत संख्या जरूर बढ़ी। यह हाल राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से लेकर यूपी, उत्तराखंड और मप्र जैसे राज्यों में देखने को मिला है। शुरुआत राजधानी दिल्ली से करते हैं। यहां दस वर्ष के अंदर 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिंगानुपात में कमी आई है। इस आयु वर्ग की बच्चियों की संख्या वर्ष 2001 में प्रति हजार बालकों के मुकाबले 927 थी जो 2011 में घटकर 914 रह गई है। इसमें भी संभ्रांत इलाकों में कन्याओं के लैंगिक अनुपात में ज्यादा गिरावट आई है। ये इलाके हैं दक्षिणी, नई दिल्ली और उत्तरी दिल्ली आदि, जबकि यहां अधिकतर लोगों के पास न तो पैसे की कमी है, और न ही शिक्षा की। उत्तर प्रदेश में साक्षरता बढ़ने के बावजूद बेटियों से परहेज जारी है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि 2001-11 के दौरान सूबे में जहां महिलाओं की आबादी की वृद्धि दर पुरुषों से अधिक रही, वहीं इस अवधि में 0-6 वर्ष आयु वर्ग में प्रति एक हजार लड़कों पर 17 लड़कियां कम हो गई हैं। पहले जहां लड़कियों की संख्या 916 थी, वहीं अब यह घटकर 899 रह गई है। दूसरी ओर सूबे के जिन जिलों की साक्षरता दर कम है, वहां लिंगानुपात बढ़ा है। मसलन बलरामपुर में साक्षरता दर 51.76 फीसदी है, लेकिन यहां 0-6 वर्ष आयु वर्ग का लिंगानुपात 968 है जो सूबे में सर्वाधिक है। इसी तरह बहराइच की साक्षरता दर 51.10 प्रतिशत है, जबकि इस आयु वर्ग में लिंगानुपात 933 है। शिक्षा का यह साइड इफेक्ट उत्तराखंड में भी साफ दिखाई देता है। राजधानी देहरादून की साक्षरता दर 6 फीसदी बढ़कर 85.24 प्रतिशत हो गई है लेकिन 0-6 वर्ष तक के आयु वर्ग का लिंगानुपात 2001 में 894 के मुकाबले 5 अंक घटकर 889 रह गया है। चमोली, पौड़ी व पिथौरागढ़ जिले में तो यह फासला 30 से 90 अंको तक का हो गया है। मप्र का भी हाल कुछ ऐसा ही है। आदिवासी अंचल जो शहरी इलाकों की अपेक्षा कम साक्षर क्षेत्र माना जाता है, उनमें 0-6 आयु वर्ग तक के बच्चों का लिंगानुपात बेहतर हुआ है। आदिवासी बहुल जिले अलिराजपुर में इस आयु वर्ग की बेटियों की संख्या प्रति एक हजार बालकों के मुकाबले 971 हो गई है|