Saturday, July 14, 2012

पंचायती फरमान ने खड़ा किया तूफान


बागपत जिले की एक खाप पंचायत की ओर से मुख्यत: महिलाओं पर किस्म-किस्म की बंदिश लगाने वाले अजीबोगरीब फैसलों ने सामाजिक-राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में तूफान सा खड़ा कर दिया है। इलाके में कानून-व्यवस्था का भी संकट खड़ा कर दिया है। पंचायत की अगुवाई करने वाले मोहकम और मुजाहिर को गुरुवार रात पुलिस थाने ले गई तो ग्रामीणों ने विरोधस्वरूप दिल्ली-सहारनपुर हाइवे जाम किया। पुलिस के पहुंचने पर उसके साथ मारपीट की और बाइक फूंक दी। पुलिस ने जब दोनों को छोड़ा, तब जाम खुला। इस घटना पर आइजी (कानून एवं व्यवस्था) बीपी सिंह ने कहा है कि पुलिसकर्मियों पर हमला करने वाले लोगों के खिलाफ कठोर कारवाई की जाएगी। अगर पंचायत ने इस तरह का फरमान सुनाया है तो इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बागपत पुलिस ने इस घटना में शामिल 15 लोगों की पहचान का दावा किया है। बावजूद इसके खाप पंचायत अपने तुगलकी फरमान पर अड़ी है। केंद्रीय गृहमंत्री पी चिंदबरम ने इस फरमान को अलोकतांत्रिक करार देते हुए यूपी सरकार से अपील की है कि वह ऐसे लोगों पर कार्रवाई करे जो गैर कानूनी आदेश थोपने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि राज्य कैबिनेट मंत्री आजम खां ने शुक्रवार को लखनऊ में कहा कि पंचायत ने फरमान नहीं सुनाया है। वह उनकी राय है। अपनी-अपनी बिरादरी के लिए समय-समय पर पंचायतों की तरफ से इस तरह की राय आती रहती हैं। यह जरूरी नहीं कि इसे सभी लोग माने। सरकार यह देख रही है कि कानून से टकराव न होने पाए। तमाम महिला संगठनों के साथ राज्य महिला आयोग ने इसे गंभीरता से लिया है। आयोग की सदस्य सचिव अनीता वर्मा सिंह ने बागपत के डीएम से मामले पर तत्काल रिपोर्ट मांगी है। बीते दिनों बागपत जिले के मुस्लिम बहुल असारा गांव में 36 बिरादरी की पंचायत ने प्रेम विवाह पर चर्चा करने के बाद सर्वसम्मति से यह फैसला किया कि अपनी मर्जी से विवाह करने वाले युवक-युवतियों को गांव में नहीं रहने दिया जाएगा। इससे बिरादरी के साथ-साथ गांव की भी बदनामी होती है। पंचायत ने यह भी तय किया कि 40 वर्ष की उम्र से कम महिला गांव में लगने वाली साप्ताहिक बाजार में नहीं जाएगी और वे मोबाइल भी इस्तेमाल नहीं कर सकेंगी। गांव की गलियों में कोई युवक ईयर फोन लगाकर नहीं चलेगा। युवतियों को भी गलियों में सिर पर चुन्नी रखकर चलना होगा। पंचायत ने दहेज को अभिशाप बताते हुए निर्णय सुनाया था कि गांव के लोग न दहेज लेंगे न देंगे और यदि कोई इसका उल्लंघन करेगा तो उसके खिलाफ पंचायती कार्रवाई होगी। पंचायत में हिंदू व मुस्लिम समाज के 250 लोगों ने शिरकत की। पंचायत के फैसलों पर सभी बिरादरियों ने सहमति जताई। फैसले के खिलाफ जाने वालों को दंड देने की जिम्मेदारी बिरादरियों की पंचायत पर छोड़ी गई थी। ज्यादातर गांव वाले मोबाइल फोन को तमाम समस्याओं की जड़ मानते हैं। इस इलाके की खाप पंचायतें पहले भी इस तरह के फरमान सुना चुकी हैं। एक पंचायत अविवाहित लड़कियों के मोबाइल फोन पर पाबंदी लगा चुकी है और एक अन्य शादियों पर डीजे का इस्तेमाल प्रतिबंधित कर चुकी है। 

बिकने को मजबूर लाचार लड़कियां

एक गैर सरकारी संस्था ने कुछ समय पहले दिल्ली के द्वारका स्थित एक फ्लैट से घरेलू नौकरानी के रूप में काम करने वाली 13 साल की एक मासूम को उस समय मुक्त कराया था जब उसके मालिक उसे घर पर ही बंद कर विदेश घूमने चले गए। झारखंड के गुमला जिले की रहने वाली यह बच्ची न केवल घर में बंद थी बल्कि तीन दिनों से भूखी भी थी। उसका कहना था कि मालिक उसे डरा धमका कर रखते थे और बाहर जाने पर पुलिस से पकड़वाने की बात भी कहते थे। उसे नाखूनों के जख्म दिए जाते थे और कभी-कभी खाना तक नहीं मिलता था। यह घटना रांची की रहने वाली एक और नाबालिग के साथ करीब चार साल पहले की भी याद दिलाती है जो दिल्ली स्थित अपने मालिक के अत्याचार से बहुत त्रस्त थी और टीबी की शिकार हो गई। बाद में इलाज के खर्च से बचने के लिए मालिक ने उसे एक बिचौलिए के साथ रांची के लिए ट्रेन में रवाना कर दिया। लंबे इलाज के बाद ही उसे बचाया जा सका। अपने साथ हुए अमानवीय कृत्य से सदमे में आई यह बच्ची कई दिनों तक घर से निकलने में भी डरती थी। झारखंड की न जाने कितनी मासूम लड़कियां महानगरों में इस अमानुषिक और पाशविक व्यवहार का शिकार हो रही हैं। ऐसी अनगिनत लड़कियों का सालों से अपने परिवार से कोई संपर्क नहीं है। माना जा रहा है कि दिल्ली जैसे महानगरों में झारखंड की इन गरीब लड़कियों को बेचने वाले बिचौलिए और प्लेसमेंट ऐजेंसियां मालामाल हो रही हैं। आंकड़े बताते हैं कि अकेले दिल्ली में इस समय 6000 प्लेसमेंट ऐजेंसियां कार्यरत हैं। सर्वविदित है कि झारखंड निर्माण के बाद से रोजगार के लिए होने वाला पलायन यहां घटने की बजाए और बढ़ा है। कुछ मामलों में लड़कियों ने भले ही अपनी इच्छा से महानगरों की ओर रुख किया हो लेकिन ज्यादातर मामले ठगी से बेचने के ही होते हैं। एक गैर सरकारी संस्था के आंकड़ों के मुताबिक झारखंड की करीब एक लाख 23 हजार लड़कियां दूसरे राज्यों के महानगरों में काम रही हैं। और जरूरी नहीं कि सभी लड़कियां घरेलू कामगार के रूप में ही काम करतीं हो। किसी को वेश्यावृत्ति के धंधे में धकेल दिया जाता है तो किसी की गरीबी का फायदा उठाकर उसकी शादी उससे दोगुनी उम्र के आदमी से करवा दी जाती है या किसी को किसी फैक्टरी में बंधुआ मजदूर बना दिया जाता है। परोक्ष रूप से बिकने वाली इन लड़कियों का परिवार इनकी स्थिति से इस हद तक अनभिज्ञ रहता है कि उनके लिए यह जानना तक मुश्किल होता है कि उनकी बेटी जिंदा भी है या नहीं। ज्यादातर बिचौलिए परिवार के ही नजदीकी या परिचित होते हैं जिनका महानगरों की प्लेसमेंट एजेंसियां या मानव तस्करी के धंधे में लिप्त लोग अपने लिए सस्ते दामों में इस्तेमाल करते हैं और खुद मोटी कमाई करते हैं। एक घटना में रांची जिले के अंतर्गत बुढ़मू प्रखंड के ग्रामीणों ने अपने गांव की लड़की को दिल्ली में बेचने वाले एक बिचौलिए की जमकर पिटाई की। 16 साल की उक्त नाबालिग को उसने स्कूल जाते समय अगवा कर लिया था और दिल्ली में 30 हजार रुपये में बेच दिया। लड़की किसी तरह वहां से भागकर गांव वापस आ गई। दिल्ली स्थित चाइल्ड वेलफेयर कमेटियों के मुताबिक नाबालिगों को श्रम के नाम पर बेचने के कारोबार में पश्चिम बंगाल के बाद झारखंड का ही स्थान है। इस धंधे में सक्रिय लोग झारखंड के अति पिछड़े इलाकों की गरीब, अनपढ़ या मामूली पढ़ी-लिखीं लड़कियों को अपने जाल में फंसाते हैं। इनमें से अधिकतर ऐसे परिवार से संबंध रखती हैं जहां या तो पिता का साया सिर से उठ चुका होता है या घर का पुरुष कुछ करने लायक नहीं होता। बिकने वाली लड़कियां दो-तीन हाथों से गुजरती हैं इसलिए उनके लिए जानना मुश्किल होता है कि उनका असल गुनहगार कौन है? बहरहाल, रोजी-रोटी के लिए पलायन या बिकने का मसला इस राज्य के लिए नई बात नहीं। 2002 में बिहार से अलग होकर नये राज्य के रूप में अस्तित्व में आया झारखंड यूं तो गरीब प्रदेश माना जाता है लेकिन यहां देश की अकूत खनिज संपदा भरी पड़ी है। देश का 33 प्रतिशत कोयला यहीं पाया जाता है और यह अन्य खनिजों से भी भरापूरा है। इसीलिए कॉरपोरेट घरानों की नजरें झारखंड के जल- जंगल-जमीन पर लगी रहती हैं फिर भी यह प्रदेश अपनी गरीब जनता को रोजगार देने में असमर्थ है और सरकार के पास र्तकों की कमी नहीं। एक तरफ सूबे के मुख्यमंत्री कहते हैं कि इस तरह की समस्याओं से जूझने और बाल श्रम रोकने के लिए पंचायत स्तर पर काम हो रहा है, जो कहीं नजर नहीं आ रहा, वहीं राज्य की समाज कल्याण और बाल व महिला विकास मंत्री कहती हैं कि नाबालिग लड़कियों को बाहर भेजने के लिए सबसे अधिक दोषी उनका परिवार और समाज ही है। सरकार राज्य की इस विकराल समस्या का समाधान क्यों नहीं कर पा रही है, इसका जवाब सरकार और उसके किसी मंत्री के पास नहीं। परिवार और समाज पर दोषारोपण करके सरकार अपना ही मजाक बना रही है। यूं झारखंड सरकार हर मंच पर यह स्वीकारने से इंकार नहीं करती कि राज्य के विकास की कड़ी यहां की आदिवासी लड़कियों के विकास के साथ भी जुड़ी है। इसी के निमित्त 2012 झारखंड में बिटिया वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है लेकिन कथनी-करनी का फर्क इसी से नजर आ जाता है कि पलायन जैसा मुद्दा उसके ऐजेंडे से लगभग नदारद हो चुका है तभी तो इस पर रोक के लिए कोई कारगर कदम सरकार की ओर से उठते नजर नहीं आ रहे। झारखंड के 24 जिलों में से जिन 13 से बड़ी संख्या में लड़कियां रोजगार के नाम पर शहर आती हैं, वे हैं- गढ़वा, रांची, साहिबगंज, दुमका, पाकुड़, पश्चिम सिंहभूम, पलामू, हजारीबाग, धनबाद, बोकारो, गिरिडीह, कोडरमा और लोहरा। ये लड़कियां दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, गोवा और कोलकाता आदि स्थानों में बेची जा रही हैं। इनमें 40 प्रतिशत 14 साल से कम आयु की हैं। वैिक स्तर पर भारत की 4.7 प्रतिशत आबादी मानव तस्करी की भेंट चढ़ रही है और इस खरीद-फरोख्त में सबसे ऊपर झारखंड और ओडिशा हैं, जहां 85 प्रतिशत पीड़ित 30 साल से कम आयु की हैं। यदि समय रहते झारखंड सरकार कोई कारगर कदम नहीं उठाती है तो यह राज्य लड़कियों की खरीद-फरोख्त की बड़ी मंडी बन जाएगा। सरकार को समझना होगा कि बिटिया वर्ष मनाने भर से राज्य की लड़कियों को वाजिब हक नहीं मिल सकता है। भविष्य की योजनाओं को सफल बनाने के लिए वर्तमान संवारना पहली शर्त है।

Friday, June 22, 2012

हम भारत की नारी हैं


यूरोजोन संकट के साये में दुनिया के महत्वपूर्ण औद्योगिक देशों के समूह जी-20 की सातवीं बैठक बुधवार को खत्म हो गई और इस बैठक में शिरकत करने गए अपने देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मानना है कि सतत विकास के लिए जी-20 देशों को मिलकर काम करने की जरूरत है ताकि विकासोन्मुख नीतियों को लागू किया जा सके। सतत विकास के लिए मजूबत अर्थव्यवस्था के अलावा उस देश के हालात ऐसे होने चाहिए, जहां उसकी आधी आबादी यानी महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस करें और लैंगिक समानता को प्रोत्साहित करने वाले कारगर उपाय जमीनी स्तर पर अपनाए जाएं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को संभवत: इस तथ्य की जानकारी नहीं होगी कि हमारा देश जी-20 समूह के सदस्य देशों में महिला अधिकारों के मामले में एकदम फिसड्डी है। जी-20 अर्थव्यवस्था में भारत महिलाओं के लिए जीने लायक सबसे खराब देश है। थॉमसन रायटर फाउंडेशन ने अपने इस अध्ययन को मैक्सिको के लास काबोस में जी-20 की सातवीं बैठक शुरू होने से पांच दिन पहले जारी कर यह संदेश दिया कि महिला अधिकारों के बावत बयानबाजी या महज कानून बनाने से महिला सशक्तीकरण का एजेंडा पूरा नहीं हो जाता। जी-20 समूह अर्थव्यवस्था के आकार और आबादी के हिसाब से दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण संगठन है। आइएमएफ के अनुसार दुनिया की करीब 66 प्रतिशत आबादी इन देशों में रहती है और 80 प्रतिशत विश्व व्यापार पर इनका कब्जा है। 80 प्रतिशत हिस्सेदारी ग्रास व‌र्ल्ड प्रोडक्ट्स में भी है। इस दमदार संगठन में भारत की भूमिका अहम है, लेकिन सवाल यह भी है कि भारत औरतों के लिहाज से सबसे खराब देश क्यों है? थॉमसन रॉयटर फाउंडेशन ने जी-20 के सदस्य देशों में महिलाओं की स्थिति जानने के लिए इस समूह के देशों के 370 विशेषज्ञों की मदद ली। इन विशेषज्ञों की राय में लैंगिक समानता को प्रोत्साहित करने, शोषण और हिंसा से बचाने के लिए उपायों को अपनाने और महिलाओं के स्वास्थ्य पर ध्यान दिए जाने के कारण कनाडा की महिलाएं सबसे बेहतर स्थिति में हैं। कनाडा को इस सूची में पहले स्थान पर रखा गया है, जबकि कन्या भ्रूण हत्या, कम उम्र में शादी और पराधीनता की वजह से भारत में महिलाओं की स्थिति बहुत दयनीय है। भारत को इस सूची में सबसे नीचे 19वें स्थान पर रखा गया है। सेव द चिल्ड्रेन, यूके संस्था के हेल्थ प्रोग्राम डेवलपमेंट एडवाइजर गुलशन रहमान की भारत की लड़कियों और महिलाओं की स्थिति के संबंध में टिप्पणी को नजरअंदाज करना मुश्किल दिखता है। उनके मुताबिक भारत में लड़कियों और महिलाओं की वस्तु के रूप में बिक्री जारी है। कम उम्र में शादी, दहेज संबंधी झगड़ों के चलते जिंदा जलाने और युवतियों से खराब बर्ताव की बातें चिंताजनक हैं। यह हालात तब है जबकि यहां घरेलू हिंसा को देखते हुए महिला संरक्षण कानून-2005 लागू है। इस सर्वे में महिलाओं की स्थिति का आकलन करने वाले चार महत्वपूर्ण बिंदु स्वास्थ्य की गुणवत्ता, हिंसा से मुक्ति, संसाधनों तक पहुंच, तस्करी-दासता से मुक्तिको भी शामिल किया गया है। अध्ययन से पता चलता है कि भारत इस सूची में सबसे नीचे 19वें स्थान पर है। द लांसेट 2011 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में पिछले तीन दशकों में 1.2 करोड़ कन्या भ्रूणों की हत्या हुई है। यह गैर कानूनी है, लेकिन कानून का डर कहीं नजर नहीं आता। जम्मू-कश्मीर में भी खतरे की घंटी बज चुकी है और देश की राजधानी दिल्ली में भी आंकड़े यही संकेत दे रहे हैं कि सरकार और समाज को मिलकर ठोस कदम उठाने की जरूरत है। महिलाओं के प्रति अन्य अपराध भी चिंता का विषय हैं, क्योंकि इनके तार समाज में महिलाओं की कमजोर स्थिति से जुड़ते हैं। राष्ट्रीय अपराध संाख्यिकी ब्यूरो-2010 के मुताबिक प्रति एक घ्ंाटे में दहेज के कारण एक दुल्हन की मौत हो जाती है। ये सरकारी आंकड़े हैं और असली तस्वीर निश्चित ही इससे अधिक भयावह होगी। मगर इस भयावह तस्वीर के बावजूद अपने देश में समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जिसने दहेज विरोधी कानून के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी है। महिलाओं के प्रति अन्य अपराध भी देश में महिलाओं की स्थिति पर सवालिया निशान लगाती हैं। महिलाओं को लेकर कुछ खबरें इस रिपोर्ट के जारी होने से कुछ दिन पहले अखबारों में छपी थीं। एक पति ने अपनी पत्नी को कुएं में इसलिए फेंक दिया, क्योंकि उसे शक था कि उस औरत के किसी दूसरे मर्द के साथ शारीरिक संबंध थे। औरत जब कुएं में मर गई तो वह उसके लापता होने की रपट दर्ज कराने थाने पहुंच गया। एक दूसरे मामले में पति ने पत्नी की अवैध रिश्तों के शक में तवे से पीट-पीटकर जान ले ली। एक शादीशुदा महिला ने जब नेत्रहीन बच्चे को जन्म दिया तो ससुराल वालों ने बच्चे सहित महिला को घर से निकाल दिया। 2009 में भारत के गृह सचिव रहे मुधकर गुप्ता का आकलन है कि करीब दस लाख लोगों की तस्करी की गई जिसमें अधिकांश महिलाएं थीं। सीबीआइ की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि 90 प्रतिशत मानव तस्करी देश की सीमाओं में ही हुई। सीबीआइ रिपोर्ट के मुताबिक, अब भी देश में तीस लाख से ज्यादा यौनकर्मी मौजूह हैं, जो एक बड़ा सवाल है। महिलाओं की यह तस्करी यौन शोषण के उद्देश्य के अलावा जबरन सस्ती मजदूरी कराए जाने के मकसद से भी होती है। राजनीति के लिहाज से भारत 17वें नंबर पर है। चीन और सऊदी अरब हमसे आगे हैं। यह स्थिति तब है, जब कि देश की राष्ट्रपति महिला है। लोकसभा अध्यक्ष और लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता महिला हैं। केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन दल यानी संप्रग की अध्यक्ष भी एक महिला हैं, जो टाइम पत्रिका में दुनिया की ताकतवर महिलाओं की सूची में कई सालों से अपना स्थान बनाए हुए हैं। यही नहीं, संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी देश की सबसे पुरानी और बड़ी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस की बीते 14 सालों से अध्यक्ष भी हैं। शीर्ष राजनीति में महिलाओं को देखते हुए जी-20 में भारतीय महिलाओं की सबसे खराब स्थिति हम सभी के लिए शर्म की बात है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि इससे समाज और देश का विकास प्रभावित होता है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Monday, April 30, 2012

हमें भी है जीने का हक

कहते हैं बेटियां ठंडी छांव होती हैं और घर की रौनक भी। वे जननी हैं तो पालनहार भी। लेकिन लगता है हमारे समाज में बहुतों को यह रौनक रास नहीं आ रही है, शायद यही वजह है कि बेटियों के प्रति हद दर्जे की कई झकझोर देने वाली खबरें सामने आ रही हैं। कहीं बच्चियों को लावारिस छोड़ा जा रहा है, तो कहीं इस दुनिया की आबोहवा से वाकिफ होने से पहले ही उनका गला घोंटा जा रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि बेटी बचाओ अभियान चलाने वाला हमारा समाज यह सब देख-सुनकर आंखें बंद कर लेता है। समाज में अन्याय के प्रति आवाज उठाने के बजाय आंखें बंद कर लेना बेहतर समझा जाता है। यह हालात ऐसे समय है जब बेटियां लगातार आगे बढ़ रही हैं और अपने परिवार का नाम देश-दुनिया में रौशन कर रही हैं। वे सरहद पर न केवल मुल्क की निगहबानी कर रही हैं बल्कि अपने बुजुर्ग मां-पिता का बोझ उठाकर उनका सहारा बन रही हैं। जनगणना-2011 के आंकड़ों में एक कड़वी हकीकत यह सामने आई कि 0-6 साल आयु वर्ग में बच्चियों की तादाद कम हुई है। 2001 में लिंगानुपात यानि 1000 लड़कों के मुकाबले लड़कियों की तादाद 926 थी जो 2011 में घटकर महज 914 रह गई। आजादी के बाद से यह अब तक का सबसे खराब स्तर है। जनगणना आयुक्त सी चंद्रमौलि ने भी इसे बेहद चिंताजनक स्थिति करार दिया है। इसका कारण यह है कि हम मीडिया, सोशल नेटवर्किंग साइट्स में बेटियों को बचाने का डंका पीटते हैं, सेमिनारों का आयोजन करते हैं, महिलाओं के हित के लिए कानून बनाते हैं, पर अपनी सोच कभी नहीं बदलते। इसी के चलते सारी योजनाएं कागजी पैमाने पर तो खरी उतरती हैं पर उनका असलियत से कोई लेना-देना नहीं होता। मसलन, प्रसव से पहले भ्रूण के सेक्स की जांच पर रोक लगाने के लिए पीएनडीटी एक्ट है लेकिन इसे अब तक सख्ती से लागू नहीं किया गया है। नेशनल कमिश्नर फॉर विमेन (एनसीडब्ल्यू) ने पिछले साल सरकार से पीएनडीटी एक्ट को और सख्त बनाने की मांग की थी लेकिन अब तक इस ओर कुछ नहीं किया गया है। वैसे तो हमारे आस-पास आए दिन बेटियों, महिलाओं के अपनों के ही हाथों मारे जाने की खबरें आती हैं। कभी इज्जत के नाम पर, कभी बेटों की चाह में तो कभी आर्थिक विपन्नता की आड़ में बेटियों का गला रेत दिया जाता है। दूरदराज इलाकों में हुई ऐसी घटनाओं से लोग वाकिफ भी नहीं हो पाते लेकिन कुछ मामले ऐसे भी आए है जिनकी जानकारी से देश का कोई भी कोना अछूता नहीं रह गया है। पश्चिम बंगाल के बर्दवान में एक शख्स ने अपनी तीन बेटियों और गर्भवती पत्नी को मार डाला, सिर्फ इसलिए क्योंकि उस शख्स को डर था कि कहीं चौथी बेटी पैदा न हो जाए। वहीं दिल्ली स्थित एम्स में लावारिस फलक को जख्मी हालात में भर्ती कराया गया, जहां वह जिंदगी से हार गई। बेंगलुरू में तीन महीने की आफरीन को कथित तौर पर उसके पिता ने सिगरेट से जलाकर बेरहमी से पीटा जिसके बाद उसने अस्पताल में दम तोड़ दिया। ग्वालियर में एक व्यक्ति ने पिछले साल अक्टूबर में अपनी नवजात बेटी को अस्पताल में तंबाकू खिलाकर मार डाला। सुल्तानपुर में एक शख्स ने अपनी पत्नी को बच्चियां पैदा करने के जुर्ममें जला दिया साथ ही अपनी तीन बेटियों को भी आग के हवाले कर दिया। यह वे घटनाएं हैं जो मीडिया की सक्रियता के चलते सामने आई हैं, अन्यथा कई बार ऐसा होता है कि बेटियों को जन्मते ही मार दिया जाता है और किसी को पता भी नहीं चलता। विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि रूढ़िवादी राज्यों में बच्चियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। दिल्ली और उसके आसपास की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। दिल्ली में यह आंकड़ा 1000 बच्चों पर 882, हरियाणा में 849, जम्मू-कश्मीर में 870, पंजाब में 836, राजस्थान में 875 और उत्तर प्रदेश में 874 है। लगता है इन इलाकों में लोग बेटी नहीं सिर्फ बहू चाहते हैं, भले ही उसे खरीद कर लाना पड़े। महाराष्ट्र जैसे प्रदेश में यह संख्या 896 होना चिंता का कारण है, क्योंकि वहां रूढ़ियां इतनी अधिक नहीं हैं। यह आंकड़े सभ्य समाज को चिंता में डालने के लिए पर्याप्त हैं। हालांकि कई सामाजिक संगठनों ने इसके लिए काम शुरू किया है, धार्मिंक संगठनों ने विशेष अभियान चलाया है, लेकिन इसका असर तो फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। कहते हैं कि अगर किसी समाज के विषय में जानना हो कि वह अच्छा है या बुरा तो वहां पर महिलाओं की स्थिति का अध्ययन कर लीजिए। हाल ही में प्रकाशित संयुक्त राष्ट्र संघ के आर्थिक-सामाजिक मामलों के विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत लड़कियों के लिए दुनिया में सबसे असुरक्षित देश बन गया है। इस रिपोर्ट को 150 देशों के 40 साल के रिकॉर्ड को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। भारत में 1 से 5 साल तक की करीब 75 फीसद बच्चियों की मौत हो जाती है। यह वि के किसी भी देश में होने वाली शिशु मृत्यु दर में लैंगिक असमानता की सबसे बदतर स्थिति है। चीन में 76 लड़कों की तुलना में 100 और भारत में 56 लड़कों की तुलना में 100 लड़कियों की मौत होती है। अन्य विकासशील देशों में यह आंकड़ा 122 लड़कों की तुलना में 100 लड़कियों का है। यहां तक कि पाकिस्तान, श्रीलंका, मिस्र और इराक में भी लड़कियों की स्थिति में सुधार देखा गया है। भारत में बच्चियों की स्थिति का यह आंकड़ा वाकई भयावह है। विरासत और संस्कृति का दंभ भरने वाले शहरों में सड़कों पर लावारिस हालात में मिल रहीं बच्चियां सभ्य होने का दावा कर रहे समाज को उसका असली चेहरा दिखा रही हैं। तमाम भारतीय परिवारों में घर के भीतर नवजात बच्चियों पर अमानवीय अत्याचार किए जाते हैं, इतना करने के बाद भी अगर उस बच्ची की सांसे नहीं टूटतीं तो उसे जला दिया जाता है, नाले में फेंक दिया जाता है या दफना दिया जाता है और कारण बताया जाता है आर्थिक परेशानी। बच्ची के हत्यारे अभिभावक यह दलील देते हैं कि उनके पास इतनी सामथ्र्य नहीं है कि वे बेटी का पालन- पोषण कर सकें। लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस तरह से सीमित आमदनी में बेटों का लालन-पालन किया जा सकता है, क्या उसी सोच के साथ बेटी को जीने का हक नहीं दिया जा सकता?

कम उम्र में मां बनती हैं 22 फीसदी युवतियां


भारत में 20 से 24 साल की उम्र के बीच की 22 प्रतिशत महिलाएं वयस्क होने से पहले ही मां बन जाती हैं। देश की 54 प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि कुछ कारणों से पति का पत्नी की पिटाई करना जायज है जबकि 57 प्रतिशत किशोर भी इसे सही मानते हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट में कहा गया है कि 54 प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि खाना जला देने, बहस करने, बिना बताए बाहर जाने जैसी वजहों पर पति का अपनी पत्नी की पिटाई करना जायज है। द स्टेट ऑफ द व‌र्ल्ड चिल्ड्रन 2012 के शीर्षक से जारी की गई रिपोर्ट में यूनिसेफ कहा गया है कि भारत में 2000 से 2010 तक 30 प्रतिशत महिलाओं की शादी 15 से 19 साल की उम्र के बीच कर दी गई। पुरुषों में यह आंकड़ा मात्र पांच प्रतिशत ही था। इसमें बताया गया है कि 20 से 24 साल की उम्र के बीच की 47 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 साल की उम्र से पहले ही कर दी गई थी। साथ ही 18 प्रतिशत महिलाओं की 15 साल की उम्र से पहले ही शादी कर दी गई। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में किशोरावस्था में मां बनने की दर प्रति हजार पर 45 है जिसका अर्थ है कि 15 से 19 साल की प्रति हजार किशोरियों में से 45 इसी उम्र में ही मातृत्व प्राप्त कर लेती हैं। यूनिसेफ की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 15 से 19 साल के बीच के युवक- युवतियों में 35 प्रतिशत युवक और 19 प्रतिशत युवतियां ही एच आई वी के संक्रमण को रोकने के उपायों के बारे में जानकारी रखते हैं। साथ ही रिपोर्ट के अनुसार 15 से 49 साल की उम्र के बीच की 54 प्रतिशत महिलाएं गर्भ निरोधकों का इस्तेमाल करती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2009 में 15-49 साल के संभावित वयस्कों में 0.3 प्रतिशत व्यक्तियों में एचआइवी का प्रचलन देखा गया। साथ ही 2009 में 8.8 लाख माताएं एचआइवी से पीढि़त थीं। यूनिसेफ का मानना है कि 2000 और 2009 के बीच अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा के नीचे 42 प्रतिशत भारतीय थे।

Monday, April 9, 2012

रेलवे में उपेक्षित और असुरक्षित महिलाएं

पिछले माह रेल मंत्रालय काफी में चर्चा रहा। दिनेश त्रिवेदी से यह मंत्रालय लेकर तृणमूल के ही मुकुल राय को थमाया गया है। यात्री भाड़े में वृद्धि को लेकर नाखुश ममता बनर्जी ने यह बदलाव कराया है। निश्चित तौर पर दीदी से जनता खुश हुई होगी कि उन्होंने उनका खयाल किया। चूंकि महिलाएं भी अच्छी- खासी संख्या में सफर करती हैं लिहाजा उन्हें भी किराए में कमी का निश्चित लाभ मिलेगा। लेकिन ट्रेनों में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध पर न तो दीदी का ध्यान गया, न दिनेश त्रिवेदी ने इस पर कोई विशेष पहल की और न मुकुल राय ने अब तक इस मामले में किसी खास बंदोबस्त का वायदा किया है। रेल यात्रा के दौरान सुरक्षा के प्रश्न पर चलते-चलाते तो सभी मंत्री तथा अधिकारी गण दो-चार आासन के वाक्य बोल जाते हैं और जिम्मेदारी जीआरपी को सौंप जाते हैं। लेकिन मामला सिर्फ सुरक्षा गश्त बढ़ाने का नहीं है बल्कि ठोस उपाय करने का है। समूची रेल व्यवस्था में लैंगिक असंवेदनशीलता का मसला गम्भीर है। चाहे वह महिला कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने का सवाल हो, बोर्ड के गठन में उनके प्रतिनिधित्व का विषय हो या फिर बुनियादी सुविधाएं- शौचालयों तथा चेंजिंग रूम आदि की व्यवस्था का प्रश्न हो, कहीं भी आसानी से वह रवैया देखा जा सकता है जो स्त्री विरोधी है। असुरक्षा से बचाव के कारगर उपाय करना रेलवे के एजेंडे में कहीं है भी, लगता नहीं। ज्ञात हो कि हाल में खुद रेल विभाग के आंकड़े बताते है कि अपराध बढ़ रहे हैं। बीते साल 2011 में रेल परिसर में बलात्कार, हत्या, डकैती एवं छेड़छाड़ के 712 मामले दर्ज हुए। वर्ष 2010 में यह आंकडा 501 था। 2011 में बलात्कार के 15 तथा छेड़खानी के 362 मामले दर्ज हुए जो 2010 में क्रमश: 10 और 252 थे। सुरक्षा के इंतजाम का जिम्मा आरपीएफ तथा जीआरपी पर है। मंत्रालय के अधिकारियों का जोर महज वीआईपी ट्रेनों जैसे राजधानी, शताब्दी, दुरंतो या एसी कोचों में गश्त बढ़ाने पर होता है। सुरक्षा इंतजामों का बड़ा हिस्सा इन ट्रेनों पर लगाया जाता है जबकि अन्य द्वितीय श्रेणी वाले कोचों में गश्त वाले भी कभी-कभार ही दिखते हैं। रेल विभाग ने मीडिया के माध्यम से बताया है कि वह एकीकृत सुरक्षा पण्राली के तहत 202 सीसी टीवी स्टेशनों पर लगवा रहे हैं जबकि स्टेशन की तादाद लगभग 8 हजार है। यह समझना मुश्किल नहीं है कि दर्ज मामलों के जो आंकड़े हैं उनकी तुलना में वास्तविक घटनाएं अधिक होती हैं। इसकी वजह यह है कि यात्रियों के लिए सफर के दौरान शिकायतों की प्रक्रिया को अंजाम देना कई बार संभव नहीं होता है। कोच के अंदर न तो कर्मचारी दिखते हैं, न ही कोई हेल्पलाइन नंबर होता है। अगर स्टेशन पर नीचे उतर कर शिकायत करने जाएं तब तक ट्रेन छूटने का डर होता है। जो अन्य उपाय हो सकते हैं उनके बारे में यात्रियों को जानकारी भी नहीं होती है। कोई प्रचार भी इस बारे में रेलवे करता नहीं दिखता है। जैसा कि दिल्ली में डीटीसी बसों के लिए निर्देश है कि हर बस में स्पष्ट रूप में और कई जगहों पर हेल्प लाइन नंबर लिखा होना चाहिए जिसे छेड़खानी का सामना करने वाली लडकियां-महिलाए इस्तेमाल कर सकती हैं। लगता है कि महिलाओं को सुरक्षित सफर का भरोसा दिलाना अभी रेलवे की प्राथमिकता नहीं बना है। न सिर्फ ट्रेन के अंदर बल्कि स्टेशनों पर भी वातावरण असुरक्षा का ही है। महानगरों के स्टेशनों पर भीड़ के कारण फिर भी किसी बड़ी अनहोनी का भय नहीं लगता, लेकिन खासतौर पर उत्तर भारत के कई छोटे स्टेशनों पर सुरक्षा के कोई उपाय नहीं दिखते हैं। खासकर रात के वक्त किसी ट्रेन पर अकेले चढ़ना या उतरना महिलाओं के लिए असुरक्षित होता है। रेल परिसर में और यात्रा दौरान तो महिलाओं को अपराध और असुरक्षा का सामना करना ही पड़ता है, विभागीय स्तर पर भी उनके साथ भेदभाव आम है। मसलन, रेलवे ने अपनी भर्ती नीति अभी तक दुरुस्त नहीं की है। संसद की स्थायी समिति की तरफ से उसकी भर्ती नीति पर गंभीर सवाल उठाये गए थे। यहां विभिन्न विभागों में न्यूनतम 5.45 से अधिकतम 7.70 फीसद महिला कर्मचारी थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि ग्रुप ए, बी, सी और डी श्रेणी में क्रमश: 6.79, 5.45, 7.70 और 6.20 फीसद महिला कर्मचारी हैं। खेल कोटे के तहत होनेवाली भर्तियों को भी रेलवे ने अनदेखा कर रखा है। यहां हर साल 1181 रिक्तियां खेल कोटे के तहत भरी जानी चाहिए, लेकिन 2008 में मात्र 586, 2009 में 509 और 2010 में 233 सीटें ही भरी गई। बचाव में जैसा कि हमेशा यही कहा जाता है कि योग्य उम्मीदवार मिले ही नहीं। संसदीय समिति ने इस बात को सिरेसे खारिज कर दिया कि देश में उम्मीदवार नहीं हैं। इतना ही नहीं रेलवे पुलिस फोर्स में भी आठ हजार पद खाली हैं। स्थायी समिति की तरफ से रेल मंत्रालय को सलाह दी गयी है कि वह अपने यहां महिला कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने के लिए पर्याप्त कदम उठाए। वैसे हमारे देश में किसी भी क्षेत्र की नौकरियों में खाली स्थानों का नहीं भरा जाना और सालों साल रिक्त पड़े पद एक गम्भीर मुद्दा है। चाहे आप डाक विभाग देखें, टेलीफोन निगम, नगर निगम या अन्य कोई भी दफ्तर लें। लेकिन यह तय है कि जितनी भी नई नियुक्तियां होती हैं उनमें महिलाओं की भागीदारी के अनुपात में भारी असमानता मौजूद है। यह गम्भीर चिंता का विषय है क्योंकि इसके बिना महिला सशक्तिकरण तथा लैंगिक समानता का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता है। सभी क्षेत्रों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना इसलिए जरूरी है कि यह उनका अधिकार है। जरूरी है कि महिलाएं कामकाजी बनें और आर्थिक निर्भरता की स्थिति समाप्त हो। साथ ही यदि महिलाएं पर्याप्त संख्या में बाहर का कामकाज सम्भालेंगी तो सार्वजनिक दायरे का पूरा वातावरण भी बदलेगा। किसी भी क्षेत्र में महिलाओं की इतनी कम उपस्थिति वातावरण को स्वत: ही पुरुष वर्चस्व वाला बना देती है और यह महिलाओं के लिए भय पैदा करने वाला होता है। असामाजिक तत्वों पर काबू पाना तथा रेल परिसर एवं यात्रा के दौरान सुरक्षित वातावरण निर्मित करना रेल विभाग की जिम्मेदारी है। ऐसा न करने पर उसके खिलाफ आवश्यक कार्रवाई भी होनी चाहिए।

Wednesday, March 14, 2012

विकसित राज्यों में और कम हुई लड़कियां


राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा यहां जारी नई रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि दिल्ली, पंजाब और हरियाणा भले ही आर्थिक रूप से प्रगति की राह पर हों, लेकिन इन राज्यों में अन्य राज्यों की तुलना में लिंगानुपात की स्थिति ज्यादा खराब है। इस रिपोर्ट में कहा गया कि दिल्ली, चंडीगढ़ और हरियाणा आर्थिक रूप से काफी संपन्न हैं, लेकिन यहां लिंग अनुपात सबसे ज्यादा असंतुलित है। ग्रामीण क्षेत्रों में हर एक हजार पुरुषों पर 919 महिलाएं हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में हर एक हजार पुरुषों पर सिर्फ 902 महिलाएं हैं। लिंग अनुपात के मामले में हरियाणा के झज्जर और फिर महेंद्रगढ़ की स्थिति सबसे खराब है, जहां एक हजार पुरुषों पर क्र मश: 774 और 778 महिलाएं हैं। देश में केरल और पुडुचेरी में लिंगानुपात सबसे ज्यादा संतुलित है। इस रिपोर्ट में कहा गया कि लैंगिक भेदभाव के खिलाफ दशकों के संघर्ष के बावजूद आंकड़े बताते हैं कि देश में बड़े स्तर पर लिंगभेद लगातार जारी है। खासकर आर्थिक रूप से संपन्न राज्यों में। राष्ट्रीय महिला आयोग और संयुक्त राष्ट्र की संयुक्त पहल पर तैयार रिपोर्ट अंडरस्टैंडिंग जेंडर इक्वेलिटी इन इंडिया-2012’ स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, चुनाव आयोग और गृह मंत्रालय सहित विभिन्न मंत्रालयों और आयोगों से जुटाए गए आंकड़ों पर आधारित है। देश में लिंगानुपात 2001 में 1000 पुरुषों पर 933 महिलाएं की तुलना में 2011 में 1000 पुरुषों पर 940 महिलाएं हो गया है। आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा ने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि यह राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति है। उन्होंने कहा कि हर कोई कहता है कि भारत विकासशील देश है, लेकिन हम ऐसा कैसे कह सकते हैं। रिपोर्ट में आंकड़ों की मदद से कहा गया कि भारत की 30 प्रतिशत महिलाएं शारीरिक हिंसा सहती हैं। आठ फीसद महिलाएं यौन हिंसा झेलने को मजबूर हैं। महिलाओं पर शारीरिक हिंसा के मामले में बिहार जबकि यौन हिंसा के मामले में पश्चिम बंगाल शीर्ष पर है। 2001 : 1000 पुरुषों पर 933 महिलाएं 2011 में 1000 पुरुषों पर 940 महिलाएं शारीरिक हिंसा : 30 फीसद यौन हिंसा : 08 फीसद शारीरिक हिंसा के मामले में बिहार शीर्ष पर यौन हिंसा के मामले में पश्चिम बंगाल आगे दिल्ली, चंडीगढ़ और हरियाणा में लिंग अनुपात सबसे ज्यादा असंतुलित केरल और पुडुचेरी में लिंगानुपात सबसे ज्यादा संतुलित