Tuesday, December 28, 2010

महिला हिंसा के विरुद्ध अभियान

हाल के वष्रो में महिलाओं पर हो रही हिंसा के विरुद्ध कई सशक्त आवाजें उठी हैं। सरकार ने पहले से बेहतर कानून भी बनाया है, फिर भी सवाल बचा है कि दूर-दराज के गांवों में इस कानून का क्रियान्वयन कितना हो सकेगा। अनुभवी लोगो का मत है कि कानून कितने भी अच्छे बनें पर जब तक विभिन्न समुदायों में इसकी मान्यता नहीं बढ़ती है तब तक व्यापक व वास्तविक बदलाव की उम्मीद कम होती ही होती है। अत: जमीनी स्तर पर हिंसा के विरुद्ध कार्य करना व पूरे समुदाय में हिसा के विरुद्ध माहौल तैयार करना सबसे आवश्यक कार्य है। देहरादून के सहसपुर व विकासनगर प्रखंडों में हाल के वष्रो में दिशा संस्था महिला हिंसा के विरुद्ध उल्लेखनीय प्रयास कर रही है। इन गांवों में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के अनेक समाचार मिलते रहते थे। हालांकि ऐसे समाचार आज भी मिलते हैं पर निश्चित ही उनकी संख्या में कुछ कमी आई है। दूसरे महिला समुदाय में ऐसी घटनाओं के विरोध की हिम्मत बढ़ी है। अत्याचार के विरुद्ध समुचित कानूनी कार्रवाई होने से महिलाओं को न्याय मिलने की उम्मीद बढ़ी है। शुरू में दिशाने जब यहां कार्य आरंभ किया तो उसके कार्र्यकताओं के विरुद्ध काफी भला-बुरा कहा गया लेकिन उन्होंने इसकी परवाह किए बिना गांववासियों से बातचीत का सिलसिला जारी रखा। महिलाओं ही नहीं पुरुषों से भी इस विषय पर बातचीत चलाई गई कि महिलाओं पर हो रही हिंसा समाज के लिए कितना बड़ा कलंक है। स्कूलों-कॉलेजों में कार्यक्रम कर युवकों-किशोरों से पूछा गया कि क्या लड़कियों के साथ हो रहा ऐसे भेदभाव उचित है तो लड़कों ने घर में कहना आरंभ किया कि हमारी बहन को भी स्कूल भेजो। कई युवा तो दिशा के साथ मिलकर प्रचार-प्रसार भी करने लगे। इस मेहनत का परिणाम तब सामने आया जब इस प्रयास के आरंभ होने के दो-तीन र्वष के भीतर ही सहसपुर में आयोजित महिला हिंसा विरोधी सम्मेलन में चार से पांच हजार महिलाएं एकत्र हो गई। वे दूर-दराज के गांवों से अपने र्खच पर आईं। अनेक गांवों में सार्थक बदलाव की प्रक्रिया को, महिलाओं की समता और न्याय की आवाज को आगे ले जाने वाली चेंज मेकरतैयार होने लगीं। इस मुहिम के तहत लगभग 35 गांवों में महिला समितियों व किशोरी मंच का गठन हुआ। दिशा के कार्यक्षेत्र के गांवों में मुसलमानों व दलित परिवारों की संख्या अधिक है। विशेषकर मुसलमान किशोरियों में शिक्षा का अभाव अधिक देखा जाता है। दिशा ने उनके लिए विशेष शिक्षा कार्य चलाया जो कुछ समय तो काफी जोरशोर से चला पर अर्थाभाव के कारण इसे रोकना पड़ा। दिशा का प्रयास है कि कुछ साधन उपलब्ध होते ही इसे व्यापक स्तर पर फिर आरंभ किया जाएगा। दिशा की कार्र्यकताओं ने दूर-दराज के गांवों में जाकर दोनों पक्षों को संतुष्ट करते हुए ऐसे कई मामले मौके पर ही निबटाए जिनके कारण हिंसा की संभावना थी। जो मामले अधिक उलझे थे उनके लिए प्रतिमाह एक दिन अपने सहसपुर स्थित मुख्यालय में नारी अदालत का आयोजन आरंभ किया गया। कम समय में संस्था ने लोगों का विश्वास प्राप्त किया है और लोग इस अदालत में दूर-दूर से पहुंचते हैं। हाल में महिलाओं के प्रति अत्याचार-अन्याय के अनेक गंभीर मामले दिशा की सहायता से सुलझाये गए हैं जिसमें दोषियों को सजा दिलवाई गई। इनमें जहां बच्चियों या किशोरियों के साथ दुराचार के गंभीर मामले थे, वहीं बिरादरी पंचायतों द्वारा अन्यायपूर्ण फैसलों के मामले भी थे। यह ऐसे मामले थे जिन्हें सुलझाने में या दोषियों को सजा दिलवाने में दिशा की अपनी कार्र्यकता ही कई बार संकट से घिर गईं। पर अंत में प्राय: उन्हें सफलता मिली व जिन पर अत्याचार हुआ था उन्हें भी राहत मिली। बहुत कठिन परिस्थितियों में दिशा को यह सफलता मिलने की एक वजह यह है कि उसने स्थानीय समुदाय, मीडिया, और सरकारी मशीनरी की सहायता से अपने प्रयास को मजबूत बनाने की कोशिश की है। संस्था की एक कार्र्यकता ने बताया कि कई बार नीचे के पुलिस अधिकारियों ने सहयोग नहीं किया तो ऊपर के अधिकारियों से संर्पक कर राह निकाली गई। सफलता की दूसरी वजह यह है कि दिशा की अनेक कार्र्यकताओं ने अपने जीवन में भी अनेक कठिनाईयों का सामना किया है और इसी कारण उनकी संवेदनाएं और गहरी हुई हैं जिसके कारण वह मन से काम कर रही हैं। आबीदा खातून ने बताया कि कैसे दिशा में आने के बाद पहले वह स्वयं बुर्के से मुक्त हुई और उसके बाद अनेक महिलाओं की सहायता के लिए पहुंची। अनीशा को कम उम्र में ही परिवार की अधिक जिम्मेदारियां संभालनी पड़ी हैं पर वह इसके साथ अपनी सामाजिक जिम्मेदारी भी मजबूती से संभाल रही हैं। दिशा की छह-सात सदस्यों की टीम जहां महिला अधिकारों को बुलंद कर रही है, वहां इनकी सहयोगी एक अन्य टीम ने माइक्रो फाइनेंस या छोटे स्तर के र्कज से चलने वाले उद्यमों में उल्लेखनीय प्रगति की है। कमलेश ने बताया कि स्वयं सहायता समूहों का गठन भी किया गया तथा अलग से केवल र्कज प्राप्त करने के इच्छुक समूहों का भी। तमाम सावधानियां अपनाते हुए कमजोर र्वग के हितों को ध्यान में रखकर ही र्कज दिया जाता है। 

No comments:

Post a Comment