Sunday, January 9, 2011

वकील नहीं बनना चाहतीं लड़कियां

कला, विज्ञान, कॉमर्स और प्रबंधन हैं पसंदीदा विषय
ऐसा लगता है कि वकील बनने में लड़कियों की खास रुचि नहीं है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आंकड़े कुछ यही बयां कर रहे हैं। इसके मुताबिक पिछले अकादमी सत्र में 89,256 छात्राओं ने लॉ की पढ़ाई के लिए नाम लिखाया जो उच्च शिक्षा में उनके कुल पंजीकरण दर का महज 1.58 फीसदी है।
मेडिसिन, इंजीनियरिंग और एजुकेशन क्षेत्र में जाने वाली लड़कियों की तादाद केवल तीन से पांच फीसदी के बीच पाई गई जो इन विषयों के प्रति उनके जबर्दस्त क्रेज की आम धारणा के उलट है। तथ्यों के मुताबिक कला, विज्ञान कॉमर्स और मैनेजमेंट अब भी लड़कियों के पसंदीदा विषय हैं। लगभग 50 फीसदी (49.8) छात्राओं ने आर्ट्स, 19.99 फीसदी ने विज्ञान और 16.21 फीसदी ने कॉमर्स तथा मैनेजमेंट को बतौर कैरियर चुना।
कृषि या पशु चिकित्सा का क्षेत्र उन्हें कतई नहीं लुभा सका। इनमें दिलचस्पी लेने वाली लड़कियों की तादाद क्रमश: 0.27 फीसदी (15,253) और 0.08 फीसदी (4,519) पाई गई। देश में महिला शिक्षा की स्थिति पर हाल में जारी ब्रोशर के अनुसार, अकादमी सत्र 2009-10 की शुरुआत में ऊंची तालीम के लिए पंजीकृत लड़कियों की तादाद 41.40 फीसदी दर्ज की गई जो कि आजादी के समय 10 फीसदी से भी कम थी। इसका श्रेय राष्ट्रीय शिक्षा नीति और सरकारी योजनाओं को देते हुए उन राज्यों की सराहना की गई है जहां महिला शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए।
उच्च शिक्षा में महिला पंजीकरण की कुल संख्या के हिसाब से उत्तरप्रदेश ने सबको पछाड़ दिया। राज्य में आठ लाख लड़कियों ने कॉलेज और यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया जबकि 7.8 लाख की संख्या दर्ज कराकर महाराष्ट्र ने दूसरा स्थान हासिल किया। सबसे खराब हालत बिहार की है जहां स्कूल के बाद पढ़ाई जारी रखने वाली छात्राओं की संख्या औसत से भी कम पाई गई।
केंद्र सरकार को उम्मीद है कि शिक्षा के सभी स्तरों तक लड़कियों और महिलाओं की अधिकतम पहुंच सुनिश्चित करने की उसकी कोशिशें रंग लाएंगी और साल 2015 तक शिक्षा में लिंग संबंधी भेदभाव पूरी तरह मिटाकर सही मायने में महिला सशक्तीकरण का लक्ष्य आसानी से पूरा किया जा सकेगा।


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