Sunday, January 23, 2011

क्यों न हो अपनी पहचान की चिंता


जापान की 75 वर्षीय महिला क्योको तुकोमोतो कहती हैं कि उनका अपने पति के प्रति प्रेम कम नहीं हुआ है और ही उनका उनसे कोई विरोध है लेकिन उन्हें अपने नाम के साथ अपने पति का उपनाम जोड़ने का कोई तुक समझ में नहीं आता है। इसलिए वह अब पचास साल बाद इसका विरोध कर रही हैं। गौरतलब है कि जापान में हर विवाहित महिला को अपने नाम के साथ पति का उपनाम जोड़ना कानूनन अनिवार्य है। तुकोमोतो ने इसके विरोध की पहल की और इस अभियान में आज अन्य महिलाएं भी उनसे जुड़ने लगी हैं। उनकी फरवरी में इस कानून के खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर करने की योजना है। तुकोमातो कहती हैं कि यह मामला सिर्फ पसन्दगी का नहीं है बल्कि आत्मसम्मान के साथ भी जुड़ा है। उनकी ख्वाहिश है कि बस मरने से पहले उनके नाम से पति का उपनाम हट जाए। याद रहे 1850 के दशक में शुरू हुए स्त्रियों के मताधिकार आन्दोलन की प्रणोता रही ल्यूसी स्टोन ने उस समय महिलाओं से अपील की थी कि महिलाएं शादी के बाद अपना पुराने नाम बनाये रखें। ये छोटी छोटी लगनेवाली बातें आन्दोलन के एजेंडा पर यूं ही नहीं आयी हैं बल्कि इसका रिश्ता औरत के लिए बनाये जानेवाली उसकी स्वतंत्र पहचान तथा अस्तित्व से जुड़ा होता है। किसी भी तबके के दोयम दज्रे की स्थिति कई छोटी छोटी चीजों को मिला कर बनती है जो धीरे-धीरे सोच, परम्परा और संस्कृति का हिस्सा बन जाती है। जापान की तरह हमारे यहां हालांकि पति का नाम साथ में जोड़ना कानूनन अनिवार्य नहीं है लेकिन रवायत यही है कि शादी के बाद महिलाओं के नाम के आगे पति का उपनाम जुड़ जाता है। अब कुछ शहरों में अपने- अपने स्तरों से महिलाएं इसका प्रतिरोध करना शुरू कर रही हैं। कई सिर्फ अपना ही नाम रखती हैं तो कुछ पति के साथ अपने पिता का उपमान भी इस्तेमाल करती हैं। एक मित्र कहती हैं कि सारे सरनेम तो पुरुष के ही हैं। चाहे पिता का हो या पति का। यदि नाम के साथ उपनाम लगाना ही हो तो जिसे बचपन से जानते हैं, उसी का दावा अधिक बनता है। इसी तरह नाम के शुरू में शादी के बाद श्रीमती जुड़ जाता है। महिलाओं के लिए शादी की पहचान श्रीमती और उपनाम के अलावा अन्य प्रतीकों जैसे सिन्दूर, मंगलसूत्र आदि के माध्यम से भी होती है। जबकि पुरुष की पहचान अपने जीवनभर के लिए स्थायी या शाश्वत होती है। यह स्थायित्व तथा अपनी पहचान स्व की अनुभूति कराते हैं जिसमें सम्मान के साथ खुद पर भरोसे की भी बात होती है। पता नहीं क्यों पश्चिम के देशों में भी जो ज्यादा विकसित माने जाते हैं तथा जहां महिला आन्दोलन पहले शुरू हुआ, वहां भी महिलाएं आज तक इस मानसिकता से मुक्त नहीं हो पायी हैं। बड़ी शख्सियतें भी अपने पतियों के उपनाम से पहचानी जाती है जैसे मिशेल ओबामा, हिलेरी क्लिन्टन इत्यादि। उन्हें भी मानो अपनी पहचान खोने का कोई गम नहीं है और पति की पहचान में समा जाने को ही वह आदर्श मान लेती हैं। हमारे एक भारतीय परिचित ने जब एक जर्मन महिला से शादी की तो वह अपने बदले हुए नाम के साथ ही हमें पहली बार मिलीं। जिस तरह अधिकतर समाज अपने यहां औरत के लिए पूर्ण बराबरी का समाज नहीं बना पाए है, उसी का प्रतिबिम्बन इसमें दिखता है। औरत की मानसिक बनावट और सोच भी इसी समाज की उपज है। कुछ समय पहले यह प्रश्न सुर्खियों में था, जब ब्रिटेन के मशहूर टैबलॉयड अखबारसनकी सम्पादक तथा एक अन्तरराष्ट्रीय मीडिया कम्पनी की चीफ एक्जिक्यूटिव होने वाली रेबेका वाड ने अपनी शादी के बाद अपने पति का सरनेम अपनाने का फैसला लिया था। मालूम हो कि पिछले दिनों सुश्री रेबेका ने दूसरी शादी की और वह रेबेका ब्रुक्स बन गयीं। उनके वर्तमान पति का नाम चार्ल्स ब्रुक्स है। उन्होंने अपने ईमेल के जरिए लोगों को अपने बदले नाम की सूचना भी दी तथा सम्बधित लोगों के लिए बाकायदा अपने मैरिज सर्टिफिकेट की कापी भी भेजी है। जाहिर है कि रेबेका का यह नामान्तरण नारी स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत रही तमाम महिलाओं के लिए एक झटके के रूप में ही सामने आया। हमारे देश में भी अस्सी के दशक में उभरा नारी स्वातंत्र्य आन्दोलन जिसे नारी आन्दोलन का सेकेंड वेव भी कहते हैं, ने औरत की सामाजिक स्थिति को बदलने के लिए जबरदस्त संघर्ष किया। इस दौर में वह औरत के खिलाफ घटनेवाली घटनाओं के विरोध में तो वे सड़कों पर उतरी हीं, धरना, प्रदर्शन आदि किया ही लेकिन औरत की स्वतंत्र पहचान बनाने का प्रयास भी किया। ऐसा नहीं था कि सिर्फ स्त्री आन्दोलन से जुड़ी ताकतों ने ही यह लड़ाई लड़ी। वामपंथी शक्तियां भी इसमें पूरी तरह सक्रिय रहीं। इसके तहत इन प्रगतिशील ताकतों ने औरत की स्थिति में बदलाव के लिए अनेक परम्पराओं को भी चुनौती दी, मसलन शादीशुदा महिलाओं ने शादी के प्रतीक जैसे सिन्दूर, लाल-हरी चूडियां आदि नहीं पहनने, दहेज का लेन-देन करने पर जोर दिया। ऐसे व्रत-त्योहारों को मनाना छोड़ दिया जो स्त्री की गुलामी का महिमामंडन करते हों। परदा प्रथा का त्याग किया, आदि। आज कई बार यह देखने को मिलता है कि जिन महिलाओं ने यह लड़ाइयां लड़ीं, उन्होंने सिर्फ अपना स्वतंत्र अस्तित्व और पहचान बनायी बल्कि पूरी औरत जमात को यह सन्देश दिया कि वे भी अपने जीवन में न्याय और बराबरी के लिए प्रयास करें। लेकिन आज उन्हीं की सन्तानें या नई पीढ़ी की अनेक लड़कियां उस परम्परावादी जीवन शैली को अपनाने से परहेज भी नहीं रखती हैं जिससे उबरने के लिए एक पीढ़ी आज भी संघर्षरत है। नारी आन्दोलन में लम्बे समय से सक्रिय एक मित्र की बेटी ने बिना किसी संकोच गृहिणी बनने की इच्छा जाहिर की। आजकल इस तरह के किसी भी मामले को आसानी से चॉइस यानी अपनी इच्छानुसार चुनाव का मामला बना दिया जाता है। बहरहाल इसे नयी पीढ़ी का स्मृतिलोप कहें या कुछ और, लेकिन इस पीढ़ी को शायद यह एहसास नहीं दिखता कि औरत ने सार्वजनिक दायरे में आने के लिए दशकों तक संघर्ष किया है। क्योंकि एक दौर में उसके लिए बाहर की दुनिया में जगह बनाने के लिए तो उनका परिवार तैयार था, ही समाज और ही सरकारों ने अपनी नीतियों में कोई ऐसी पहल की जिससे औरत को बाहर निकलने के लिए प्रोत्साहन मिले। सरकारों ने तो तभी कुछ दिया जब महिलाओं ने उन पर दबाव बनाया। परिवार के अन्दर कमानेवाली सदस्य की हैसियत हासिल करना तथा साथ में समाज में भी यह सन्देश देना कि वह हर काम करने में सक्षम है। बिना बराबर के योगदान के बराबर की हैसियत किसी को नहीं मिलती। यद्यपि घर के अन्दर का काम उन्हीं के हिस्से होता था, लेकिन यह सत्य है कि जिस काम के बदले कोई पैसा नहीं मिलता है उसकी गिनती काम में नहीं होती है। इन बिना पैसेवाले कामों का मूल्य हम सिर्फ अपनी चाहत से नहीं बढ़ा सकते बल्कि इसके लिए अन्दर और बाहर दोनों कामों का स्त्री-पुरूष के बीच बंटवारा करना होगा। इसीलिए महिलाओं ने जब तक स्थिति नहीं बदलती तब तक दोहरा बोझ उठाना स्वीकार किया। लेकिन आज की पीढ़ी, जिसे तुलनात्मक रूप से आसानी से पढ़ना-लिखना तथा खुद को विकसित करने का अवसर मिल पाया है, वह अपने परिश्रम तथा व्यवहार से अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए तत्पर नजर नहीं रही है। यदि सब कुछ सामान्य हो गया होता, औरत अपने हालात में संकटों की दहलीज पार कर गयी होती यानी समाज स्त्रीद्रोही नहीं होता और समानता कायम हो चुकी होती तो पीछे जाना उतना चिन्तनीय नहीं होता। लेकिन अभी तो शायद दशकों और लगेंगे पथ-प्रशस्त होने में।


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